भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 577, कुल 633 में से

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पृष्ठ 577

५६२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् अव्यय से नञ्समास हो कर 'अकस्मात्' अव्यय बनता है। पुन इस अव्यय से अकस्माद्भव आकस्मिक (विनयादित्वाट् ठकि टेलोप ) सिद्ध होता है । (८५) प्रगे = प्रात काल, सुबह सवेरे । साय स्नायात् प्रगे तथा (मनु० ६ ६)। इसी से ही 'प्रगेशय' (प्रभात मे सोने वाला) आदि निष्पन्न होते हैं । सायंचिरंप्राह्णे- प्रगेऽव्ययेभ्यष्ट्युट्तुलौ तुट् च (१०८३) सूत्र मे अनव्यय प्रगशब्द को एत्व निपातन किया गया है । (८६) परश्व (स्)* = आगामी कल से अगला दिन, परसो । परश्वो यास्यति मुनि । अनागतेऽह्नि श्व. परश्वश्च परेऽहनि— इत्यमर । (८७) साक् = शीघ्र । साक् सरन्त्यभिसारिका. (हेमचन्द्र) । (८८) अरम् = शीघ्र । अर याति तुरङ्गम (हेमचन्द्र) । (८९) रह (स्)* = एकान्त एकान्त मे, चुपके से । अत परीक्ष्य कर्तव्य विशेषात् सगत रह (शाकुन्तल० ५ २४)। रहो भव रहस्यम्, दिगादित्वाद्यत् । रहस् शब्द सकारान्त नपुसक भी होता है। यथा—रहस्यानुज्ञामधिगम्य भूभृत. (किरात० १ ३) । (९०) उपजोषम् = १. अपनी इच्छा के अनुसार, स्वेच्छा से । यथोपजोषं वासांसि परिधाय— (भागवत० ८ ६ १५), अपनी इच्छानुसार वस्त्र धारण करके । २ 'दिष्ट्या' के अर्थ मे—उपजोषं ते पुत्रो जातः (हेमचन्द्र), बडे आनन्द की बात है कि तेरा पुत्र उत्पन्न हुआ है। 'समुपजोषम्' भी देखा जाता है। दिष्टया समुपजोषञ्चे- त्यानन्दे— इत्यमर । स्वरादियो और चादियों का ठीक तरह से पृथक् २ निरूपण एक दुष्कर कार्य है। कुछ स्वरादि शब्द चादियो में तथा कुछ चादि शब्द स्वरादियो मे मिश्रित हो गये हैं। कुछ शब्द तो दोनो ही गणो मे पढे गये हैं। परन्तु यहा यह ज्ञातव्य है कि जिन मे निपातस्वर (आद्युदात्त) दृष्ट हो उन्हे चादियो मे तथा जिन मे अन्तोदात्त- स्वर दृष्ट हो उन्हें स्वरादियो मे गिनना चाहिये । किञ्च जहा दोनो प्रकार के स्वर अभीष्ट हो उन को दोनो ही गणो मे पढना चाहिये¹। इन चादियो से अतिरिक्त अन्य भी बहुत से निपात होते हैं। उन सब की भी स्वरादिनिपातमव्ययम् (३६७) सूत्र से अव्ययसज्ञा हो जाती है। इन सब का विवेचन जानने के इच्छुक प्राग्रीश्वरान्निपाताः (१ ४ ५६) के अधिकार को अष्टाध्यायी या वार्तिकावृत्ति मे देखें² । १. परन्तु यह स्वरव्यवस्था अनेकाच् शब्दो के लिये ही समझनी चाहिये एकाच् शब्दो के लिये नही, क्योकि एकाच् शब्दो मे चाहे आद्युदात्त स्वर हो या अन्तोदात्त, कोई अन्तर ही नही पडता । २ निपातो के विषय में एक सूक्ति बहुत प्रसिद्ध है— इयन्त इति सख्यान निपातानां न विद्यते । प्रयोजनवशादेते निपात्यन्ते पदे पदे॥

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