लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् कर्मप्रवचनीयसञ्ज्ञा होकर उस के योग में यस्मादधिकं यस्य चेश्वरवचनं तत्र सप्तमी (२.३.९) द्वारा कभी स्वामिवाचक से तथा कभी स्ववाचक से सप्तमी विभक्ति हो जाती है। २ मे, के विषय मे—हरौ इत्यधिहरि (हरि मे या हरि के विषय मे)। यद्यप्यव्ययीभावसमास के नित्य होने से लौकिकविग्रह मे 'अधि' लिखा नहीं जा सकता। (४) अपि। १ प्रश्न मे—अपि सन्निहितोऽत्र कुलपतिः (शाकुन्तल० १), क्या कुलपति आश्रम में हैं ? अप्यग्रणीर्मन्त्रकृतामृषीणां कुशाग्रबुद्धे कुशली गुरुस्ते ? (रघु० ५.४)। अपि क्रियार्थं सुलभं समित्कुशम् (कुमार० ५.३३)। २ थोड़ा, स्तोक, बिन्दु, ज़रा सा अंश आदि अर्थों मे—सर्पिषोऽपि स्यात्, मधुनोऽपि स्यात् (काशिका), घृत का अंश होगा, मधु का अंश होगा। ३ कामचारानुज्ञा—अपि सिञ्च अपि स्तुहि (काशिका), तुम्हारी इच्छा है सीचो या स्तुति करो। ४ सम्भावना प्रकट करने मे (शायद)—अपि नाम कुलपतेरियमसवर्णक्षेत्रसम्भवा स्यात् (शाकुन्तल० १)। अपि नाम रामभद्र पुनरपीदं वनमलङ्कुर्यात् (उत्तरराम० २)। ५ समुच्चय (भी)— अस्ति मे सोदरस्नेहोऽप्येतेषु (शाकुन्तल० १)। विष्णुशर्मणापि पाठितास्ते राजपुत्रा (पञ्च० प्रस्तावना)। ६ चाहे हो—अपि धन्वन्तरिर्वैद्यः किं करोति गतायुषि (सुभाषित०)। अपि ग्रावा रोदित्यपि दलति वज्रस्य हृदयम् (उत्तरराम० १.२८)। ७ जोर या Stress देने के लिये—विधुरपि विधियोगाद् ग्रस्यते राहुणासौ (हितोप० १.१६)। यूयमप्यनेन कर्मणा परिश्रान्ताः (शाकुन्तल० १)। ८. कवियों द्वारा विरो- धाभास प्रदर्शित करने मे—खर्वामपि अखर्वपराक्रमाम्, श्यामामपि यशःसमूहैःश्वेतीकृत- त्रिभुवनाम् (शिवराज० २)। ६. 'किम्' के साथ लग कर अनिश्चय मे—व्यतिषजति पदार्थानान्तरः कोऽपि हेतुः (उत्तरराम० ६.१२)। केऽपि एते प्रययसः त्वां विदूषय- (उत्तरराम० ४)। (५) अभि। १ लक्षण (निशानी)—वृक्षमभि विद्योतते विद्युत् (काशिका), वृक्ष के सामने बिजली चमक रही है। २ इत्थम्भूताख्यान—साधुर्देवदत्तो मातरमभि (काशिका)। ३ वीप्सा—वृक्षं वृक्षमभि सिञ्चति। ४ आभिमुख्य मे—अग्निमभि शलभाः पतन्ति (काशिका), पतङ्गे अग्नि के अभिमुख गिर रहे हैं। आभिमुख्य अर्थ मे वैकल्पिक अव्ययीभावसमास का भी विधान है—अभ्यग्नि शलभाः पतन्ति। लक्ष- णादि अर्थों मे 'अभि' की कर्मप्रवचनीयसञ्ज्ञा होकर उस के योग में द्वितीया विभक्ति हो जाती है। (६) प्रति। १ लक्षण—वृक्षं प्रति विद्योतते विद्युत् (काशिका)। तौ दम्पती स्वां प्रति राजधानीं प्रस्थापयामास वशी वसिष्ठः (रघु० २.७०)। मन्दोत्सुक्योऽस्मि नगरगमनं प्रति (शाकुन्तल० १)। २ इत्थम्भूताख्यान—साधुर्देवदत्तो मातरं प्रति (काशिका)। ३. भाग—यदन्र मा प्रति स्यात्तद् दीयताम् (काशिका), इस में मेरा जो हिस्सा हो वह दीजिये। ४ वीप्सा—वृक्षं वृक्षं प्रति सिञ्चति। ५. प्रतिनिधि— अभिमन्युरर्जुनत प्रति (काशिका), अभिमन्यु अर्जुन का प्रतिनिधि है। प्रद्युम्नो वासु- देवतः प्रति (काशिका), प्रद्युम्न वासुदेव का प्रतिनिधि है। ६ प्रतिदान (बदले में