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लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

५५६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् मृद्घटवत् सुखभेद्यो दुःसन्धानश्च दुर्जनो भवति। सुजनस्तु कनकघटवद् दुर्भेद्यश्चाशु सन्धेय (हितोप० १।६२)। ३ विशेषता या उच्चता प्रतिपादन करने में—मिष्टं पयो मिष्टतरं तु दुग्धम् (गणरत्न०), पानी मीठा होता है पर दूध उस से अधिक मीठा होता है। सकृदङ्गु ल्यग्रावाप्तावन्तिमस्तु पदे पदे (हितोप० प्रस्तावना १३)। ४ हेतु (क्योंकि)—वृद्धानां वचनं ग्राह्यमापत्काले ह्युपस्थिते। सर्वत्रैव विचारे तु भोजनेऽप्यप्र- वर्तनम् (हितोप० १।२३)। हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् (गीता० २।५)। ५ और अब (दूसरी तरफ)—अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम (गीता० १।७)। सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ (गीता० १८।३६)। ६ पादपूर्ति के लिये—अर्थेन तु विहीनस्य पुरुषस्याल्पमेधसः। क्रिया सर्वा विनश्यन्ति ग्रीष्मे कुसरितो यथा (हितोप० १।१२५)। (३८) ननु*। १ अवधारण (निश्चय ही, वस्तुत, सचमुच)—ननु प्रवातेऽपि निष्कम्पा गिरय (शाकुन्तल० ६), तूफान में भी निश्चय ही पर्वत निश्चल रहते हैं। ननु वज्रिण एव वीर्यमेतद् विजयन्ते द्विषतो यदस्य पक्षा (विक्रमो० १।१७), वस्तुत यह इन्द्र का ही बल है जो उस के पक्षपाती शत्रुओं पर विजय प्राप्त करते हैं। मन्नि- न्दया यदि जनः परितोषमेति नन्वप्रयत्नसुलभोऽयमनुग्रहो मे (शान्तिशतक), मेरी निन्दा में यदि लोग प्रसन्न होते हैं तो यह निश्चय ही मुझे बिना यत्न उन का अनुग्रह प्राप्त हो रहा है। ननु वक्तृविशेषनिःस्पृहा गुणगृह्या वचने विपश्चितः (किरात० २।५), सच- मुच भाषण के विषय में गुणग्राही विद्वज्जन वक्ता की ओर ध्यान नहीं दिया करते वे तो भाषण की सारसारता को ही देखा करते हैं। २ सम्बोधन—ननु मूर्खा पठितमेव युष्माभिस्तत्काण्डे (उत्तरराम० ४), ऐ मूर्खो ! उस काण्ड में यह विषय तो तुम पढ़ ही चुके हो। ३ प्रार्थना, याचना—ननु मां प्रापय पत्युरन्तिकम् (कुमार० ४।३२), कृपया मुझे मेरे पति के पास पहुँचा दो। ४ पूछताछ (Enquiry) करने में— ननु समाप्तकृत्यो गौतम (मालविका० ४), क्या गौतम ने अपना काम समाप्त कर लिया है ?। परवर्त्ती भारतीय तर्क शैली में प्राय 'ननु' से ही शङ्का का आरम्भ किया जाता है। (३६) हि*। १ केवल, सिर्फ—धर्मो हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीनाः पशुभि समाना (हितोप० १।२६)। मूढो हि मदनेनायास्यते (कादम्बरी०)। २. हेत्वर्थ में (क्योंकि)—अग्निरिहास्ति धूमो हि दृश्यते (गणरत्न०)। जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च (गीता० २।२७), हि=यतः। ३ अवधारण (ही, वस्तुतः, निश्चय से आदि)—न हि सुशिक्षितोऽपि वटुः म्वस्कन्धमारोढुं पटु (नीतिश० २२०)। देव प्रयोगप्रधानं हि नाट्यशास्त्रं किमत्र वाग्व्यवहारेण (मालविका० १)। प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम् (नीति० ५२)। ४ उदाहरण प्रदर्शन करन में— प्रजानामेव भूत्यर्थं स ताभ्यो वलिमग्रहीत्। सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते हि रसं रविः (रघु० १।१८)। ५ पादपूर्ति या वाक्यालङ्कार के लिये—भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि (गीता० १.११)। 'हि' का वाक्य के आदि में प्रयोग नहीं होता।

अव्यय-प्रकरणम् . ५५७ (४०) नाम* । १. नामक, नाम वाला, नाम से प्रसिद्ध - अस्ति दाक्षिणात्ये जनपदे महिलारोप्यं नाम नगरम् (पञ्च० १) । अस्ति मगधदेशे चम्पकवती नाम अरण्यानी (हितोप० १) । अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः (कुमार० १.१) । २. वस्तुतः - वीणा हि नाम असमुद्रोत्थितं हि रत्नम् (मृच्छ० ३), वीणा वस्तुतः एक ऐसा रत्न है जो समुद्र से उत्पन्न नहीं हुआ । विनीतवेषेण प्रवेष्ट- व्यानितपोवनानि नाम (शाकुन्तल० १), वस्तुतः तपोवन में विनीतवेष से प्रवेश करना चाहिये । तन्नाम निष्ठुराः पुरुषाः (मृच्छ० ५.३२), वस्तुतः पुरुष कठोर होते हैं । ३. सम्भावना - को नाम राज्ञां प्रियः (पञ्च० १.१५६) राजाओं का कौन प्यारा हो सकता है ? को नाम पाकाभिमुखस्य जन्तुर्द्वाराणि दैवस्य पिधातुमीष्टे (उत्तरराम० ७.४), जब दैव फल देने को उद्यत हो तो भला कौन पुरुष उस के द्वार बन्द कर सकता है ? अतनुषु विभवेषु ज्ञातयः सन्तु नाम (शाकुन्तल० ५.८), धन के आधिक्य में बन्धुओं के बन जाने की सम्भावना है । अये पदशब्द इव, मा नाम रक्षिणः (मृच्छ० ३), अरे पांव की आहट सुनाई दे रही है । मेरे विचार में रक्षी का शब्द न होगा । ४. अपमानाश्रित क्रोध प्रकट करने में - ममापि नाम दशाननस्य परैः परिभवः (गण- रत्न०), क्या शत्रुओं द्वारा मुझ रावण का भी तिरस्कार ! । ममापि नाम सत्त्वैरभि- सूयन्ते गृहाः (शाकुन्तल० ६), क्या हमारे भवनों पर भी भूतों द्वारा आक्रमण किया जा रहा है ? ५. मिथ्या-छल-कपट प्रकट करने में - परिश्रमं नाम विनीय च क्षणम् (कुमार० ५.३२), क्षण भर थकावट को दूर करने का बहाना कर के । कार्तान्तिको नाम भूत्वा (दशकु०), कपट से ज्योतिषी बन कर । ६. आश्चर्य में - आश्चर्यमन्धो नाम पर्वतमRolesष्यति (काशिका ३.३.१५१), आश्चर्य है कि अन्धा होता हुआ भी पहाड़ पर चढ़ रहा है । आश्चर्यं बधिरो नाम व्याकरणमध्येष्यते (काशिका ३.३.- १५१) । आश्चर्यं यदि मूको नामाधीयीत (सि० कौ०) । ऐसे स्थलों पर शेषे लृड्यदौ (३.३.१५१) सूत्र से लूँट् का प्रयोग होता है । परन्तु 'यदि' शब्द का भी साथ में प्रयोग हो तो लिँङ् ही होता है । (४१) इव* । १. सादृश्य (के समान, की तरह) - छायेव तां भूपतिरन्वगच्छत् (रघु० २.६), छाया के समान राजा दिलीप उस नन्दिनी का अनुसरण करता था । असत्पुरुषसेवेव दृष्टिविफलतां गता (मृच्छ० १.३४), दुर्जन पुरुष की सेवा के समान दृष्टि अन्धकार में व्यर्थ अर्थात् असफल हो रही है । शुनः पुच्छमिव व्यर्थं जीवितं विद्यया विना (चाणक्य०), विद्या के बिना मनुष्य का जीवन कुत्ते की पूंछ की तरह व्यर्थ है । २. उत्प्रेक्षा (जैसा कि, मानो) - साक्षात् पश्यासीव पिनाकिनम् (शाकुन्तल० १.६), जैसा कि मानो मैं साक्षात् शिव को देख रहा हूं। वर्षतीवाञ्जनं नभः (मृच्छ० १.३४), आकाश मानो सुरमा बरसा रहा है । ३. स्वल्प - कडार इवायम् (गणरत्न०), यह कुछ कुछ पीला है । ४. वाक्यालंकार - कथमिवैतद्भविष्यति (गणरत्न०) । (४२) इति* । १. समाप्ति अर्थ में - इति रघुवंशे प्रथमः सर्गः । २. हेत्वर्थ में - वैदेशिकोऽस्मीति पृच्छामि (उत्तरराम० १), मैं विदेशी हूं इसलिये पूछ रहा हूं ।

