लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् । ३६८। (स्वरादिनिपातमव्ययम् से) । समासः—नोत्पद्यन्ते सर्वा वचनत्रयात्मिका¹ विभक्तयो यस्मात् सोऽसर्वविभक्तिः, बहुव्रीहिसमास । अर्थ—(असर्वविभक्ति.) जिस से वचनत्रयात्मिका सम्पूर्ण विभक्तिया उत्पन्न नही हो सकती वह (तद्धित = तद्धि- तान्त ²) तद्धितान्त (च) भी (अव्ययम्) अव्ययसञ्ज्ञक होता है । यथा—अत (इस से) इस तद्धितान्त से सब विभक्तिया उत्पन्न नही हो सकती, अर्थात् 'इस से को, इस से द्वारा, इस से के लिये' इत्यादि विभक्तियों वाला व्यवहार यहा सम्भव नही हो सकता । इसलिये यह अव्ययसञ्ज्ञक है । अत एव— अत्रत , तत्रत, कुत्रत. आदि प्रयोग ठीक नही । प्रशस्तं पचतीति—पचतिरूपम् [प्रशंसायां रूपप् (५ ३ ६६)], ईषद् असम्पूर्णं पचतीति पचतिकल्पम् [ईषदसमाप्तौ कल्पब्देश्यदेशीयर• (५ ३.६७)]। यहा इन तद्धि- तान्तो से भी वचनत्रयात्मिका सब विभक्तिया उत्पन्न नही हो सकती अत. इन की भी अव्ययसज्ञा हो कर सुँप् का लुक् प्राप्त होता है—जो अत्यन्त अनिष्ट है। किञ्च वचन- त्रयात्मिका सब विभक्तिया तो 'उभय' शब्द से भी उत्पन्न नही होती और यह तद्धितान्त भी है अत इस की भी अव्ययसज्ञा हो कर सुँब्लुक् आदि दोष प्राप्त होते हैं । इस पर उन उन तद्धितप्रत्ययो का परिगणन करते हैं जिन के अन्त मे आने से अव्ययसञ्ज्ञा होनी है³ । [लघु०] परिगणनं कर्तव्यम् । तसिलादय प्राक्पाशपः । शस्प्रभृतय. प्राक् समासान्तेभ्यः । अम् । आम् । कृत्वोऽर्थाः । तसि-वती । नानाञौ । एतदन्तम- व्ययम् । अत इत्यादि ॥ अर्थ.—उन तद्धित प्रत्ययो का परिगणन करना चाहिये— [क] 'तसिल्' से ले कर 'पाशप्' के पूर्व तक वे सब प्रत्यय । [ख] 'शस्' से ले कर समासान्तो के पूर्व तक वे सब प्रत्यय । [ग] 'अम्' और 'आम्' प्रत्यय । [घ] 'कृत्वसुँच्' तथा उस के अर्थ वाले अन्य प्रत्यय । १ एकवचनमुत्सर्गंत. करिष्यते—इस महाभाष्य के कथन से सब विभक्तियो का एक- वचन तो सब शब्दो से स्वत सिद्ध है ही, अत. 'असर्वविभक्तिः' यह कथन व्यर्थ हो जाता है । इसलिये यहा इस का आशय यह समझना चाहिये कि जिस तद्धि- तान्त से सब विभक्तियो के सब वचनो की उत्पत्ति न हो उस की अव्ययसज्ञा होती है । २. केवलस्य तद्धितस्य प्रयोगाभावेन फलाभावात् सज्ञाविधावपि तदन्तविधि । ३ यहा यह ध्यान रहे कि इस परिगणन के बिना दोषनिवृत्ति असम्भव है, यत. यह तद्धितश्चासर्वविभक्ति. (३६८) सूत्र व्यर्थ सा है। अत एव प्राचीन वैयाकरणो ने इस परिगणन को स्वरादिगण में सम्मिलित कर दिया है । देखें काशिकावृत्ति (१ १.३६) ।