भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 571

५५६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् मृद्घटवत् सुखभेद्यो दुःसन्धानश्च दुर्जनो भवति। सुजनस्तु कनकघटवद् दुर्भेद्यश्चाशु सन्धेय (हितोप० १।६२)। ३ विशेषता या उच्चता प्रतिपादन करने में—मिष्टं पयो मिष्टतरं तु दुग्धम् (गणरत्न०), पानी मीठा होता है पर दूध उस से अधिक मीठा होता है। सकृदङ्गु ल्यग्रावाप्तावन्तिमस्तु पदे पदे (हितोप० प्रस्तावना १३)। ४ हेतु (क्योंकि)—वृद्धानां वचनं ग्राह्यमापत्काले ह्युपस्थिते। सर्वत्रैव विचारे तु भोजनेऽप्यप्र- वर्तनम् (हितोप० १।२३)। हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् (गीता० २।५)। ५ और अब (दूसरी तरफ)—अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम (गीता० १।७)। सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ (गीता० १८।३६)। ६ पादपूर्ति के लिये—अर्थेन तु विहीनस्य पुरुषस्याल्पमेधसः। क्रिया सर्वा विनश्यन्ति ग्रीष्मे कुसरितो यथा (हितोप० १।१२५)। (३८) ननु*। १ अवधारण (निश्चय ही, वस्तुत, सचमुच)—ननु प्रवातेऽपि निष्कम्पा गिरय (शाकुन्तल० ६), तूफान में भी निश्चय ही पर्वत निश्चल रहते हैं। ननु वज्रिण एव वीर्यमेतद् विजयन्ते द्विषतो यदस्य पक्षा (विक्रमो० १।१७), वस्तुत यह इन्द्र का ही बल है जो उस के पक्षपाती शत्रुओं पर विजय प्राप्त करते हैं। मन्नि- न्दया यदि जनः परितोषमेति नन्वप्रयत्नसुलभोऽयमनुग्रहो मे (शान्तिशतक), मेरी निन्दा में यदि लोग प्रसन्न होते हैं तो यह निश्चय ही मुझे बिना यत्न उन का अनुग्रह प्राप्त हो रहा है। ननु वक्तृविशेषनिःस्पृहा गुणगृह्या वचने विपश्चितः (किरात० २।५), सच- मुच भाषण के विषय में गुणग्राही विद्वज्जन वक्ता की ओर ध्यान नहीं दिया करते वे तो भाषण की सारसारता को ही देखा करते हैं। २ सम्बोधन—ननु मूर्खा पठितमेव युष्माभिस्तत्काण्डे (उत्तरराम० ४), ऐ मूर्खो ! उस काण्ड में यह विषय तो तुम पढ़ ही चुके हो। ३ प्रार्थना, याचना—ननु मां प्रापय पत्युरन्तिकम् (कुमार० ४।३२), कृपया मुझे मेरे पति के पास पहुँचा दो। ४ पूछताछ (Enquiry) करने में— ननु समाप्तकृत्यो गौतम (मालविका० ४), क्या गौतम ने अपना काम समाप्त कर लिया है ?। परवर्त्ती भारतीय तर्क शैली में प्राय 'ननु' से ही शङ्का का आरम्भ किया जाता है। (३६) हि*। १ केवल, सिर्फ—धर्मो हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीनाः पशुभि समाना (हितोप० १।२६)। मूढो हि मदनेनायास्यते (कादम्बरी०)। २. हेत्वर्थ में (क्योंकि)—अग्निरिहास्ति धूमो हि दृश्यते (गणरत्न०)। जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च (गीता० २।२७), हि=यतः। ३ अवधारण (ही, वस्तुतः, निश्चय से आदि)—न हि सुशिक्षितोऽपि वटुः म्वस्कन्धमारोढुं पटु (नीतिश० २२०)। देव प्रयोगप्रधानं हि नाट्यशास्त्रं किमत्र वाग्व्यवहारेण (मालविका० १)। प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम् (नीति० ५२)। ४ उदाहरण प्रदर्शन करन में— प्रजानामेव भूत्यर्थं स ताभ्यो वलिमग्रहीत्। सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते हि रसं रविः (रघु० १।१८)। ५ पादपूर्ति या वाक्यालङ्कार के लिये—भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि (गीता० १.११)। 'हि' का वाक्य के आदि में प्रयोग नहीं होता।