५५८ भैमोव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् पुराणमित्येव न साधु सर्वम् (मालविका० १.२), पुराना है इसलिये सब ठीक नहीं होता। हन्तीति पलायते (नि० कौ०), मारता है इसलिये भागता है। अयं रत्नाकरोऽ- म्भोधिस्त्यिसेवि धनाशया । धन दूरेऽस्तु वदनमपूरि क्षारवारिभिः (साहित्य०)। शरीरस्य विनाशो मा भूदिति भयेदमुक्तिक्षप्य समानीतम् (कादम्बरी०) । ३ पूर्वोक्त या कथित के निर्देश में - इत्यममुं विलपन्तममुञ्चद् दीनदयालुतयाऽवनिपालः । रूपम- दर्शि धृतोऽसि यदर्थं गच्छ यथेच्छमयेत्यभिधाय (नैषध० १.१४३) । इत्युक्तवन्तं परिरभ्य दोर्भ्याम् (किरात० ११.८०) । ज्ञास्यसि कियद्भुजो मे रक्षति मौर्वीकिणाङ्क इति (शाकुन्त० १.१३) । ४ शब्दानिर्देश में-- सख्यशिश्वीति भाषायाम् (४.१.६२) । विदाङ्कुर्वन्वित्यन्यतरस्याम् (५७०) । अहो, अयो इति निपातेषु पठितौ। अमरा निर्जरा देवा इत्यमरः । ५ वक्ष्यमाण के निर्देश में - रामाभिधानो हरिरित्युवाच (रघु० १३.१) राम ने वक्ष्यमाण प्रकारेण वचन कहे । ६ के विषय में, के सम्बन्ध में - शीघ्रमिति सुकरं निभृतमिति चिन्तनीयम् (शाकुन्त० ३), जहां तक शीघ्रता का सम्बन्ध है वह आसान है पर जहां गुप्तरूप का सम्बन्ध है वह चिन्तनीय है। ७ विवक्षा में - तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप् (११८१), वह उस का है अथवा उस में है ऐसी विवक्षा होने पर प्रथमान्त समर्थ से मतुँप् प्रत्यय होता है। (४३) दिष्ट्या * । हर्ष का विषय, आनन्द का विषय, सौभाग्य - दिष्ट्या प्रतिहतममङ्गलम् (मालती० ४), हर्ष का विषय है कि अमङ्गल नष्ट हो गया है । दिष्ट्या धर्मपत्नीसमागमेन पुत्रमुखदर्शनेन चाऽऽयुष्मान् वर्धते (शाकुन्तल० ७) । दिष्ट्या सोऽयं महाबाहुरञ्जनानन्दवर्धनः । यस्य वीर्येण कृतिनो वय च भुवनानि च (उत्तरराम० १.३२) । यह विभक्तिप्रतिरूपक निपात है। (४४) नु* । १ सन्देहमिश्रित प्रश्न में - स्वप्नो नु माया नु मतिभ्रमो नु (शाकुन्तल० ६.१०), क्या यह स्वप्न था या कोई माया अथवा बुद्धि का व्यामोह ही था ? इस का 'किम्' शब्द या किम्शब्दोत्पन्न कथम्, क्व आदि शब्दो के साथ बहुधा प्रयोग उपलब्ध होता है । तब 'क्या' के साथ 'सम्भवतः' या 'वस्तुत' का भाव भी जुड़ा रहता है-ततो दुःखतरं नु किम् ? (गीता० २.३३), वस्तुत इस से अधिक और क्या दुख हो सकता है । क्व नु गुणवद् विन्देयं कलत्रम् (दशकु०), गुणवती भार्या को पाना कैसे मेरे लिये सम्भव हो सकेगा ? (४५-४६) यद्, तद् । चूंकि - इसलिये । यदचेतनोऽपि पादैः स्पृष्टः प्रज्व- लति सवितुरिनकान्तः । तत्तेजस्वी पुरुषः परकृतनिकृति कथं सहते (नीति० २६) । चूंकि अचेतन सूर्यकान्त भी सूर्य के पादों (किरणों) से छुआ हुआ जलने लग जाता है इसी कारण तेजस्वी पुरुष दूसरों के किये तिरस्कार को कैसे सह सकता है ? केवल 'यद्' का भी बहुत प्रयोग देखा जाता है - किं शेषस्य भरव्यथा न वपुषि क्ष्मा न क्षिपत्येष यत् (मुद्रा० २.१८), क्या शेषनाग के शरीर में भारजनित पीड़ा नहीं होती जो वह पृथ्वी को फेंक नहीं देता ।

अव्यय-प्रकरणम् ५५६ (४७) यदपि = यद्यपि । वक्रः पन्था यदपि भवतः प्रस्थितस्योत्तरास्याम् (मेघ० १.२७) । (४८-४६) ते, मे । ये दोनों विभक्तिप्रतिरूपक निपात हैं जो क्रमशः 'त्वया' और 'मया' के अर्थों में प्रयुक्त होते हैं । श्रुतं ते वचनं तस्य (वामनवृत्ति ५.२.१०), त्वया तस्य वचनं श्रुतमित्यर्थः । वेदानधीत इति नाधिगतं पुरा मे (वही, ५.२.१०), मे = मया । बिलस्य वाणी न कदापि मे श्रुता (पञ्च० ३.२१२), मया न श्रुतेत्यर्थः । श्रुतं ते राजशार्दूल । श्रुतं मे भरतर्षभ (गणरत्न०) । वामन ने अपने सूत्रों में भी इन को निपात माना है—ते-मे-शब्दौ निपातेषु (वामनसूत्र० ५.२.१०) । (५०) मम = मेरा । इसे निपात मान कर 'ममत्व, ममता, निर्मम' आदि शब्द सिद्ध होते हैं - क्षुद्रेऽपि नूनं शरणं प्रपन्ने ममत्वमुच्चैः शिरसां सतीव (कुमार० १.१२), ममशब्दात् त्वप्रत्यय इति मल्लिनाथः । ममेति षष्ठ्यन्तप्रतिरूपको निपात इति वल्लभः । (५१) वाम् = तुम दोनों । इसे भी कई वैयाकरण विभक्तिप्रतिरूपक निपात मानते हैं । गेये केन विनीतौ वाम् (रघु० १५.६६), वाम् = युवाम् इत्यर्थः । प्रथमा के द्विवचन में 'वाम्' दुर्लभ है अतः इसे निपात माना है। (५२) अस्तु = १. स्वीकृति—एवमस्तु को नाम दोषः (गणरत्न०) । अस्तु- द्वारः = 'अस्तु' करने वाला । अस्तोश्चेति वक्तव्यम् इति वार्तिकेन मुँम् । अस्विति तिङन्तप्रतिरूपकमव्ययम् इति तत्त्वबोधिनी । २. असूया (क्रोध) - अस्तु ज्ञास्यसि कालेन सोऽल्पेनेव न भूयसा (मूलं मृग्यम्) । ३. पीड़ा (दुःख) - अस्तु नाम विधुरेण वेधसा साधुरप्यलमुपाधिभिर्भृशम् । बाध्यते- (मूलं मृग्यम्), दुःख का विषय है कि प्रतिकूल दैव सज्जन को भी नाना छलों से बहुत दुःखी करता है । ४, निषेध- अस्तु साम्ना (गणरत्न०), अब सामप्रयोग (शान्त्युपाय) को रहने दो इस से कुछ सिद्ध न होगा । (५३) नास्ति = अविद्यमान । यह भी तिङन्तप्रतिरूपक निपात है। इसी से 'नास्तिकः, नास्तिवादः, नास्तिक्यम्, नास्तिक्षीरा' प्रभृति शब्द सिद्ध होते हैं। देखें पाणिनिसूत्र-अस्ति-नास्ति-दिष्टं मतिः (४.४.६०) । (५४) येन = जिस से । वितर गिरमुदारां येन मूकाः पिकाः स्युः (गणरत्न०), ऐसी वाणी बोलो जिस से कोयलें चुप हो जायें । (५५) तेन = इस से, इस कारण से । अपराधोऽहमत्रभवत्सु, न च मर्षितः, तेन तप्ये नितान्तम् (न्या० च०) । येन दाता तेन श्लाघ्यः (गणरत्न०)। (५६) अकस्मात्* = अचानक, एकदम, विना कारण के । इक्ष्वाकुवंशप्रभवः कथं त्वां त्यजेदकस्मात् पतिरार्यवृत्तः (रघु० १४.५५) । नाऽकस्माच्छाण्डिली मातर्विक्री- णाति तिलैस्तिलान् (पञ्च० २.७२)। अकस्माद्भवः-आकस्मिकः । (५७) प्रसह्य* = बलपूर्वक, जबरदस्ती । प्रसह्य मणिमुद्धरेद् मकरवक्त्रदंष्ट्रान्त- रात् (नीति० ३) । प्रसह्य सिंहः किल तां चकर्ष (रघु० २.२७) । प्रसह्य वित्तानि

५६० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् हरन्ति चोरा (हेमचन्द्र)। इसी से ही 'प्रसह्यकारी, प्रसह्याहरणम्' आदि शब्द बनते हैं। (५८) अह्नाय शीघ्र, फौरन। अह्नाय तावदहनेन तमो निरस्तम् (रघु० ५।७१)। (५९) व — सदृश। मणीव उष्ट्रस्य लम्बेते प्रियो वत्सतरी मम (महाभारत १२ ।७२।१२)। अत्र तु इवार्थे वशब्दो वाशब्दो वा बोध्य —सि० कौ०। (६०) समन्तात्* = चारों ओर¹। हेमचन्द्र ने इसे विभक्तिप्रतिरूपक निपात माना है। लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्तात् (गीता० ११।३०)। कालागुरूद्गर्हनमध्यगत समन्तात् लोकोत्तर परिमलं प्रकटीकरोति (भामिनी० १।६६)। (६१) भवतु अलम् (बम निषेध) का अर्थ। गोत्रेण पुष्करावर्त्त ! किं त्वया गर्जितं कृतम्। विद्युताऽत्र भवत्वङ्गिहिंसा ऊर्द्धबिलं घनम् (दृष्टा०)। (६२) बलवत् पूरी तरह से, पूर्णरूपेण। बलवदपि शिक्षितानामात्मन्यप्रत्ययं चेत (शाकुन्त० १।२)। पुनर्बशित्वाद् बलवन्निगृह्य (कुमार० ३ ६६)। (६३) तदपि — तो भी। तदपि तव गुणानामीश पारं न याति (शिवमहिम्न स्तोत्र)। (६४) यस्मात् = जिस कारण से, क्योकि। अवजानासि मां यस्मादतस्ते न भविष्यति। मत्प्रसूतिमणाराध्य प्रजेति त्वां शशाप सा (रघु० १ ।७७)। (६५) तस्मात् — इसलिये। तस्माद् युध्यस्व भारत (गीता० २ १८)। (६६) या (स्)। १ स्मरण में—आ, उपनयतु भवान् भूर्जपत्रम् (विक्रमो० २)। २ क्रोध प्रकट करने में—आ कथमद्यापि राक्षसत्रास (उत्तरराम० १)। आ पापे तिष्ठ तिष्ठ (मालती० ८)। ३ क्रोधपूर्वक अपाकरण में—आ क एष मयि स्थिते चन्द्रमभिभवितुमिच्छति बलात् (मुद्रा० १)। आ ! धूयामङ्गलपाठक (वेणी० १)। ४ सन्ताप (दुःख) प्रकट करने में—विद्यामातरमा प्रदर्श्य नृपशून् भिक्षामहे निस्त्रपा (उद्भट)। (आ स्मरणेऽपाकरणे कोपसन्तापयोस्तथा—इति मेदिनी)। (६७) ही। विस्मय म—हतविधिलसितानां ही विचित्रो विपाक (माघ० ११।६४), आश्चर्य है कि अभाग विधाता की चेष्टाआ का विचित्र फल है। (६८) वै* = अवधारण (ही)—पिता वै गार्हपत्योऽग्नि (मनु० २ ।२३१)। आपो वै नरसूनवः (मनु० १ ।१०)। आत्मा वै पुत्रनामासि (कौषी० ब्रा० २ ।१६)। (६९) किञ्च* = और भी, इसके व्यतिरिक्त, पुनः। किञ्च सर्वगुणसम्पन्नोऽपि भेदेन बध्यते (पञ्च० ४)। किञ्च काव्यस्योपादेयत्वमग्निपुराणेऽप्युक्तम् (साहित्य० १)। किञ्च काव्याद् धर्मप्राप्तिर्भगवान्नारायणचरणारविन्दवन्दनादिना (साहित्य० १)। (७०) यदि* = अगर (पक्षान्तर) —यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोष १ इसी अर्थ में 'समन्ततः' अव्यय भी बहुत प्रसिद्ध है। यथा—मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः (गीता० ६ २४)। समन्ततस्तु परितः सर्वतो विश्वगित्यपि-- इत्यमरः। समन्तादिति समन्ततः आद्यादित्वात्तसिरित्यमरव्याख्यायां नानूजि- दीक्षितः।

