भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 578

अव्यय-प्रकरणम् ५६३ प्र आदि शब्द भी निपाताधिकार में प्रादयः (५४) सूत्रद्वारा निपातसंज्ञक होकर अव्ययसंज्ञक हो जाते हैं। इन प्र आदियों का क्रिया के योग में तथा कुछ का क्रियायोग के अभाव में भी स्वतन्त्ररीत्या प्रयोग हुआ करता है। क्रिया के योग में उन की उपसर्गाः क्रियायोगे (३५) सूत्र से उपसर्गसंज्ञा विशेष है। निपातसंज्ञा तो दोनों अवस्थाओं में ही अक्षुण्ण बनी रहती है। अब प्रादियों में क्रियायोग के अभाव में स्वतन्त्रतया प्रयुक्त होने वाले कुछ प्रसिद्ध २ निपातों का विवेचन करते हैं— (१) अनु । १. पीछे—विष्णोः पश्चाद् अनुविष्णु (सि० कौ०)। आश्वास्यादौ तदनु कथयेर्माधवीयामवस्थाम् (मालती० ६.२६)। २. के साथ साथ (लम्बाई में)— अनुगङ्गं वाराणसी (व्या० च०), गङ्गातट के साथ साथ बनारस बसा हुआ है। ३. हीन अर्थ में—अनु पाणिनिमन्वे वैयाकरणाः (व्या० च०), अन्य वैयाकरण पाणिनि से नीचे हैं। अन्वर्जुनं धानुष्काः (व्या० च०), अन्य धनुर्धारी अर्जुन से हीन हैं। इसी प्रकार—अन्वाम्रं फलानि आदि । ४. लक्षण (निशानी) अर्थ में—वृक्षमनु विद्योतते विद्युत् (काशिका), बिजली वृक्ष के समीप चमक रही है। इसी प्रकार—क्रमेण सुप्तामनु संविवेश सुप्तोत्थितां प्रातरनूदतिष्ठत् (रघु० २.२४)। ५. इत्थम्भूताख्यान (वह इस तरह का है—इस प्रकार कहने) में—साधुर्देवदत्तो मातरमनु, देवदत्त माता के प्रति सद्व्यवहारी है। ६. भाग (हिस्सा) अर्थ में—लक्ष्मीर्हरिमनु (सि० कौ०), लक्ष्मी विष्णु का भाग है। ७. वीप्सा—वृक्षं वृक्षमनु सिञ्चति (सि० कौ०), प्रत्येक वृक्ष को सींचता है। ८. हेतुयुक्त अनन्तर अर्थ में—जपमनु प्रावर्षत् (सि० कौ०), जप के कारण जप के बाद वर्षा हुई । ६. के अनुसार—अनुक्रमम्, अनुज्येष्ठम्, अनु- रूपम् । इस के अन्य भी अनेक अर्थ आकरग्रन्थों में देखें। ध्यान रहे कि प्रायः इन अर्थों में इस की कर्मप्रवचनीयसंज्ञा हो जाती है तब कर्मप्रवचनीययुक्ते द्वितीया (२.३.८) सूत्र से इस के योग में द्वितीया विभक्ति हो जाती है। विशेष सिद्धान्तकौमुदी में देखें । (२) आङ् = आ । १. ईषत् (थोड़ा) अर्थ में—ओष्णम् (ईषदूष्णम्—कुछ गरम)। २. मर्यादा अर्थ में—ओदकान्ताद् आवनान्ताद्वा प्रियं प्रोष्यमनुव्रजेत् (धर्म- शास्त्रे), तालाब या वन के अन्त तक प्रवास करते बन्धु के साथ जाये। इसीप्रकार— आ परितोषाद् विदुषां न साधु मन्ये प्रयोगविज्ञानम् (शाकुन्तल० १.२) । आ विन्ध्याद् उत्तरपथः । ३. अभिविधि अर्थ में—आ कुमाराद् यशः पाणिनेः, पाणिनि का यश बच्चों तक अर्थात् बच्चों को भी अभिव्याप्त कर रहा है। इसीप्रकार—आमूलाच्छ्रोतु- मिच्छामि (शाकुन्तल० १) । मर्यादा और अभिविधि अर्थों में आङ् मर्यादावचने (१.४.८८) से आङ् की कर्मप्रवचनीयसंज्ञा हो जाती है तब इस के योग में पञ्चम्यपाङ्परिभिः (२.३.१०) सूत्र से पञ्चमीविभक्ति हो जाती है । (३) अधि । १. स्व-स्वामिभाव सम्बन्ध में—अधि ब्रह्मदत्ते पाञ्चालाः (काशिका), पाञ्चालदेश ब्रह्मदत्त के अधीन है। अधि पाञ्चालेषु ब्रह्मदत्तः (काशिका), ब्रह्मदत्त पाञ्चालदेश का अधिकृत राजा है। इसी प्रकार—अधि रामे भूः, अधि भुवि रामः (सि० कौ०) । ध्यान रहे कि यहां अधिरेरीश्वरे (१.४.६६) सूत्र से 'अधि' की