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लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

५७६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्

(वतिँ)—[तेन तुल्यं क्रिया चेद्वति (५।१।११४)]। ब्राह्मणेन तुल्यं वर्तते इति ब्राह्मणवद् वर्तते। ब्राह्मण जैसा व्यवहार करता है। प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत् (चाणक्य०)। गुरुवद् गुरुपुत्रे वर्तित- व्यम्। इसी प्रकार—यद्वत्=जैसे, तद्वत्=वैसे, यथावत्=ठीक तरह। आदि। (वतिँ)—[तत्र तस्येव (५।१।११५)]। मथुरायामिव स्रुघ्ने प्राकारः—मथुरावत् स्रुघ्ने प्राकारः। मथुरा में जैसे प्राकार है वैसे स्रुघ्न में है। यज्ञदत्तस्येव—यज्ञदत्तवद् देवदत्तस्य दन्ताः। यज्ञदत्त के दांतों की तरह देवदत्त के दान्त हैं। (वतिँ)—[तदर्हम् (५।१।११६)]। राजानमर्हतीति—राजवदस्य पालनं क्रियताम्। ऋषिवदस्य समादरः कर्तव्यः। [च] नानाञौ—ना और नाञ् प्रत्यय। (ना, नाञ्)—[विनञ्भ्यां नानाञौ न सह (५।२।२७)]। विना—वगैर। विना मलयमन्यत्र चन्दनं न प्ररोहति (पञ्च० १।४१)। नाना=वगैर। नाना नारीं निष्फला लोकयात्रा (गणरत्न०)। इन दोनों का उल्लेख पीछे स्वरादिगण में हो चुका है। विशेष वक्तव्य वहीं देखें। यहां पर तद्धितान्त अव्ययों का वर्णन समाप्त होता है। अब अग्रिम दो सूत्रों द्वारा कृदन्त अव्ययों को प्रस्तुत करते हैं— [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(३६६) कृन्मेजन्तः। १।१।३८॥ कृद् यो मान्त एजन्तश्च तदन्तमव्ययं स्यात्। स्मारं स्मारम्। जीवसे। पिबध्यै॥ अर्थ—मकारान्त कृत्प्रत्यय या एजन्त कृत्प्रत्यय जिस के अन्त में हो उस की अव्ययसञ्ज्ञा हो जाती है। व्याख्या—कृत् १।१। मेजन्तः १।१। अव्ययम् १।१। (स्वरादिनिपातमव्ययम् से)। समास—म् च एच् च—मेचौ, इतरेतरद्वन्द्वः। मेचोऽन्तो यस्य स मेजन्तः, बहुव्रीहिसमासः। सौत्रत्वात्कुत्वाभावः। ध्यान रहे कि केवल कृत्प्रत्यय का प्रयोग नहीं हो सकता अतः सञ्ज्ञाविधि में भी तदन्तविधि हो कर 'कृत्' से कृदन्त का ग्रहण होना है। अर्थ—(मेजन्त) मकारान्त या एजन्त (कृत्=कृदन्त) जो कृत्, वह जिस के अन्त में हो ऐसा शब्द (अव्ययम्) अव्ययसञ्ज्ञक होता है। णमुल्, वमुल्, खमुञ्, तुमुन्—ये चार प्रत्यय ही कृत्प्रत्ययों में मान्त होते हैं। इन के उदाहरण क्रमशः यथा— णमुल्—स्मारं स्मारम्। स्मृ चिन्तायाम् (भ्वा० प०) धातु से आभीक्ष्ण्ये णमुल् च (८८५) सूत्रद्वारा णमुल् प्रत्यय, अनुबन्धलोप तथा अचो ञ्णिति (१८२) से वृद्धि और रपर करने से—स्मारम्। 'स्मारम्' यह कृदन्त है, इस के अन्त में णमुल् (अम्) यह कृत्प्रत्यय किया गया है। अतः प्रकृतसूत्र से अव्ययसञ्ज्ञा होने के कारण