अव्यय-प्रकरणम् ५६१ (पञ्च० २.१३८) । नोलूकोऽप्यवलोकते यदि दिवा सूर्यस्य किं दूषणम् (नीति० ६३)। (७१) यद्यपि = अगरचे, यद्यपि — यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः (गीता० १.३७)। यद्यपि बहु नाधीषे तथापि पठ पुत्र व्याकरणम् । स्वजनः श्वजनो मा भूत्सकलं शकलं सकृच्छकृत् (सुभाषित०)। (७२) यद्वा* = अथवा । यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः (गीता० २.६) । (७३) यदि वा* = अथवा । स्नेहं दयां च सौख्यं च यदि वा जानकीमपि । आराधनाय लोकानां मुञ्चतो नास्ति मे व्यथा (उत्तरराम० १.१२) । (७४) अथवा* । १. 'वा' के अर्थ में—व्यवहारं परिज्ञाय वध्यः पूज्योऽथवा भवेत् (हितोप० १.५८)। २. पक्षान्तर में—अथवा कृतवाग्द्वारे वंशेऽस्मिन् पूर्वसूरिभिः (रघु० १.४) । (७५) वारं वारम्* = बारंबार—मनसि विचारय वारं वारम् (चर्पट० ११)। (७६) प्रेत्य । १. परलोक—अन्यो धनं प्रेत्यगतस्य भुङ्क्ते (गणरत्न०)। २. इस संसार से गया हुआ—प्रेत्यभावः, प्रेत्यलोकः । प्रेत्यामुत्र भवान्तरे इत्यमरः । (७७) पुरतः (स्)* = सामने, आगे । यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरतो मा ब्रूहि दीनं वचः (नीति०)। स्यात्पुरः पुरतोऽग्रतः—इत्यमरः । (७८) प्रायेण* = प्रायः, अक्सर, बहुधा । प्रायेणाऽधममध्यमोत्तमगुणः संवासतो जायते (पञ्च० १.२७३) । प्रायेण नीचा व्यसनेषु मग्ना निन्दन्ति दैवं न तु दुष्कृतं स्वम् (महाभारत० ८.६१.१) । वामन शिवराम आप्टे आदि कोषकारों ने इसे अव्यय माना है। परन्तु अनेक वैयाकरण 'प्राय' (पुं०) शब्द से प्रकृत्यादिभ्य उपसंख्यानम् (वा०) द्वारा तृतीया विभक्ति हुई मान कर इसे अव्यय नहीं मानते । (७६) प्रायशः (स्)* = प्रायः, अक्सर, बहुधा । आशाबन्धः कुसुमसदृशं प्रायशो ह्यङ्गनानां सद्यःपाति प्रणयि हृदयं विप्रयोगे रुणद्धि (मेघ० १.१०) । इसे तद्धितशस्-प्रत्ययान्त माना जा सकता है। तब तद्धितश्चासर्वविभक्तिः (३६८) से अव्यय- संज्ञा हो जायेगी । (८०) वस्तुतः (स्)* = यथार्थतः, दर असल, हकीकत में, सत्यतः, मूलतः— वस्तुतः लृकारस्य ऋकारग्राहकत्वं न कुत्राप्युपलभ्यते (तत्त्वबोधिनी संज्ञाप्रकरण) । (८१) अथ किम्* = जी हां । सर्वथा अप्सरःसम्भवैषा । अथ किम् (शाकुन्तल० १)। अपि वृषलमनुरक्ताः प्रकृतयः ? अथ किम् (मुद्रा० १)। (८२) अन्वक् = पीछे । तां देवतापितॄतिथिक्रियार्थामन्वग्ययौ मध्यमलोकपालः (रघु० २.१६)। अन्वगन्वक्षमनुगेऽनुपदं क्लीबमव्ययम्—इत्यमरः । (८३) अपि वा* = अथवा । हेम्नः संलक्ष्यते ह्यग्नौ विशुद्धिः श्यामिकापि वा (रघु० १.१०)। (८४) कस्मात्* = क्यों, किस कारण, किस लिये । अचेतनं नाम गुणं न लक्षयेन्मयैव कस्मादवधीरिता प्रिया (शाकुन्तल० ६.१३) । इस विभक्तिप्रतिरूपक ल० प्र० (३६)

५६२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् अव्यय से नञ्समास हो कर 'अकस्मात्' अव्यय बनता है। पुन इस अव्यय से अकस्माद्भव आकस्मिक (विनयादित्वाट् ठकि टेलोप ) सिद्ध होता है । (८५) प्रगे = प्रात काल, सुबह सवेरे । साय स्नायात् प्रगे तथा (मनु० ६ ६)। इसी से ही 'प्रगेशय' (प्रभात मे सोने वाला) आदि निष्पन्न होते हैं । सायंचिरंप्राह्णे- प्रगेऽव्ययेभ्यष्ट्युट्तुलौ तुट् च (१०८३) सूत्र मे अनव्यय प्रगशब्द को एत्व निपातन किया गया है । (८६) परश्व (स्)* = आगामी कल से अगला दिन, परसो । परश्वो यास्यति मुनि । अनागतेऽह्नि श्व. परश्वश्च परेऽहनि— इत्यमर । (८७) साक् = शीघ्र । साक् सरन्त्यभिसारिका. (हेमचन्द्र) । (८८) अरम् = शीघ्र । अर याति तुरङ्गम (हेमचन्द्र) । (८९) रह (स्)* = एकान्त एकान्त मे, चुपके से । अत परीक्ष्य कर्तव्य विशेषात् सगत रह (शाकुन्तल० ५ २४)। रहो भव रहस्यम्, दिगादित्वाद्यत् । रहस् शब्द सकारान्त नपुसक भी होता है। यथा—रहस्यानुज्ञामधिगम्य भूभृत. (किरात० १ ३) । (९०) उपजोषम् = १. अपनी इच्छा के अनुसार, स्वेच्छा से । यथोपजोषं वासांसि परिधाय— (भागवत० ८ ६ १५), अपनी इच्छानुसार वस्त्र धारण करके । २ 'दिष्ट्या' के अर्थ मे—उपजोषं ते पुत्रो जातः (हेमचन्द्र), बडे आनन्द की बात है कि तेरा पुत्र उत्पन्न हुआ है। 'समुपजोषम्' भी देखा जाता है। दिष्टया समुपजोषञ्चे- त्यानन्दे— इत्यमर । स्वरादियो और चादियों का ठीक तरह से पृथक् २ निरूपण एक दुष्कर कार्य है। कुछ स्वरादि शब्द चादियो में तथा कुछ चादि शब्द स्वरादियो मे मिश्रित हो गये हैं। कुछ शब्द तो दोनो ही गणो मे पढे गये हैं। परन्तु यहा यह ज्ञातव्य है कि जिन मे निपातस्वर (आद्युदात्त) दृष्ट हो उन्हे चादियो मे तथा जिन मे अन्तोदात्त- स्वर दृष्ट हो उन्हें स्वरादियो मे गिनना चाहिये । किञ्च जहा दोनो प्रकार के स्वर अभीष्ट हो उन को दोनो ही गणो मे पढना चाहिये¹। इन चादियो से अतिरिक्त अन्य भी बहुत से निपात होते हैं। उन सब की भी स्वरादिनिपातमव्ययम् (३६७) सूत्र से अव्ययसज्ञा हो जाती है। इन सब का विवेचन जानने के इच्छुक प्राग्रीश्वरान्निपाताः (१ ४ ५६) के अधिकार को अष्टाध्यायी या वार्तिकावृत्ति मे देखें² । १. परन्तु यह स्वरव्यवस्था अनेकाच् शब्दो के लिये ही समझनी चाहिये एकाच् शब्दो के लिये नही, क्योकि एकाच् शब्दो मे चाहे आद्युदात्त स्वर हो या अन्तोदात्त, कोई अन्तर ही नही पडता । २ निपातो के विषय में एक सूक्ति बहुत प्रसिद्ध है— इयन्त इति सख्यान निपातानां न विद्यते । प्रयोजनवशादेते निपात्यन्ते पदे पदे॥

