लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५५८ भैमोव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् पुराणमित्येव न साधु सर्वम् (मालविका० १.२), पुराना है इसलिये सब ठीक नहीं होता। हन्तीति पलायते (नि० कौ०), मारता है इसलिये भागता है। अयं रत्नाकरोऽ- म्भोधिस्त्यिसेवि धनाशया । धन दूरेऽस्तु वदनमपूरि क्षारवारिभिः (साहित्य०)। शरीरस्य विनाशो मा भूदिति भयेदमुक्तिक्षप्य समानीतम् (कादम्बरी०) । ३ पूर्वोक्त या कथित के निर्देश में - इत्यममुं विलपन्तममुञ्चद् दीनदयालुतयाऽवनिपालः । रूपम- दर्शि धृतोऽसि यदर्थं गच्छ यथेच्छमयेत्यभिधाय (नैषध० १.१४३) । इत्युक्तवन्तं परिरभ्य दोर्भ्याम् (किरात० ११.८०) । ज्ञास्यसि कियद्भुजो मे रक्षति मौर्वीकिणाङ्क इति (शाकुन्त० १.१३) । ४ शब्दानिर्देश में-- सख्यशिश्वीति भाषायाम् (४.१.६२) । विदाङ्कुर्वन्वित्यन्यतरस्याम् (५७०) । अहो, अयो इति निपातेषु पठितौ। अमरा निर्जरा देवा इत्यमरः । ५ वक्ष्यमाण के निर्देश में - रामाभिधानो हरिरित्युवाच (रघु० १३.१) राम ने वक्ष्यमाण प्रकारेण वचन कहे । ६ के विषय में, के सम्बन्ध में - शीघ्रमिति सुकरं निभृतमिति चिन्तनीयम् (शाकुन्त० ३), जहां तक शीघ्रता का सम्बन्ध है वह आसान है पर जहां गुप्तरूप का सम्बन्ध है वह चिन्तनीय है। ७ विवक्षा में - तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप् (११८१), वह उस का है अथवा उस में है ऐसी विवक्षा होने पर प्रथमान्त समर्थ से मतुँप् प्रत्यय होता है। (४३) दिष्ट्या * । हर्ष का विषय, आनन्द का विषय, सौभाग्य - दिष्ट्या प्रतिहतममङ्गलम् (मालती० ४), हर्ष का विषय है कि अमङ्गल नष्ट हो गया है । दिष्ट्या धर्मपत्नीसमागमेन पुत्रमुखदर्शनेन चाऽऽयुष्मान् वर्धते (शाकुन्तल० ७) । दिष्ट्या सोऽयं महाबाहुरञ्जनानन्दवर्धनः । यस्य वीर्येण कृतिनो वय च भुवनानि च (उत्तरराम० १.३२) । यह विभक्तिप्रतिरूपक निपात है। (४४) नु* । १ सन्देहमिश्रित प्रश्न में - स्वप्नो नु माया नु मतिभ्रमो नु (शाकुन्तल० ६.१०), क्या यह स्वप्न था या कोई माया अथवा बुद्धि का व्यामोह ही था ? इस का 'किम्' शब्द या किम्शब्दोत्पन्न कथम्, क्व आदि शब्दो के साथ बहुधा प्रयोग उपलब्ध होता है । तब 'क्या' के साथ 'सम्भवतः' या 'वस्तुत' का भाव भी जुड़ा रहता है-ततो दुःखतरं नु किम् ? (गीता० २.३३), वस्तुत इस से अधिक और क्या दुख हो सकता है । क्व नु गुणवद् विन्देयं कलत्रम् (दशकु०), गुणवती भार्या को पाना कैसे मेरे लिये सम्भव हो सकेगा ? (४५-४६) यद्, तद् । चूंकि - इसलिये । यदचेतनोऽपि पादैः स्पृष्टः प्रज्व- लति सवितुरिनकान्तः । तत्तेजस्वी पुरुषः परकृतनिकृति कथं सहते (नीति० २६) । चूंकि अचेतन सूर्यकान्त भी सूर्य के पादों (किरणों) से छुआ हुआ जलने लग जाता है इसी कारण तेजस्वी पुरुष दूसरों के किये तिरस्कार को कैसे सह सकता है ? केवल 'यद्' का भी बहुत प्रयोग देखा जाता है - किं शेषस्य भरव्यथा न वपुषि क्ष्मा न क्षिपत्येष यत् (मुद्रा० २.१८), क्या शेषनाग के शरीर में भारजनित पीड़ा नहीं होती जो वह पृथ्वी को फेंक नहीं देता ।