लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअव्यय-प्रकरणम् . ५५७ (४०) नाम* । १. नामक, नाम वाला, नाम से प्रसिद्ध - अस्ति दाक्षिणात्ये जनपदे महिलारोप्यं नाम नगरम् (पञ्च० १) । अस्ति मगधदेशे चम्पकवती नाम अरण्यानी (हितोप० १) । अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः (कुमार० १.१) । २. वस्तुतः - वीणा हि नाम असमुद्रोत्थितं हि रत्नम् (मृच्छ० ३), वीणा वस्तुतः एक ऐसा रत्न है जो समुद्र से उत्पन्न नहीं हुआ । विनीतवेषेण प्रवेष्ट- व्यानितपोवनानि नाम (शाकुन्तल० १), वस्तुतः तपोवन में विनीतवेष से प्रवेश करना चाहिये । तन्नाम निष्ठुराः पुरुषाः (मृच्छ० ५.३२), वस्तुतः पुरुष कठोर होते हैं । ३. सम्भावना - को नाम राज्ञां प्रियः (पञ्च० १.१५६) राजाओं का कौन प्यारा हो सकता है ? को नाम पाकाभिमुखस्य जन्तुर्द्वाराणि दैवस्य पिधातुमीष्टे (उत्तरराम० ७.४), जब दैव फल देने को उद्यत हो तो भला कौन पुरुष उस के द्वार बन्द कर सकता है ? अतनुषु विभवेषु ज्ञातयः सन्तु नाम (शाकुन्तल० ५.८), धन के आधिक्य में बन्धुओं के बन जाने की सम्भावना है । अये पदशब्द इव, मा नाम रक्षिणः (मृच्छ० ३), अरे पांव की आहट सुनाई दे रही है । मेरे विचार में रक्षी का शब्द न होगा । ४. अपमानाश्रित क्रोध प्रकट करने में - ममापि नाम दशाननस्य परैः परिभवः (गण- रत्न०), क्या शत्रुओं द्वारा मुझ रावण का भी तिरस्कार ! । ममापि नाम सत्त्वैरभि- सूयन्ते गृहाः (शाकुन्तल० ६), क्या हमारे भवनों पर भी भूतों द्वारा आक्रमण किया जा रहा है ? ५. मिथ्या-छल-कपट प्रकट करने में - परिश्रमं नाम विनीय च क्षणम् (कुमार० ५.३२), क्षण भर थकावट को दूर करने का बहाना कर के । कार्तान्तिको नाम भूत्वा (दशकु०), कपट से ज्योतिषी बन कर । ६. आश्चर्य में - आश्चर्यमन्धो नाम पर्वतमRolesष्यति (काशिका ३.३.१५१), आश्चर्य है कि अन्धा होता हुआ भी पहाड़ पर चढ़ रहा है । आश्चर्यं बधिरो नाम व्याकरणमध्येष्यते (काशिका ३.३.- १५१) । आश्चर्यं यदि मूको नामाधीयीत (सि० कौ०) । ऐसे स्थलों पर शेषे लृड्यदौ (३.३.१५१) सूत्र से लूँट् का प्रयोग होता है । परन्तु 'यदि' शब्द का भी साथ में प्रयोग हो तो लिँङ् ही होता है । (४१) इव* । १. सादृश्य (के समान, की तरह) - छायेव तां भूपतिरन्वगच्छत् (रघु० २.६), छाया के समान राजा दिलीप उस नन्दिनी का अनुसरण करता था । असत्पुरुषसेवेव दृष्टिविफलतां गता (मृच्छ० १.३४), दुर्जन पुरुष की सेवा के समान दृष्टि अन्धकार में व्यर्थ अर्थात् असफल हो रही है । शुनः पुच्छमिव व्यर्थं जीवितं विद्यया विना (चाणक्य०), विद्या के बिना मनुष्य का जीवन कुत्ते की पूंछ की तरह व्यर्थ है । २. उत्प्रेक्षा (जैसा कि, मानो) - साक्षात् पश्यासीव पिनाकिनम् (शाकुन्तल० १.६), जैसा कि मानो मैं साक्षात् शिव को देख रहा हूं। वर्षतीवाञ्जनं नभः (मृच्छ० १.३४), आकाश मानो सुरमा बरसा रहा है । ३. स्वल्प - कडार इवायम् (गणरत्न०), यह कुछ कुछ पीला है । ४. वाक्यालंकार - कथमिवैतद्भविष्यति (गणरत्न०) । (४२) इति* । १. समाप्ति अर्थ में - इति रघुवंशे प्रथमः सर्गः । २. हेत्वर्थ में - वैदेशिकोऽस्मीति पृच्छामि (उत्तरराम० १), मैं विदेशी हूं इसलिये पूछ रहा हूं ।