अव्यय-प्रकरणम् ५६३ प्र आदि शब्द भी निपाताधिकार में प्रादयः (५४) सूत्रद्वारा निपातसंज्ञक होकर अव्ययसंज्ञक हो जाते हैं। इन प्र आदियों का क्रिया के योग में तथा कुछ का क्रियायोग के अभाव में भी स्वतन्त्ररीत्या प्रयोग हुआ करता है। क्रिया के योग में उन की उपसर्गाः क्रियायोगे (३५) सूत्र से उपसर्गसंज्ञा विशेष है। निपातसंज्ञा तो दोनों अवस्थाओं में ही अक्षुण्ण बनी रहती है। अब प्रादियों में क्रियायोग के अभाव में स्वतन्त्रतया प्रयुक्त होने वाले कुछ प्रसिद्ध २ निपातों का विवेचन करते हैं— (१) अनु । १. पीछे—विष्णोः पश्चाद् अनुविष्णु (सि० कौ०)। आश्वास्यादौ तदनु कथयेर्माधवीयामवस्थाम् (मालती० ६.२६)। २. के साथ साथ (लम्बाई में)— अनुगङ्गं वाराणसी (व्या० च०), गङ्गातट के साथ साथ बनारस बसा हुआ है। ३. हीन अर्थ में—अनु पाणिनिमन्वे वैयाकरणाः (व्या० च०), अन्य वैयाकरण पाणिनि से नीचे हैं। अन्वर्जुनं धानुष्काः (व्या० च०), अन्य धनुर्धारी अर्जुन से हीन हैं। इसी प्रकार—अन्वाम्रं फलानि आदि । ४. लक्षण (निशानी) अर्थ में—वृक्षमनु विद्योतते विद्युत् (काशिका), बिजली वृक्ष के समीप चमक रही है। इसी प्रकार—क्रमेण सुप्तामनु संविवेश सुप्तोत्थितां प्रातरनूदतिष्ठत् (रघु० २.२४)। ५. इत्थम्भूताख्यान (वह इस तरह का है—इस प्रकार कहने) में—साधुर्देवदत्तो मातरमनु, देवदत्त माता के प्रति सद्व्यवहारी है। ६. भाग (हिस्सा) अर्थ में—लक्ष्मीर्हरिमनु (सि० कौ०), लक्ष्मी विष्णु का भाग है। ७. वीप्सा—वृक्षं वृक्षमनु सिञ्चति (सि० कौ०), प्रत्येक वृक्ष को सींचता है। ८. हेतुयुक्त अनन्तर अर्थ में—जपमनु प्रावर्षत् (सि० कौ०), जप के कारण जप के बाद वर्षा हुई । ६. के अनुसार—अनुक्रमम्, अनुज्येष्ठम्, अनु- रूपम् । इस के अन्य भी अनेक अर्थ आकरग्रन्थों में देखें। ध्यान रहे कि प्रायः इन अर्थों में इस की कर्मप्रवचनीयसंज्ञा हो जाती है तब कर्मप्रवचनीययुक्ते द्वितीया (२.३.८) सूत्र से इस के योग में द्वितीया विभक्ति हो जाती है। विशेष सिद्धान्तकौमुदी में देखें । (२) आङ् = आ । १. ईषत् (थोड़ा) अर्थ में—ओष्णम् (ईषदूष्णम्—कुछ गरम)। २. मर्यादा अर्थ में—ओदकान्ताद् आवनान्ताद्वा प्रियं प्रोष्यमनुव्रजेत् (धर्म- शास्त्रे), तालाब या वन के अन्त तक प्रवास करते बन्धु के साथ जाये। इसीप्रकार— आ परितोषाद् विदुषां न साधु मन्ये प्रयोगविज्ञानम् (शाकुन्तल० १.२) । आ विन्ध्याद् उत्तरपथः । ३. अभिविधि अर्थ में—आ कुमाराद् यशः पाणिनेः, पाणिनि का यश बच्चों तक अर्थात् बच्चों को भी अभिव्याप्त कर रहा है। इसीप्रकार—आमूलाच्छ्रोतु- मिच्छामि (शाकुन्तल० १) । मर्यादा और अभिविधि अर्थों में आङ् मर्यादावचने (१.४.८८) से आङ् की कर्मप्रवचनीयसंज्ञा हो जाती है तब इस के योग में पञ्चम्यपाङ्परिभिः (२.३.१०) सूत्र से पञ्चमीविभक्ति हो जाती है । (३) अधि । १. स्व-स्वामिभाव सम्बन्ध में—अधि ब्रह्मदत्ते पाञ्चालाः (काशिका), पाञ्चालदेश ब्रह्मदत्त के अधीन है। अधि पाञ्चालेषु ब्रह्मदत्तः (काशिका), ब्रह्मदत्त पाञ्चालदेश का अधिकृत राजा है। इसी प्रकार—अधि रामे भूः, अधि भुवि रामः (सि० कौ०) । ध्यान रहे कि यहां अधिरेरीश्वरे (१.४.६६) सूत्र से 'अधि' की

५६४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् कर्मप्रवचनीयसञ्ज्ञा होकर उस के योग में यस्मादधिकं यस्य चेश्वरवचनं तत्र सप्तमी (२.३.९) द्वारा कभी स्वामिवाचक से तथा कभी स्ववाचक से सप्तमी विभक्ति हो जाती है। २ मे, के विषय मे—हरौ इत्यधिहरि (हरि मे या हरि के विषय मे)। यद्यप्यव्ययीभावसमास के नित्य होने से लौकिकविग्रह मे 'अधि' लिखा नहीं जा सकता। (४) अपि। १ प्रश्न मे—अपि सन्निहितोऽत्र कुलपतिः (शाकुन्तल० १), क्या कुलपति आश्रम में हैं ? अप्यग्रणीर्मन्त्रकृतामृषीणां कुशाग्रबुद्धे कुशली गुरुस्ते ? (रघु० ५.४)। अपि क्रियार्थं सुलभं समित्कुशम् (कुमार० ५.३३)। २ थोड़ा, स्तोक, बिन्दु, ज़रा सा अंश आदि अर्थों मे—सर्पिषोऽपि स्यात्, मधुनोऽपि स्यात् (काशिका), घृत का अंश होगा, मधु का अंश होगा। ३ कामचारानुज्ञा—अपि सिञ्च अपि स्तुहि (काशिका), तुम्हारी इच्छा है सीचो या स्तुति करो। ४ सम्भावना प्रकट करने मे (शायद)—अपि नाम कुलपतेरियमसवर्णक्षेत्रसम्भवा स्यात् (शाकुन्तल० १)। अपि नाम रामभद्र पुनरपीदं वनमलङ्कुर्यात् (उत्तरराम० २)। ५ समुच्चय (भी)— अस्ति मे सोदरस्नेहोऽप्येतेषु (शाकुन्तल० १)। विष्णुशर्मणापि पाठितास्ते राजपुत्रा (पञ्च० प्रस्तावना)। ६ चाहे हो—अपि धन्वन्तरिर्वैद्यः किं करोति गतायुषि (सुभाषित०)। अपि ग्रावा रोदित्यपि दलति वज्रस्य हृदयम् (उत्तरराम० १.२८)। ७ जोर या Stress देने के लिये—विधुरपि विधियोगाद् ग्रस्यते राहुणासौ (हितोप० १.१६)। यूयमप्यनेन कर्मणा परिश्रान्ताः (शाकुन्तल० १)। ८. कवियों द्वारा विरो- धाभास प्रदर्शित करने मे—खर्वामपि अखर्वपराक्रमाम्, श्यामामपि यशःसमूहैःश्वेतीकृत- त्रिभुवनाम् (शिवराज० २)। ६. 'किम्' के साथ लग कर अनिश्चय मे—व्यतिषजति पदार्थानान्तरः कोऽपि हेतुः (उत्तरराम० ६.१२)। केऽपि एते प्रययसः त्वां विदूषय- (उत्तरराम० ४)। (५) अभि। १ लक्षण (निशानी)—वृक्षमभि विद्योतते विद्युत् (काशिका), वृक्ष के सामने बिजली चमक रही है। २ इत्थम्भूताख्यान—साधुर्देवदत्तो मातरमभि (काशिका)। ३ वीप्सा—वृक्षं वृक्षमभि सिञ्चति। ४ आभिमुख्य मे—अग्निमभि शलभाः पतन्ति (काशिका), पतङ्गे अग्नि के अभिमुख गिर रहे हैं। आभिमुख्य अर्थ मे वैकल्पिक अव्ययीभावसमास का भी विधान है—अभ्यग्नि शलभाः पतन्ति। लक्ष- णादि अर्थों मे 'अभि' की कर्मप्रवचनीयसञ्ज्ञा होकर उस के योग में द्वितीया विभक्ति हो जाती है। (६) प्रति। १ लक्षण—वृक्षं प्रति विद्योतते विद्युत् (काशिका)। तौ दम्पती स्वां प्रति राजधानीं प्रस्थापयामास वशी वसिष्ठः (रघु० २.७०)। मन्दोत्सुक्योऽस्मि नगरगमनं प्रति (शाकुन्तल० १)। २ इत्थम्भूताख्यान—साधुर्देवदत्तो मातरं प्रति (काशिका)। ३. भाग—यदन्र मा प्रति स्यात्तद् दीयताम् (काशिका), इस में मेरा जो हिस्सा हो वह दीजिये। ४ वीप्सा—वृक्षं वृक्षं प्रति सिञ्चति। ५. प्रतिनिधि— अभिमन्युरर्जुनत प्रति (काशिका), अभिमन्यु अर्जुन का प्रतिनिधि है। प्रद्युम्नो वासु- देवतः प्रति (काशिका), प्रद्युम्न वासुदेव का प्रतिनिधि है। ६ प्रतिदान (बदले में