अव्यय-प्रकरणम् ५७७ कृदन्तत्वात् प्रातिपदिकत्वेन उत्पन्न सुँप् का अव्ययादाप्सुपः (३७२) से लुक् हो जाता है। अब नित्यवीप्सयोः (८८६) से द्वित्व हो कर 'स्मारं स्मारम्' प्रयोग सिद्ध होता है। इसीप्रकार—'ध्यायं ध्यायम्' । ध्यायं ध्यायं परं ब्रह्म स्मारं स्मारं गुरोर्गिरः । सिद्धा- न्तकौमुदीव्याख्यां कुर्मः प्रौढमनोरमाम् (प्रौढमनोरमादौ), परब्रह्म का बार बार ध्यान कर तथा गुरुजी के वचनों का बार बार स्मरण कर मैं (भट्टोजिदीक्षित) सिद्धान्त- कौमुदी की व्याख्या प्रौढमनोरमा की रचना करता हूं । कमुँल्—यह प्रत्यय वेद में ही प्रयुक्त होता है । अग्निं वै देवा विभाजं नाश- क्नुवन् (मैत्रा० सं० १.६.४), विभाजम् = विभक्तुमित्यर्थः । यहां विपूर्वक भज् धातु से णमुँल् प्रत्यय किया गया है । अपलुपं नाशक्नोत् (मैत्रा० सं० १.६.५), अपलुपम् = अपलोप्तुमित्यर्थः । अपपूर्वक लुप् धातु से कमुँल् प्रत्यय किया गया है । विभाजम् और अपलुपम् दोनों के अन्त में मकारान्त कृत् है अतः इन की प्रकृतसूत्र से अव्ययसंज्ञा हो कर अव्ययादाप्सुपः (३७२) से सुँप् का लुक् हो जाता है । खमुँञ्—चोरङ्कारम् आक्रोशत (तुम चोर हो—ऐसा कह कर गाली देता है)। यहां 'कृ' धातु से कर्मण्याक्रोशे कृञः खमुँञ् (३.४.२५) सूत्र द्वारा खमुँञ् प्रत्यय किया गया है । मकारान्त कृत् प्रत्यय अन्त में होने के कारण 'चोरङ्कारम्' की अव्ययसंज्ञा हो कर सुँब्लुक् हो जाता है । तुमुँन्—पठितुम् (पढ़ने के लिये), भवितुम् (होने के लिये) । इन में तुमुँ- ण्वुलौ० (८४६) आदि सूत्रों से तुमुँन् (तुम्) प्रत्यय किया जाता है । मकारान्त कृत् प्रत्यय अन्त में होने के कारण अव्ययसंज्ञा हो कर इन से परे सुँप् का लुक् हो जाता है । अनुवादोपयोगी तीन सौ से अधिक सार्थ तुमुन्प्रत्ययान्तों का एक बृहत्संग्रह इस व्याख्या के तृतीयभागस्थ (८५०) सूत्र पर दिया गया है वहीं देखें । ध्यान रहे कि णमुँल् आदि चारों कृत्प्रत्यय अनुबन्धों का लोप हो जाने से मकारान्त हो जाते हैं । यथा—णमुँल् = अम्, कमुँल् = अम्, खमुँञ् = अम्, तुमुँन् = तुम् । कृत्प्रत्ययों में एजन्तप्रत्यय (एकारान्त, ओकारान्त, ऐकारान्त, औकारान्त) तुमर्थे से-सेन्० (३.४.६) आदि सूत्रों से वेद में विधान किये जाते हैं। तदन्तों की भी प्रकृतसूत्र से अव्ययसंज्ञा हो जाती है । अव्ययसंज्ञा का प्रयोजन सुँब्लुक् आदि है । तथाहि— १. से—वक्षे (कहने के लिये) ।२ | ३. असे—जीवसे (जीने के लिये) । २. सेन् (से) = एषे (जाने के लिये) । | ४. असेन् (असे)—पूर्वोक्त उदाहरण । १. इन की पूरी सिद्धि इस व्याख्या के तृतीयभागस्थ (८८६) सूत्र पर देखें । २. तुमर्थे से-सेन्-असे-असेन्-क्से-कसेन्-अध्यै-अध्यैन्-कध्यै-कध्यैन्-शध्यै-शध्यैन्-तवै- तवेङ्-तवेनः (३.४.६)—वेद में तुमुन् प्रत्यय के अर्थ में धातु से परे से, सेन् ल० प्र० (३७)

