लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअव्यय-प्रकरणम् ५६५ देना)—तिलेभ्यः प्रति यच्छति माषान् (काशिका), तिलों के बदले माष देता है। शेफालिभ्यो ददुर्लास्यं प्रति गन्धाच्च मारुताः (व्या० च०), वायु ने शेफालिका से गन्ध ले कर उस के बदले उन्हें नृत्य दे दिया। ७. आभिमुख्य में — अग्नि प्रति शलभाः पतन्ति, प्रत्यग्नि शलभाः पतन्ति । पूर्ववत् वैकल्पिक अव्ययीभावसमास हो जाता है। (७) परि । १. लक्षण (निशानी) — वृक्षं परि विद्योतते विद्युत् (काशिका), वृक्ष पर बिजली चमक रही है। २. इत्थम्भूताख्यान — साधुर्देवदत्तो मातरं परि । ३. भाग—यदत्र मां परि स्यात्तद्दीयताम्, इस में मेरा जो भाग है वह दे दीजिये । ४. वीप्सा — वृक्षं वृक्षं परि सिञ्चति । ५. मर्यादा — परि त्रिगर्तेभ्यो वृष्टो देवः, त्रिगर्त- देश तक (पर त्रिगर्त को छोड़ कर) मेघ बरसा । ६. दुःखी, तंग — परिग्लानोऽध्ययनाय =पर्यध्ययनः² । (८) अप। तक, मर्यादा अर्थ में- अप त्रिगर्तेभ्यो वृष्टो देवः, त्रिगर्तदेश तक (पर त्रिगर्त में नहीं) मेघ बरसा । अपपरी वर्जने (१.४.८७) से कर्मप्रवचनीयसंज्ञा हो कर उस के योग में — पञ्चम्यपाङ्परिभिः (२.३.१०) से पञ्चमी हो जाती है। (९) उप। १. हीन, निम्न — उप हरिं सुराः (सि० कौ०), देवता हरि से निम्नकोटि के हैं। शक्रादय उपाच्युतम् (वोपदेव), इन्द्र आदि भगवान् विष्णु से निम्न- स्तर के हैं। २. अधिक—उप परार्धे हरेर्गुणाः (सि० कौ०), हरि के गुण परार्धसंख्या से भी अधिक हैं। यस्मादधिकं यस्य चेश्वरवचनं तत्र सप्तमी (२.३.६) इस सूत्र से अधिक अर्थ के वाचक उप के योग में सप्तमी विभक्ति हो जाती है। (१०) अति । १. अतिशय, आधिक्य — अतिदानाद् बलिर्बद्धो नष्टो मानात् सुयोधनः । विनष्टो रावणो लौल्याद् अति सर्वत्र वर्जयेत् (चाणक्य०) । नातिदूरे = बहुत दूर नहीं = निकट । २. अतिक्रमण में--अति देवांस्ते मनुजाः परार्थे ये तनुत्यजः(व्या० च०), वे मनुष्य देवताओं का अतिक्रमण कर जाते हैं जो दूसरों के लिये प्राण देते हैं। अति देवान् कृष्णः (सि० कौ०) । श्रिया समानान् अति सर्वान् स्याम् (अथर्व० ११.१.२१), मैं लक्ष्मी में समान लोगों से आगे बढ़ जाऊँ । अतिरतिक्रमणे च (१.४. ९४) से कर्मप्रवचनीयसंज्ञा हो कर उस के योग में द्वितीया विभक्ति हो जाती है। अब तद्धितान्त अव्ययों का वर्णन करते हैं— [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(३६८) तद्धितश्चाऽसर्वविभक्तिः ।१।१।३७॥ यस्मात् सर्वा विभक्तिर्नोत्पद्यते स तद्धितान्तोऽव्ययं स्यात् ॥ अर्थः—जिस तद्धितान्त से वचनत्रयात्मिका सब विभक्तियां उत्पन्न नहीं हो सकतीं वह अव्ययसञ्ज्ञक हो। व्याख्या — तद्धितः ।१।१। च इत्यव्ययपदम् । असर्वविभक्तिः ।१।१। अव्ययम् १. प्रतिनिधि और प्रतिदान में प्रति की कर्मप्रवचनीयसंज्ञा हो कर इस के योग में पञ्चमी हो जाती है। देखें इस व्याख्या का विभक्त्यर्थपरिशिष्ट (३८, ३६) । २. पर्यादयो ग्लानाद्यर्थे चतुर्थ्या (वा० ६१) इस वार्त्तिक से नित्यसमास हो जाता है अतः लौकिकविग्रह में 'परि' का प्रयोग नहीं हो सकता ।