अव्यय-प्रकरणम् ५६५ देना)—तिलेभ्यः प्रति यच्छति माषान् (काशिका), तिलों के बदले माष देता है। शेफालिभ्यो ददुर्लास्यं प्रति गन्धाच्च मारुताः (व्या० च०), वायु ने शेफालिका से गन्ध ले कर उस के बदले उन्हें नृत्य दे दिया। ७. आभिमुख्य में — अग्नि प्रति शलभाः पतन्ति, प्रत्यग्नि शलभाः पतन्ति । पूर्ववत् वैकल्पिक अव्ययीभावसमास हो जाता है। (७) परि । १. लक्षण (निशानी) — वृक्षं परि विद्योतते विद्युत् (काशिका), वृक्ष पर बिजली चमक रही है। २. इत्थम्भूताख्यान — साधुर्देवदत्तो मातरं परि । ३. भाग—यदत्र मां परि स्यात्तद्दीयताम्, इस में मेरा जो भाग है वह दे दीजिये । ४. वीप्सा — वृक्षं वृक्षं परि सिञ्चति । ५. मर्यादा — परि त्रिगर्तेभ्यो वृष्टो देवः, त्रिगर्त- देश तक (पर त्रिगर्त को छोड़ कर) मेघ बरसा । ६. दुःखी, तंग — परिग्लानोऽध्ययनाय =पर्यध्ययनः² । (८) अप। तक, मर्यादा अर्थ में- अप त्रिगर्तेभ्यो वृष्टो देवः, त्रिगर्तदेश तक (पर त्रिगर्त में नहीं) मेघ बरसा । अपपरी वर्जने (१.४.८७) से कर्मप्रवचनीयसंज्ञा हो कर उस के योग में — पञ्चम्यपाङ्परिभिः (२.३.१०) से पञ्चमी हो जाती है। (९) उप। १. हीन, निम्न — उप हरिं सुराः (सि० कौ०), देवता हरि से निम्नकोटि के हैं। शक्रादय उपाच्युतम् (वोपदेव), इन्द्र आदि भगवान् विष्णु से निम्न- स्तर के हैं। २. अधिक—उप परार्धे हरेर्गुणाः (सि० कौ०), हरि के गुण परार्धसंख्या से भी अधिक हैं। यस्मादधिकं यस्य चेश्वरवचनं तत्र सप्तमी (२.३.६) इस सूत्र से अधिक अर्थ के वाचक उप के योग में सप्तमी विभक्ति हो जाती है। (१०) अति । १. अतिशय, आधिक्य — अतिदानाद् बलिर्बद्धो नष्टो मानात् सुयोधनः । विनष्टो रावणो लौल्याद् अति सर्वत्र वर्जयेत् (चाणक्य०) । नातिदूरे = बहुत दूर नहीं = निकट । २. अतिक्रमण में--अति देवांस्ते मनुजाः परार्थे ये तनुत्यजः(व्या० च०), वे मनुष्य देवताओं का अतिक्रमण कर जाते हैं जो दूसरों के लिये प्राण देते हैं। अति देवान् कृष्णः (सि० कौ०) । श्रिया समानान् अति सर्वान् स्याम् (अथर्व० ११.१.२१), मैं लक्ष्मी में समान लोगों से आगे बढ़ जाऊँ । अतिरतिक्रमणे च (१.४. ९४) से कर्मप्रवचनीयसंज्ञा हो कर उस के योग में द्वितीया विभक्ति हो जाती है। अब तद्धितान्त अव्ययों का वर्णन करते हैं— [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(३६८) तद्धितश्चाऽसर्वविभक्तिः ।१।१।३७॥ यस्मात् सर्वा विभक्तिर्नोत्पद्यते स तद्धितान्तोऽव्ययं स्यात् ॥ अर्थः—जिस तद्धितान्त से वचनत्रयात्मिका सब विभक्तियां उत्पन्न नहीं हो सकतीं वह अव्ययसञ्ज्ञक हो। व्याख्या — तद्धितः ।१।१। च इत्यव्ययपदम् । असर्वविभक्तिः ।१।१। अव्ययम् १. प्रतिनिधि और प्रतिदान में प्रति की कर्मप्रवचनीयसंज्ञा हो कर इस के योग में पञ्चमी हो जाती है। देखें इस व्याख्या का विभक्त्यर्थपरिशिष्ट (३८, ३६) । २. पर्यादयो ग्लानाद्यर्थे चतुर्थ्या (वा० ६१) इस वार्त्तिक से नित्यसमास हो जाता है अतः लौकिकविग्रह में 'परि' का प्रयोग नहीं हो सकता ।

५६६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् । ३६८। (स्वरादिनिपातमव्ययम् से) । समासः—नोत्पद्यन्ते सर्वा वचनत्रयात्मिका¹ विभक्तयो यस्मात् सोऽसर्वविभक्तिः, बहुव्रीहिसमास । अर्थ—(असर्वविभक्ति.) जिस से वचनत्रयात्मिका सम्पूर्ण विभक्तिया उत्पन्न नही हो सकती वह (तद्धित = तद्धि- तान्त ²) तद्धितान्त (च) भी (अव्ययम्) अव्ययसञ्ज्ञक होता है । यथा—अत (इस से) इस तद्धितान्त से सब विभक्तिया उत्पन्न नही हो सकती, अर्थात् 'इस से को, इस से द्वारा, इस से के लिये' इत्यादि विभक्तियों वाला व्यवहार यहा सम्भव नही हो सकता । इसलिये यह अव्ययसञ्ज्ञक है । अत एव— अत्रत , तत्रत, कुत्रत. आदि प्रयोग ठीक नही । प्रशस्तं पचतीति—पचतिरूपम् [प्रशंसायां रूपप् (५ ३ ६६)], ईषद् असम्पूर्णं पचतीति पचतिकल्पम् [ईषदसमाप्तौ कल्पब्देश्यदेशीयर• (५ ३.६७)]। यहा इन तद्धि- तान्तो से भी वचनत्रयात्मिका सब विभक्तिया उत्पन्न नही हो सकती अत. इन की भी अव्ययसज्ञा हो कर सुँप् का लुक् प्राप्त होता है—जो अत्यन्त अनिष्ट है। किञ्च वचन- त्रयात्मिका सब विभक्तिया तो 'उभय' शब्द से भी उत्पन्न नही होती और यह तद्धितान्त भी है अत इस की भी अव्ययसज्ञा हो कर सुँब्लुक् आदि दोष प्राप्त होते हैं । इस पर उन उन तद्धितप्रत्ययो का परिगणन करते हैं जिन के अन्त मे आने से अव्ययसञ्ज्ञा होनी है³ । [लघु०] परिगणनं कर्तव्यम् । तसिलादय प्राक्पाशपः । शस्प्रभृतय. प्राक् समासान्तेभ्यः । अम् । आम् । कृत्वोऽर्थाः । तसि-वती । नानाञौ । एतदन्तम- व्ययम् । अत इत्यादि ॥ अर्थ.—उन तद्धित प्रत्ययो का परिगणन करना चाहिये— [क] 'तसिल्' से ले कर 'पाशप्' के पूर्व तक वे सब प्रत्यय । [ख] 'शस्' से ले कर समासान्तो के पूर्व तक वे सब प्रत्यय । [ग] 'अम्' और 'आम्' प्रत्यय । [घ] 'कृत्वसुँच्' तथा उस के अर्थ वाले अन्य प्रत्यय । १ एकवचनमुत्सर्गंत. करिष्यते—इस महाभाष्य के कथन से सब विभक्तियो का एक- वचन तो सब शब्दो से स्वत सिद्ध है ही, अत. 'असर्वविभक्तिः' यह कथन व्यर्थ हो जाता है । इसलिये यहा इस का आशय यह समझना चाहिये कि जिस तद्धि- तान्त से सब विभक्तियो के सब वचनो की उत्पत्ति न हो उस की अव्ययसज्ञा होती है । २. केवलस्य तद्धितस्य प्रयोगाभावेन फलाभावात् सज्ञाविधावपि तदन्तविधि । ३ यहा यह ध्यान रहे कि इस परिगणन के बिना दोषनिवृत्ति असम्भव है, यत. यह तद्धितश्चासर्वविभक्ति. (३६८) सूत्र व्यर्थ सा है। अत एव प्राचीन वैयाकरणो ने इस परिगणन को स्वरादिगण में सम्मिलित कर दिया है । देखें काशिकावृत्ति (१ १.३६) ।

अव्यय-प्रकरणम् ५६७ [ ङ ] 'तसिँ' और 'वतिँ' प्रत्यय । [ च ] 'ना' और 'नाञ्' प्रत्यय । ये तद्धितप्रत्यय जिन के अन्त में हों उन की अव्ययसंज्ञा होती है । यथा— ‘अतः’ (यहां एतद् शब्द से तसिँल् प्रत्यय किया गया है) । व्याख्या—उपर्युक्त सब प्रत्यय अष्टाध्यायी के क्रम से कहे गये हैं । जिन को अष्टाध्यायी का सूत्रपाठ कण्ठस्थ है उन के लिये यह सब समझना अत्यन्त सुकर है । हम यहां इन प्रत्ययों का ससूत्र सोदाहरण विवेचन प्रस्तुत करते हैं— [ क ] तसिलादयः प्राक् पाशपः ॥ (तसिँल् से लेकर पाशप् के पूर्व तक के सब प्रत्यय) (तसिँल्)—[पञ्चम्यास्तसिँल् (५.३.७), पर्यभिभ्यां च (५.३.६)] । इतः (स्)¹ = इस से, इस कारण से । तस्मादितो मयान्यत्र गन्तव्यं कानने क्वचित् (कथासरित्०) । ततः (स्) = उस से, उस कारण से । इतो भ्रष्टस्ततो भ्रष्टः । अतः (स्) = इस से, इस कारण से । अतः परीक्ष्य कर्तव्यं विशेषात् सङ्गतं रहः (शाकुन्तल० ५.२४) । अतोऽहमब्रवीमि (पञ्च० १) । कुतः (स्) = किस से, किस कारण से, कहां से । कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् (गीता० २.२) । यतः (स्) = जिस से, जिस कारण से, जहां से । यतो जातानि भुवनानि विश्वा (श्वेता० ४.४) । यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते (तै० उप० ३.१) । सर्वतः (स्) = सब ओर से, चहुं ओर से । सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षि- शिरोमुखम् । सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति (गीता० १३.१३) । सर्वतो नगरं प्राकारः । अन्यतः (स्) = अन्य से । तीर्थोदकं च वह्निश्च नान्यतः शुद्धिमर्हतः (उत्तर- राम० १.१३) । परितः (स्) = चहुं ओर से । वेदीं हुताशनवतीं परितः प्रकीर्णाश्छायाश्चरन्ति बहुधा भयमादधानाः (शाकुन्तल० ३.२४) । परितः कृष्णं गोपाः । अभितः (स्) = चारों ओर, दोनों ओर, निकट । परिजनो यथाव्यापारं राजा- नमभितः स्थितः (मालविका० १) । पादपैः पत्रपुष्पाणि सृजद्भिरभितो नदीम् (रामा- यण० २.६५.८) । ततो राजाऽब्रवीद् वाक्यं सुमन्त्रमभितः स्थितम् (रामायण) । उभयतः (स्) = दोनों ओर । उभयतो मार्गं वृक्षाः । नोट—उभयतः, सर्वतः, परितः, अभितः—इन के योग में द्वितीया विभक्ति का विधान है । देखें—इसी व्याख्या के तृतीयभाग का विभक्त्यर्थपरिशिष्ट (१०, ११) । १. 'इतः' आदि ये तद्धितान्त अव्यय प्रायः सब प्रसिद्ध हैं अतः इन पर * यह चिह्न अङ्कित नहीं किया है ।