५७८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् ५ कसे (से) — प्रेषे (भेजने के लिये) । १६. कै प्रत्ययान्त — प्रयै (जाने के लिये) १ ६. कसेन् (असे) — श्रियसे (श्रयितुम्) । १७ इध्यै ,, — रोहिष्यै (रोढुम्) । ७ अध्यै — पृणध्यै (भरने के लिये) । १८ ,, ,, — अव्यथिष्यै (अव्यथ- ८ अध्यैन् (अध्यै) — पूर्वोक्त उदाहरण । नाय) ९ कध्यै (अध्यै) — आह्वध्यै (आह्नोतुम्) । १९ वे प्रत्ययान्त — दृशे (देखने के लिये) २ १० कध्यन् (अध्यै) — पूर्वोक्त उदाहरण । २० ,, — विख्ये (विख्यातुम्) । ११. शध्यै (अध्यै) — मादयध्यै (माद- २१ तवै — न म्लेच्छितवै (अपशब्द नही यितुम्) । बोलने चाहिये) ३ १२ शध्यैन् (अध्यै) — पिवध्यै (पीने के २२ केन् (ए) — अवगाहे (अवगाहित- लिये) । व्यम्) । १३ तवै — दातवै (देने के लिये) । १४ तवेङ् (तवे) — सूनवे (जनने के लिये) । २३ एश्प्रत्ययान्त — अवचक्षे (अवख्यात- १५ तवेन् (तवे) — कर्त्तवे (करने के लिये) । व्यम्) ४ अब ग्रन्थकार अन्य कृदन्त अव्ययो का निरूपण करते हैं— [लघु०] संज्ञा-सूत्रम् — (३७०) क्त्वा-तोसुन्-कसुनः १।१।३६॥ एतदन्तमव्ययम् । कृत्वा । उदेतोः । विसृप ॥ अर्थः— क्त्वा, तोसुन् और कसुन् प्रत्यय जिस के अन्त मे हो वह भी अव्यय- संज्ञक होता है। व्याख्या— क्त्वा-तोसुन्-कसुन् १।३। अव्ययानि १।३। (स्वरादिनिपातम- व्ययम् से वचनविपरिणाम द्वारा) । केवल प्रत्यय की संज्ञा का कुछ भी प्रयोजन न होने से तदन्तविधि हो जाती है। अर्थ — (क्त्वा-तोसुन्-कसुन्) क्त्वा, तोसुन् या कसुन् प्रत्यय जिन के अन्त में हों वे शब्द (अव्ययानि) अव्ययसंज्ञक होते हैं। उदा- हरण यथा— आदि पन्द्रह प्रत्यय होते हैं। इन प्रत्ययो मे अनुबन्धभेद स्वरभेद के लिये मा गुणवृद्धिनिषेध आदि के लिये समझना चाहिये। १ प्रयै-रोहिष्यै अव्यथिष्यै (३ ४ । १०) — तुमुन् प्रत्यय के अर्थ मे प्रयै, रोहिष्यै और अव्यथिष्यै ये तीन कृदन्त शब्द वेद में निपातित किये जाते हैं। २ दृशे विख्ये च (३ ४ । ११) — तुमुन् प्रत्यय के अर्थ मे दृशे और विख्ये ये दो कृदन्त शब्द वेद मे निपातित किये जाते हैं। ३. कृत्यार्थे तवै-केन्-केन्य-त्वनः (३ ४ । १४) — कृत्यप्रत्ययो के अर्थ में वेद मे तवै, केन्, केन्य और त्वन् प्रत्यय धातु से परे होते हैं। तवै और केन् प्रत्यय एजन्त कृत्यप्रत्यय हैं अत एतदन्तो की ही अव्ययसंज्ञा होती है अन्यदन्तों की नही। ४ अवचक्षे च (३.४.१५) — कृत्यप्रत्यय के अर्थ में वेद में 'अवचक्षे' यह कृदन्त शब्द निपातित किया जाता है।

अव्यय-प्रकरणम् ५७६ क्त्वा (त्वा)—कृत्वा, पठित्वा, भूत्वा, गत्वा आदि। यहां समानकर्तृकयोः पूर्वकाले (८७६) सूत्र से क्त्वा प्रत्यय हो जाता है। अतः क्त्वाप्रत्ययान्त होने के कारण इन की प्रकृतसूत्र से अव्ययसंज्ञा हो जाती है। अव्ययसंज्ञा का प्रयोजन सुँब्लुक् (३७२) आदि होता है। तोसुँन् (तोस्)—उदेतोः (उदय होने तक), प्रवदितोः (बोलने तक), प्रच- रितोः (चलने तक) आदि। यहां भावलक्षणे स्थेण्वृञ्चदिचरिहृतमिजनिभ्यस्तोसुँन् (३.४.१६) सूत्र द्वारा तोसुँन् (तोस्) प्रत्यय हो जाता है। अतः इन की अव्ययसंज्ञा हो जाती है। कसुँन् (अस्)—विसृपः, आत्सृदः। यहां सृपिशृदोः कसुँन् (३.