भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 588, कुल 633 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 588

अव्यय-प्रकरणम् ५७३ अधः (स्) = नीचे, नीचे में, नीचे से (अस्तात्यर्थे)। इस का पहले स्वरादियों में व्याख्यान किया जा चुका है। अवः (स्) = न्यून, निम्न, बाह्य आदि (अस्तात्यर्थे)। इस का भी पहले स्वरादियों में व्याख्यान कर चुके हैं। (धा) — [ सङ्ख्याया विधार्थे धा (५.३.४२) ] । एकधा = एक प्रकार से। न एकधा = अनेकधा, नैकधा। जगत्कृत्स्नं प्रविभक्त- मनेकधा (गीता० ११.१३)। अधुनीत खगः स नैकधा (नैषध० २.२)। द्विधा = दो प्रकार, दो प्रकार से। द्विधा कृत्वाऽऽत्मनो देहमर्धेन पुरुषोऽभवत् (मनु० १.३२)। द्विधा भिन्नाः शिखण्डिभिः (रघु० १.३६)। त्रिधा = तीन प्रकार से। एकैव मूर्त्तिर्बिभिदे त्रिधा सा (कुमार० ७.४४)। चतुर्धा = चार प्रकार से। चतुर्धा विभजात्मानम् आत्मनैव दुरासदे (रामा- यण० ७.८६.११)। इसी प्रकार—पञ्चधा, षड्धा, षोढा, सप्तधा, अष्टधा, नवधा, बहुधा आदि। (ध्यमुंञ्) — [ एकाद्धो ध्यमुंञन्यतरस्याम् (५.३.४४) ] । ऐकध्यम् = एक बार। ऐकध्यं भुङ्क्ते (काशिका)। (धमुञ्) — [ द्वित्र्योश्च धमुञ् (५.३.४५) ] । द्वैधम् = दो प्रकार। श्रुतिद्वैधं तु यत्र स्यात् तत्र धर्मवुभौ स्मृतौ (मनु० २.१४)। त्रैधम् = तीन प्रकार। त्रैधमेष भजति त्रिभिर्गुणैः (माघ० १४.६१)। (एधाच्) — [ एधाच्च (५.३.४६) ] । द्वेधा = दो प्रकार से। चेधा द्वेधा भ्रमं चक्रे कान्तासु कनकेषु च। तासु तेष्व- प्यनासक्तः साक्षाद् भर्गो नराकृतिः (कुवलया०)। त्रेधा = तीन प्रकार से। त्रेधा विभज्य रचितां वहसेऽद्य वेणीम् (चम्पूभारत ६.३०)। तुभ्यं त्रेधा स्थितात्मने (रघु० १०.१६)। अब इस के आगे याप्ये पाशप् (५.३.४७) सूत्र से पाशप् प्रत्यय का विधान किया जाता है। तसिलादयः प्राक् पाशपः — में पाशप् से पूर्व का ग्रहण होने से पाशप् प्रत्ययान्त की अव्ययसंज्ञा नहीं होती। अत एव - याप्यो (निन्दितो) वैयाकरणः = ‘वैयाकरणपाशः’ इत्यादियों में सुँप् का लुक् नहीं होता, क्योंकि सुँब्लुक् तो अव्यय से परे ही हुआ करता है। देखें—अव्ययादाप्सुपः (३७२)। [ख] शस्प्रभृतयः प्राक् समासान्तेभ्यः ॥ (शस् से ले कर समासान्तों से पूर्व तक के प्रत्यय) (शस्) — [ बह्वल्पार्थाच्छस् कारकादन्यतरस्याम् (५.४.४२)] । बहुशः (स्) = बहुतों को, बहुतों से, बहुतों के लिये आदि। प्रत्येक कारक में प्रयोग होता है। बहूनि ददातीति बहुशो ददाति। बहुभिर्ददातीति बहुशो ददाति। बहुभ्यो