५६८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् (त्रल्)—[सप्तम्यास्त्रल् (५।३।१०)]। सर्वत्र = सब जगह, सब में, सब स्थानों पर । साधवो न हि सर्वत्र चन्दनं न वने वने (चाणक्य०) । अति सर्वत्र वर्जयेत् (चाणक्य०) । कुत्र = कहाँ, कहाँ पर । कुत्र नु खलु गत आर्यवसन्तक (स्वप्न० ४)। शङ्काभिः सर्वमाक्रान्तमन्नं पानं च भूतले । प्रवृत्तिः कुत्र कर्तव्या जीवितव्यं कथं नु वा (हितोप० १।२४) । अन्यत्र = अन्य जगह, दूसरी जगह पर । विना मलयमन्यत्र चन्दनं न प्ररोहति (पञ्च० १४१) । अत्र = यहाँ, यहाँ पर, इस पर, इस में । यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोष (पञ्च० १२१७)। तन्भद्रं न कृतं यदत्र मारात्मके विश्वासः कृतः (हितोप० १)। यत्र = जहाँ, जिस में । तत्र = वहाँ, उस में । यत्र विद्वज्जनो नास्ति श्लाघ्य- स्तत्राल्पधीरपि । निरस्तपादपे देशे एरण्डोऽपि द्रुमायते (हितोप० १६६)¹ । एकत्र = एक जगह पर, एक में । घृतकुम्भसमा नारी तप्ताङ्गारसमः पुमान् । तस्माद् घृतं च वह्निञ्च नैकत्र स्थापयेद् बुधः (हितोप० १।११८) । अमुत्र = उस में, परलोक में । अनेनैवार्भकाः सर्वे नगरेऽमुत्र भक्षिताः (कथा- सरित्०) । नामुत्र हि सहायार्थं पिता माता च तिष्ठत (मनु० ४.२३६) । प्रेत्यामुत्र भवान्तरे— इत्यमरः । बहुत्र = बहुतों में, बहुत स्थानों में । पूर्वत्र = पूर्व में । उत्तरत्र = अगले में । उभयत्र (दोनों में) इत्यादि । (ह)—[इदम्रो हः (५।३।११), वा ह च च्छन्दसि (५।३।१३)]। इह = यहाँ, इस में । इह लोके हि धनिनां परोऽपि स्वजनायते (पञ्च० १५)। अत्युत्कटैः पापपुण्यैरिहैव फलमश्नुते (हितोप० १८३) । कुह = कहाँ । वेद में ही प्रयोग होता है । यं स्मा पृच्छन्ति कुह सेति घोरम् (ऋ० २।१२।५) । (अत्)—[किमोऽत् (५।३।१२)]। क्व = कहाँ, किस स्थान पर । क्व गताः पृथिवीपालाः ससैन्यबलवाहनाः ।

१ 'अत्र' और 'तत्र' के आगे भवत् (आप) शब्द का प्रयोग 'पूज्य, आदरणीय' आदि अर्थ को प्रकट करने के लिये किया जाता है । पूज्ये तत्रभवानत्रभवांश्च भगवानपि—इत्यभिधानचिन्तामणौ हेमचन्द्रः । जब आदरणीय पुरुष या स्त्री, वक्ता के सामने या निकट हो तो 'अत्रभवान्, अत्रभवती' आदि का, जब दूर हों तो 'तत्रभवान्, तत्रभवती' आदि का प्रयोग होता है । यथा—अत्रभवान् प्रकृति- मापन्नः (शाकुन्तल० २) । वृक्षसेचनादेव परिश्रान्तामत्रभवतीं लक्षये (शाकु- न्तल० १) । असाधुदर्शी तत्रभवान् काश्यपः, य इमामश्रमधर्मे नियुङ्क्ते (शाकु- न्तल० १) ।

अव्यय-प्रकरणम् ५६६

वियोगसाक्षिणो येषां भूमिरद्यापि तिष्ठति (हितोप० ४.६४)। क्व वयं क्व परोक्ष- मन्मथो मृगशावैः सममेधितो जनः (शाकुन्तल० २.१६)। क्व सूर्यप्रभवो वंशः (रघु० १.२)। क्वचित् = कहीं पर, कभी, किसी दिन। क्वचित् पृथ्वोशय्यः क्वचिदपि च पर्यङ्कशयनः (नीति० ७३)। कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति (देवीक्षमा० १)। इसी प्रकार—क्वापि = कभी, कहीं पर। (दा)—[सर्वेकान्यकिंयत्तदः काले दा (५.३.१५)]। सर्वदा = हमेशा। स्वजनोऽपि दरिद्राणां सर्वदा दुर्जनायते (पञ्च० १.५) । सदा = हमेशा। ‘दा’ प्रत्यय के परे रहते सर्वस्य सोऽन्यतरस्यां दि (१२०६) से ‘सर्व’ को वैकल्पिक ‘स’ आदेश हो जाता है। सदाभिमानैकधना हि मानिनः (माघ० १.६७) । एकदा = एक बार, कभी। अहमेकदा दक्षिणारण्ये चरन्नपश्यम् (हितोप० १)। अन्यदा = अन्य समय में। अन्यदा भूषणं पुंसां क्षमा लज्जेव योषिताम्। परा- क्रमः परिभवे वैयात्यं सुरतेष्विव (माघ० २.४४) । कदा = कब, किस समय। परदारपरद्रव्यपरद्रोहपराङ्मुखः। गङ्गा ब्रूते कदागत्य मामयं पावयिष्यति (सुभाषित०) । कदागुरोकसो भवन्तः ?। कदाचित्, कदाचन, कदापि = कभी। कदाचित् कुपिता माता न कदाचिद् हरीतकी (सुभाषित०)। आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्न बिभेति कदाचन। (तै० उप० २.४) । यदा = जब। यदा किञ्चिज्ज्ञोऽहं द्विप इव मदान्धः समभवम् (नीति० ७) । तदा = तब। यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् (गीता० ४.७) । (हिल्)—[इदमो हिल् (५.३.१६), अनद्यतने हिल्लन्तरस्याम् (५.३.२१)]। एतर्हि = इस समय, अब। भवन्तमेतर्हि मनस्विगर्हिते विवर्त्तमानं नरदेव वर्त्मनि। कथं न मन्युर्ज्वलयत्युदीरितः शमीतरुं शुष्कमिवाग्निरुच्छिखः (किरात० १.३२) । कर्हि = कब। वेद में प्रायः प्रसिद्ध है। लोक में—कर्हिचित् = कभी भी। अकामस्य क्रिया काचिद् दृश्यते नेह कर्हिचित् (मनु० २.४) । यर्हि = जब। तर्हि = तब। सुषिरो वै पुरुषः स वै तर्ह्येव सर्वो यर्ह्याशितः (मैत्रा० सं० ३.६.२), मनुष्य निश्चय ही भीतर से खोखला है, वह तभी पूर्ण हो जाता है जब खा कर तृप्त हो जाता है। (धुना)—[अधुना (५.३.१७)]। अधुना = अब, इस समय। पुरा यत्र स्रोतः पुलिनमधुना तत्र सरिताम् (उत्तर- राम० २.२७) । (दानीम्)—[दानीञ्च (५.३.१८), तदो दा च (५.३.१६)] । इदानीम् = अब। तदानीम् = तब। वत्से प्रतिष्ठस्वेदानीम् (शाकुन्तल० ४)। नासदासीन्नो सदासीत्तदानीम् (ऋ० १०.१२६.१) ।

५७० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्

(सद्यस् आदि निपातन) — [सद्यःपरुत्परार्यैषमःपरेद्यव्यद्यपूर्वेद्युरन्येद्युरन्यतरेद्यु- रितरेद्युरपरेद्युरधरेद्युरुभयेद्युरुत्तरेद्यु (५।३।२२), द्युश्चोभयाद्वक्तव्य (वा०)] । सद्यः (स्) = समानेऽहनि, उसी दिन, उसी समय, फौरन, तत्काल । सद्यो बलहरा नारी सद्यो बलकरं पयः (चाणक्य०) । नाधर्मश्चरितो लोके सद्यः फलति गौरिव (मनु० ४।७२) । परुत् = पिछले वर्ष, गत वर्ष म । परुज्जातस्तुनस्तव । परारि = गत वर्ष से पूर्व वर्ष म । परारि वृष्टिः समभूदपूर्वा । ऐषम (स्) = इस वर्ष म । महार्घता वृद्धिमुपागतैषमः, इस वर्ष महगाई बढ गई है । परेद्यवि = परले दिन, परसों । स तु गन्ता परेद्यवि, वह तो परसो जायेगा । अद्य = इसी दिन, आज । श्वः कार्यमद्य कुर्वीत (महाभारत० १२।३२१।७३) । पूर्वेद्यु (स्) = पूर्व दिन, गत दिन, पिछले दिन । प्रात कृताथानि यथा विरेजु- स्तया न पूर्वेद्युरलङ्कृतानि (भट्टि० ११।२१)। अन्येद्यु (स्) = अन्य दिन । अन्येद्युरात्मानुचरस्य भावं जिज्ञासमाना मुनिहोम- धेनु (रघु० २।२६) । इतरेद्यु (स्) = अन्य दिन । अपरेद्यु (स्) — अन्य दिन । ततोऽपरेद्युस्तं वेशमा- जगाम स धोर्यवान् (रामायण० १।११।२४) । अधरेद्यु (स्) = परले दिन, परसो । उभयेद्यु (स्) = दोनों दिनो मे । उत्तरेद्यु (स्) = अगले दिन । उभयद्यु (स्) = दोनो दिनो मे । (थाल्) — [प्रकारवचने थाल् (५।३।२३)] । यथा = जैसे । तथा = वैसे । यथा खनन् खनित्रेण नरो वार्यधिगच्छति । तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति (मनु० २।२१८) । यथा नदीनदाः सर्वे सागरे यान्ति संस्थितिम् । तथैवाश्रमिनः सर्वे गृहस्थे यान्ति संस्थितिम् (मनु० ६।६०) । सर्वथा = सब प्रकार से, सब तरह से । सर्वथा व्यवहर्तव्यं कुतो ह्यवचनीयता । यथा स्त्रीणां तथा वाचां साधुत्वे दुर्जनो जनः (उत्तरराम० ५) । अन्यथा = अन्य प्रकार से, विपरीत । यदभावि न तद्भावि भावि चेन्न तदन्यथा । इति चिन्ताविषघ्नोऽयमगदः किं न पीयते (हितोप० प्रस्तावना ३०) । उभयथा = दोनो प्रकार से, दोनों अवस्थाओं में । उभयथाऽपि घटते (विभ्रमो० ३) । छन्दस्युभयथा (३।४।११७) । (थम्) — [इदमस्थम् (५।३।२४), किमश्च (५।३।२५) ] । इत्थम् = इस तरह, इस प्रकार । इत्थममुं विलपन्तममुञ्चद् दीनदयालुत्या- ऽवनिपाल (नैषध० १।१४३) । कथम् = कैसे, किस तरह, किस प्रकार । कथं मारात्मके त्वयि विश्वास ? (हितोप० १) । कथं नु दाक्ष्योपहुनयो महर्षेर्विधानाच्छाप्यपयस्विनीनाम् (रघु० २।५४) । कथमपि = किसी तरह, बड़ी कठिनता से । तस्य स्थिरां कथमपि पुरः

