भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 575

५६० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् हरन्ति चोरा (हेमचन्द्र)। इसी से ही 'प्रसह्यकारी, प्रसह्याहरणम्' आदि शब्द बनते हैं। (५८) अह्नाय शीघ्र, फौरन। अह्नाय तावदहनेन तमो निरस्तम् (रघु० ५।७१)। (५९) व — सदृश। मणीव उष्ट्रस्य लम्बेते प्रियो वत्सतरी मम (महाभारत १२ ।७२।१२)। अत्र तु इवार्थे वशब्दो वाशब्दो वा बोध्य —सि० कौ०। (६०) समन्तात्* = चारों ओर¹। हेमचन्द्र ने इसे विभक्तिप्रतिरूपक निपात माना है। लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्तात् (गीता० ११।३०)। कालागुरूद्गर्हनमध्यगत समन्तात् लोकोत्तर परिमलं प्रकटीकरोति (भामिनी० १।६६)। (६१) भवतु अलम् (बम निषेध) का अर्थ। गोत्रेण पुष्करावर्त्त ! किं त्वया गर्जितं कृतम्। विद्युताऽत्र भवत्वङ्गिहिंसा ऊर्द्धबिलं घनम् (दृष्टा०)। (६२) बलवत् पूरी तरह से, पूर्णरूपेण। बलवदपि शिक्षितानामात्मन्यप्रत्ययं चेत (शाकुन्त० १।२)। पुनर्बशित्वाद् बलवन्निगृह्य (कुमार० ३ ६६)। (६३) तदपि — तो भी। तदपि तव गुणानामीश पारं न याति (शिवमहिम्न स्तोत्र)। (६४) यस्मात् = जिस कारण से, क्योकि। अवजानासि मां यस्मादतस्ते न भविष्यति। मत्प्रसूतिमणाराध्य प्रजेति त्वां शशाप सा (रघु० १ ।७७)। (६५) तस्मात् — इसलिये। तस्माद् युध्यस्व भारत (गीता० २ १८)। (६६) या (स्)। १ स्मरण में—आ, उपनयतु भवान् भूर्जपत्रम् (विक्रमो० २)। २ क्रोध प्रकट करने में—आ कथमद्यापि राक्षसत्रास (उत्तरराम० १)। आ पापे तिष्ठ तिष्ठ (मालती० ८)। ३ क्रोधपूर्वक अपाकरण में—आ क एष मयि स्थिते चन्द्रमभिभवितुमिच्छति बलात् (मुद्रा० १)। आ ! धूयामङ्गलपाठक (वेणी० १)। ४ सन्ताप (दुःख) प्रकट करने में—विद्यामातरमा प्रदर्श्य नृपशून् भिक्षामहे निस्त्रपा (उद्भट)। (आ स्मरणेऽपाकरणे कोपसन्तापयोस्तथा—इति मेदिनी)। (६७) ही। विस्मय म—हतविधिलसितानां ही विचित्रो विपाक (माघ० ११।६४), आश्चर्य है कि अभाग विधाता की चेष्टाआ का विचित्र फल है। (६८) वै* = अवधारण (ही)—पिता वै गार्हपत्योऽग्नि (मनु० २ ।२३१)। आपो वै नरसूनवः (मनु० १ ।१०)। आत्मा वै पुत्रनामासि (कौषी० ब्रा० २ ।१६)। (६९) किञ्च* = और भी, इसके व्यतिरिक्त, पुनः। किञ्च सर्वगुणसम्पन्नोऽपि भेदेन बध्यते (पञ्च० ४)। किञ्च काव्यस्योपादेयत्वमग्निपुराणेऽप्युक्तम् (साहित्य० १)। किञ्च काव्याद् धर्मप्राप्तिर्भगवान्नारायणचरणारविन्दवन्दनादिना (साहित्य० १)। (७०) यदि* = अगर (पक्षान्तर) —यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोष १ इसी अर्थ में 'समन्ततः' अव्यय भी बहुत प्रसिद्ध है। यथा—मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः (गीता० ६ २४)। समन्ततस्तु परितः सर्वतो विश्वगित्यपि-- इत्यमरः। समन्तादिति समन्ततः आद्यादित्वात्तसिरित्यमरव्याख्यायां नानूजि- दीक्षितः।