अव्यय-प्रकरणम् ५७१

कौतुकाधानहेतोः (मेघ० १.३) । कथमपि भुवनेऽस्मिन् तादृशाः सम्भवन्ति (मालती० २.६)। कथं कथमपि=बड़ी कठिनता से। कथं कथमप्युत्थाय चलितः (पञ्च० १) । कथञ्चित्, कथञ्चन = किसी तरह, बड़ी मुश्किल से। कथञ्चिदीशा मनसां बभूवुः (कुमार० ३.३४) । न लोकवृत्तं वर्त्तेत वृत्तिहेतोः कथञ्चन (मनु० ४.११) । (था)—[था हेतौ च च्छन्दसि (५.३.२६)] । कथा=किस कारण से। वेद में ही प्रयोग होता है। कथा विधात्यप्रचेताः (ऋ० १.१२०.१), अज्ञानी कैसे कार्य कर सकता है ? (अस्तातिँ)—दिक्शब्देभ्यः सप्तमी-पञ्चमी-प्रथमाभ्यो दिग्देशकालेष्वस्तातिः (५.३.२७) । पुरस्तात्=सामने, पूर्व में, पूर्व से, पूर्व (दिशा, देश या काल), गुरोरपीदं धनमाहिताग्नेर्नश्यत् पुरस्तादनुपेक्षणीयम् (रघु० २.४४) । रत्नच्छायाव्यतिकर इव प्रेक्ष्यमेतत् पुरस्तात् (मेघ० १.१५)। पुरस्तादपवादा अनन्तरान् विधीन् बाधन्ते नोत्त- रान् (परिभाषा)। इसी प्रकार— परस्तात्=आगे, परे, दूसरी ओर । वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् (श्वेता० ३.४) । परस्ताज्ज्ञायत एव (शाकुन्तल० १) । अधस्तात्=नीचे, नीचे की ओर । धर्मेण गमनमूर्ध्वं गमनमधस्ताद् भवत्य- धर्मेण (सांख्यका० ४४) । तस्याधस्ताद् वयमपि रतास्तेषु पर्णोटजेषु (उत्तरराम० २.२५) । (अतसुँच्)—[दक्षिणोत्तराभ्यामतसुँच् (५.३.२८), विभाषा परावराभ्याम् (५.३.२६) ] । दक्षिणतः (स्)=दक्षिण में, दक्षिण से, दक्षिण (दिशा और देश केवल दो के लिये)। उत्तराहि वसन् रामः समुद्राद् रक्षसां पुरीम्। अवैल्लवणतोयस्य स्थितां दक्षिणतः कथम् (भट्टि० ८.१०७)। इसी प्रकार—उत्तरतः=उत्तर में, उत्तर से, उत्तर । परतः =परे, पर से, पर । अवरतः=पीछे से । ये दिशा, देश और काल तीनों के लिये प्रयुक्त होते हैं। (अस्तातेर्लुक्)—[अञ्चेर्लुक् (५.३.३०) ] । प्राक्=पहले, आगे, पूर्व में, पूर्व से, पूर्व (दिशा, देश या काल)। प्राक् पादयोः पतति खादति पृष्ठमांसम् (हितोप० १.८१) । प्राङ् नाभिवर्धनात् पुंसो जातकर्म विधीयते (मनु० २.२६) । प्रमाणभूत आचार्यो दर्भपवित्रपाणिः प्राङ्मुख उपविश्य महता यत्नेन सूत्राणि प्रणयति स्म, तत्राशक्यं वर्णेनाप्यनर्थेन भवितुं किम्पुनरियता सूत्रेण (महाभाष्य १.१.१) । प्राग्गामि पुण्यं नृणाम् (हेमचन्द्र), मनुष्यों का पुण्य आगे चलता है । इसी प्रकार प्रत्यक् = विपरीत दिशा । आदि शब्द जानने चाहियें । (रिल्, रिष्टात्)—[उपर्युपरिष्टात् (५.३.३१)] । उपरि= ऊपर (दिशा, देश, काल) । अवाङ्मुखस्योपरि पुष्पवृष्टिः पपात

५७२ भैमोव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् विद्याधरहस्तमुक्ता (रघु० २ ६०) । उपर्युपरि = ऊपर ऊपर । उपर्युपरि पश्यन्तः सर्व एव दरिद्रति (हितोप० २२)। उपरिष्टात् = ऊपर (दिशा, देश, काल) । सजातव्यर्थपक्षाः परहितकरणे नोपरिष्टान्न चाध (वैराग्य० ११०) । इत्युपरिष्टाद् व्याख्यातम् । (आति) — [ पश्चात् (५ ३ ३२) ] । पश्चात् = पीछे, अस्तात्यर्थे । लघ्वी पुरा वृद्धिमती च पश्चात् (नीति० ४६)। गच्छति पुरः शरीरं धावति पश्चादसंस्तुतं चेतः (शाकुन्तल० १ ३३) । पश्चात्पुच्छं वहति विपुलं तच्च धूनोत्यजस्रम् (उत्तरराम० ४ २६) । पश्चात्तापः । (अ, आ,) — [ पश्च पश्चा च च्छन्दसि (५ ३ ३३) ] । पश्च = पीछे। पश्चा = पीछे। वेद मे ही प्रयुक्त होते हैं । (आति) — [ उत्तराधरादक्षिणादातिः (५ ३ ३४) ] । उत्तरात्, अधरात्, दक्षिणात् । अस्ताति वाला अर्थ । उत्तराद् वसति (उत्तर- स्यां दिशि वसतीत्यर्थ ) । उत्तरादागत । उत्तराद् रमणीयम् (काशिका)। इसी प्रकार —अधराद्वसति, दक्षिणाद्वसति आदि । (एनप्) — [ एनब्व्यतरस्यामदूरेऽपञ्चम्याः (५ ३.३५) ] । उत्तरेण, अधरेण, दक्षिणेन । सब जगह 'अस्ताति' वाला अर्थ, केवल पञ्चमी का ग्रहण नही। इस के योग में एनपा द्वितीया (२.३.३१) द्वारा द्वितीया विभक्ति का विधान है—तत्रागारं धनपतिगृहान् उत्तरेणास्मदीयम् (मेघ० २ १२), हमारा घर कुवेर के भवन के निकट उत्तर मे है। दण्डकां दक्षिणेनाहं सरितोऽद्रीन् वनानि च (भट्टि० ८.१०८) । उत्तरेण स्रवन्तीम् (मालती० ६.२४) । दक्षिणेन वृक्षवाटिकां आलाप इव श्रूयते (शाकुन्तल० १) । (आच्) — [ दक्षिणादाच् (५.३ ३६) ] । दक्षिणा = दक्षिण मे, आदि । अस्तात्यर्थे । दक्षिणा ग्रामात् (सि० कौ०), ग्राम के दक्षिण मे । आचप्रत्ययान्त के योग मे अन्यारादितरर्तेदिक्शब्दाञ्चूत्तरपदाजाहियुक्ते (२ ३ २६) सूत्र मे पञ्चमी विभक्ति हो जाती है । (आहि) — [ आहि च दूरे (५ ३ ३७), उत्तराच्च (५ ३ ३८) ] । दक्षिणाहि = दक्षिण मे । उत्तराहि = उत्तर मे । अस्तात्यर्थे । दक्षिणाहि ग्रामात्, उत्तराहि ग्रामात् (सि० कौ०), ग्राम से दूर दक्षिण में, ग्राम से दूर उत्तर मे । इस के योग मे भी पूर्ववत् पञ्चमी विभक्ति होती है । उत्तराहि वसन् रामः समुद्रात् (भट्टि० ८ १०७), समुद्र से दूर उत्तर में रहते हुए राम ने । (असिँ) — [ पूर्वाधरावराणामसिं पुरधवश्चैषाम् (५ ३ ३६) ] । पुरः (स्) = आगे, सामने, पूर्व मे, पूर्व से, पूर्व (अस्तात्यर्थे) । अमुं पुरः पश्यसि देवदारुम् (रघु० २ ३६) । तव प्रसादस्य पुरस्तु सम्पदः (शाकुन्तल० ७ ३०), तस्य स्थित्वा कथमपि पुरः (मेघ० १.३) ।

अव्यय-प्रकरणम् ५७३ अधः (स्) = नीचे, नीचे में, नीचे से (अस्तात्यर्थे)। इस का पहले स्वरादियों में व्याख्यान किया जा चुका है। अवः (स्) = न्यून, निम्न, बाह्य आदि (अस्तात्यर्थे)। इस का भी पहले स्वरादियों में व्याख्यान कर चुके हैं। (धा) — [ सङ्ख्याया विधार्थे धा (५.३.४२) ] । एकधा = एक प्रकार से। न एकधा = अनेकधा, नैकधा। जगत्कृत्स्नं प्रविभक्त- मनेकधा (गीता० ११.१३)। अधुनीत खगः स नैकधा (नैषध० २.२)। द्विधा = दो प्रकार, दो प्रकार से। द्विधा कृत्वाऽऽत्मनो देहमर्धेन पुरुषोऽभवत् (मनु० १.३२)। द्विधा भिन्नाः शिखण्डिभिः (रघु० १.३६)। त्रिधा = तीन प्रकार से। एकैव मूर्त्तिर्बिभिदे त्रिधा सा (कुमार० ७.४४)। चतुर्धा = चार प्रकार से। चतुर्धा विभजात्मानम् आत्मनैव दुरासदे (रामा- यण० ७.८६.११)। इसी प्रकार—पञ्चधा, षड्धा, षोढा, सप्तधा, अष्टधा, नवधा, बहुधा आदि। (ध्यमुंञ्) — [ एकाद्धो ध्यमुंञन्यतरस्याम् (५.३.४४) ] । ऐकध्यम् = एक बार। ऐकध्यं भुङ्क्ते (काशिका)। (धमुञ्) — [ द्वित्र्योश्च धमुञ् (५.३.४५) ] । द्वैधम् = दो प्रकार। श्रुतिद्वैधं तु यत्र स्यात् तत्र धर्मवुभौ स्मृतौ (मनु० २.१४)। त्रैधम् = तीन प्रकार। त्रैधमेष भजति त्रिभिर्गुणैः (माघ० १४.६१)। (एधाच्) — [ एधाच्च (५.३.४६) ] । द्वेधा = दो प्रकार से। चेधा द्वेधा भ्रमं चक्रे कान्तासु कनकेषु च। तासु तेष्व- प्यनासक्तः साक्षाद् भर्गो नराकृतिः (कुवलया०)। त्रेधा = तीन प्रकार से। त्रेधा विभज्य रचितां वहसेऽद्य वेणीम् (चम्पूभारत ६.३०)। तुभ्यं त्रेधा स्थितात्मने (रघु० १०.१६)। अब इस के आगे याप्ये पाशप् (५.३.४७) सूत्र से पाशप् प्रत्यय का विधान किया जाता है। तसिलादयः प्राक् पाशपः — में पाशप् से पूर्व का ग्रहण होने से पाशप् प्रत्ययान्त की अव्ययसंज्ञा नहीं होती। अत एव - याप्यो (निन्दितो) वैयाकरणः = ‘वैयाकरणपाशः’ इत्यादियों में सुँप् का लुक् नहीं होता, क्योंकि सुँब्लुक् तो अव्यय से परे ही हुआ करता है। देखें—अव्ययादाप्सुपः (३७२)। [ख] शस्प्रभृतयः प्राक् समासान्तेभ्यः ॥ (शस् से ले कर समासान्तों से पूर्व तक के प्रत्यय) (शस्) — [ बह्वल्पार्थाच्छस् कारकादन्यतरस्याम् (५.४.४२)] । बहुशः (स्) = बहुतों को, बहुतों से, बहुतों के लिये आदि। प्रत्येक कारक में प्रयोग होता है। बहूनि ददातीति बहुशो ददाति। बहुभिर्ददातीति बहुशो ददाति। बहुभ्यो

ददातीति बहुशो ददाति । इसी तरह अन्य कारको म भी समझ लेना चाहिये । एवम् — अल्पशः । भूरिशः । स्तोकशः । आदि । एकशः, द्विशः, त्रिशः, शतशः, सहस्रशः — आदि म सङ्ख्यैकवचनाच्च वीप्सायाम् (५।४।४३) द्वारा वीप्सा में शस् प्रत्यय होता है। एकशो ददाति—एक एक करके देता है। द्विशो ददाति—दो दो देता है। न एकश — अनेकशः = अनेक वार, अनेकशो निर्जितराजकस्त्वम् (भट्टि० २।५२) । इसी प्रकार —, पादशो ददाति, कार्षापणशो ददाति । आदि । (तसिँ) — [ प्रतियोगे पञ्चम्यास्तसिँ (५।४।४४) ] । प्रद्युम्नो वासुदेवतः प्रति प्रद्युम्न वासुदेव का प्रतिनिधि है । अभिमन्युरर्जुनतः प्रति, अभिमन्यु अर्जुन का प्रतिनिधि है । कर्मप्रवचनीय 'प्रति' के योग मे जो पीछे (पृष्ठ ५६८ पर) पञ्चमी कह चुके हैं उसी का यहा ग्रहण है । (तसिँ) — [आद्यादिभ्य उपसङ्ख्यानम् (वा०)] । इस वार्तिकद्वारा सब विभक्तियों के अर्थ म तसिं प्रत्यय होता है यत इसे 'सार्वविभक्तिकस्तसि' कहा जाता है। यथा—आदौ इति आदितः = आदि म । तस्यादित उदात्तमर्धह्रस्वम् (१।२।३२), आदित आदावित्यर्थः । मध्य इति मध्यतः । अक्षीणवृत्तो न क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः (महाभारते यक्षोपाख्याने), वृत्तेनेति वृत्ततः । विप्राणां ज्ञानतो ज्येष्ठत्वं क्षत्रियाणां तु वीर्यतः (मनु० २।१५५), ज्ञानेनेति ज्ञानतः, वीर्येणेति वीर्यतः । अस्य शिशोर्मातरं नामतः पृच्छामि (शाकुन्तल० ७), नाम्ना इति नामतः । (तसिँ) — [ अपादाने चाहीयरुहो (५।४।४५) ] । चोरादिति चोरतो बिभेति । अध्ययनादिति अध्ययनतः पराजयते । (तसिँ)—[ अतिग्रहाध्ययनक्षेपेष्वकर्तरि तृतीयायाः (५।४।४६) ] । वृत्ततोऽतिगृह्णाते । चारित्रतोऽतिगृह्यते । अन्यानतिक्रम्य वृत्तेन चारित्रेण वा गृह्णात इत्यर्थः । वृत्ततो न व्ययते । वृत्तेन न चलनीत्यर्थः । वृत्ततः क्षिप्तः । वृत्तेन निन्दित इत्यर्थः । इत्यादि । (च्बिँ) [कृब्भ्वस्तियोगे सम्पद्यकर्तरि च्विः (५।४।५०)] । अशुक्लः शुक्लो सम्पद्यते तं करोतीति शुक्ली¹ करोति । शुक्ली भवति । शुक्ली स्यात् । अस्मद्दिना मा भृशम् उन्मनी² भूः (किरात० ३।३६) । (सातिँ)—[विभाषा सातिँ कात्स्न्र्य्ये (५।४।५२) आदि] । कृत्स्नम् अनुदकम् उदकं सम्पद्यत इति उदकी भवति, उदकसाद् भवतीति वा । वर्षासु कृत्स्नं लवणपिण्डमुदकसाद् भवति । अग्नी³ भवति, अग्निसाद् भवति शस्त्रम् । १ च्वौ, तस्य सर्वापहारलोपः, प्रत्ययलक्षणेन तमाश्रित्य यस्य च्यो (१।२।४२) इति अकारस्य ईकारः । शुक्लीति पृथक् पदमव्ययम् । अव्ययत्वात् सुपोलुक् । २ अनुन्मना उन्मना भवतीति विग्रहः । च्वौ सर्वापहारलोपे, अरुर्मनश्चक्षुश्चेतोरहो- रजसां लोपश्च (५।४।५१) इति सकारलोपे, अस्य ईत्वे च कृते रूपसिद्धिः । ३. च्व्यन्तमैतद्रूपम् । च्वौ च (१।०४५) इति दीर्घः ।

(त्रा)—[देये त्रा च (५.४.५५), तदधीनवचने (५.४.५४) आदि] । ब्राह्मणत्रा करोति । ब्राह्मणाधीनं देयं करोतीत्यर्थः । राजसात् करोति । राजा- धीनं करोतीत्यर्थः । राजा स यज्वा विबुधव्रजत्रा कृत्वारवराज्योपमयैव राज्यम् (नैषध० ३.२४) । (डाच्)—[अव्यक्तानुकरणाद् द्व्यजवरार्धादनितौ डाच् (५.४.५७) इत्यादि] । पटपटा करोति (पटत् इस प्रकार की ध्वनि करता है) । दमदमा करोति । इन की सिद्धि इस व्याख्या के चतुर्थभागस्थ (१२४६) सूत्र पर देखें । इस के बाद समासान्त आरम्भ हो जाते हैं । तदन्तों की अव्ययसंज्ञा नहीं होती । यथा—व्यूढोरस्कः । [ग] अम् । आम्—अम् और आम् प्रत्यय । (अमुँ)—[अमुँ च च्छन्दसि (५.४.१२)] । प्रतरं न आयुः (ऋ० ४.१२.६) । वेद में ही प्रयोग होता है । (आम्)—[किमेत्तिङव्ययघादाम्वद्रव्यप्रकर्षे (५.४.११)] । किन्तराम् । किन्तमाम् । पचतितराम् । पचतितमाम् । इन का विवेचन इस व्याख्या के चतुर्थभागस्थ (१२२०) सूत्र पर देखें । [घ] कृत्वोऽर्थाः—कृत्वसुँच् तथा उस के अर्थ वाले प्रत्यय । (कृत्वसुँच्)—[संख्यायाः क्रियाभ्यावृत्तिगणने कृत्वसुँच् (५.४.१७)] । पञ्चकृत्वो भुङ्क्ते (पांच बार खाता है) । सप्तकृत्वः = सात वार । (सुँच्)—[द्वित्रिचतुर्भ्यः सुँच् (५.४.१८)] । द्विर्भुङ्क्ते (दो बार खाता है) । त्रिस् = तीन बार । चतुस् = चार बार । त्रिराचामेदपः पूर्वं द्विः प्रमृज्यात्ततो मुखम् (मनु० २.६०) । (सुँच्)—[एकस्य सकृच्च (५.४.१९)] । सकृत् १ = एक वार । सकृद्वंशो निपतति सकृत् कन्या प्रदीयते । सकृदाह ददानीति त्रीण्येतानि सतां सकृत् (मनु० ९.४७) । न सकृत् असकृत् = वार वार । असकृदेकर- थेन तरस्विना (रघु० ६.२३) । (धा)—[विभाषा बह्वोर्धाविप्रकृष्टकाले (५.४.२०)] । बहुधा = थोड़े २ अन्तर पर बहुत बार । बहुधा दिवसस्य भुङ्क्ते (काशिका) । बहुकृत्वो दिवसस्य भुङ्क्ते (काशिका) । [ङ] तसिँ-वती—तसिँ और वतिँ प्रत्यय । (तसिँ)—[तेनैकदिक् (४.३.११२), तसिँश्च (४.३.११३)] । सुदामतः (स्) = जो सुदामन् पर्वत (या मेघ) की दिशा में हो । हिमवतः (स्) = जो हिमालय की दिशा में हो । पीलुमूलतः (स्) = जो पीलुमूल की दिशा में हो । ध्यान रहे कि यहां का तसिँ प्रत्यय पीछे शस्प्रभृति में आये तसिँप्रत्यय से नितान्त भिन्न है । १. एकशब्दात्सुंचि एकस्य च सकृदादेशे संयोगान्तलोपे रूपसिद्धिः ।