४.१७) सूत्र- द्वारा कसुँन् प्रत्यय हो जाता है। अतः प्रकृतसूत्र से तदन्तों की अव्ययसंज्ञा हो जाती है। क्त्वा, तोसुँन् और कसुँन् इन तीन प्रत्ययों में तोसुँन् और कसुँन् केवल वेद में तथा क्त्वा प्रत्यय लोक और वेद दोनों में समानरूप से प्रयुक्त होता है। ये तीनों प्रत्यय भी कृत्संज्ञक हैं। अब अव्ययीभावसमास की भी अव्ययसंज्ञा करते हैं— [लघु०] संज्ञा-सूत्रम्—(३७१) अव्ययीभावश्च ।१।१।४०॥ अधिहरि ॥ अर्थः—अव्ययीभावसमास भी अव्ययसंज्ञक होता है। व्याख्या—अव्ययीभावः १।१। च इत्यव्ययपदम्। अव्ययम् १।१। (स्वरादि- निपातमव्ययम् से)। अर्थः—(अव्ययीभावः) अव्ययीभावसमास (च) भी (अव्ययम्) अव्ययसंज्ञक होता है। अव्ययीभावसमास का विवेचन इस व्याख्या के समासप्रकरण में किया गया है वहीं देखें। उदाहरण यथा— अधिहरि [हरौ—इत्यधिहरि, हरि में]। यहां विभक्त्यर्थ में अव्ययं विभक्ति- समीप-समृद्धि० (६०८) सूत्र द्वारा अव्ययीभावसमास हो कर समासकार्य करने पर 'अधिहरि' शब्द निष्पन्न होता है¹। इस की प्रकृतसूत्र से अव्ययसंज्ञा हो जाती है अतः समासत्व के कारण प्रातिपदिक से उत्पन्न सुँ—सुँप् का अव्ययादाप्सुपः (३७२) से लुक् हो जाता है। इसी प्रकार—'यथाशक्ति' आदियों में समझ लेना चाहिये। अब अव्ययसंज्ञा करने के मुख्य प्रयोजन सुँब्लुक् का प्रतिपादन करते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३७२) अव्ययादाप्सुपः ।२।४।८२॥ अव्ययाद्विहितस्य आपः सुपश्च लुक्। तत्र शालायाम् ॥ १. इस की सम्पूर्ण सिद्धि अव्ययीभावसमास प्रकरण में देखें।

५८० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् अर्थ.—अव्यय से विधान किये गये आप् (टाप् आदि स्त्रीप्रत्ययो) तथा सुँप् प्रत्ययो का लुक् हो जाता है । व्याख्या —अव्ययात् ।२।४।८२। आप्सुपं ।६।१।१। लुक् ।१।१।१। (ण्यक्क्षत्रियार्षेञितो यूनि लुगणिञोः से) । आप् च सुँप् च आप्सुपं, तस्य = आप्सुपं, समाहारद्वन्द्वः । अर्थः —(अव्ययात्) अव्यय से विधान किये गये (आप्सुपं) आप् और सुँप् प्रत्यय का (लुक्) लुक् हो जाता है । आप् से टाप्, डाप्, चाप् आदि स्त्रीप्रत्ययो का तथा सुँप् से सुँ, औ, जस आदि का ग्रहण होता है । उदाहरण यथा — तत्र शालायाम् (उस शाला मे) । यहा 'तत्र' यह अव्यय 'शाला' इस स्त्री- लिङ्गी पद का विशेषण है अत इस से अजाद्यतष्टाप् (१२४५) द्वारा टाप् प्रत्यय हो कर प्रकृतसूत्र से लुक् हो जाता है । सुँप का लुक् तो प्रत्येक अव्यय से होता ही है—च+सुँ=च । वा+सुँ= वा । इस सूत्र पर विशेष विचार सिद्धान्तकौमुदी की व्याख्याओ मे देखें । अब अव्यय का लक्षण करने के लिये एक प्राचीन श्लोक (गोपथब्राह्मण की ब्रह्मपरक श्रुति) उद्धृत करते हैं— [लघु०] सदृशं त्रिषु लिङ्गेषु सर्वासु च विभक्तिषु । वचनेषु च सर्वेषु यन्न व्येति तदव्ययम् ॥ अर्थ.—जो तीनो लिङ्गो, सब विभक्तियो और सब वचनो मे विकार को प्राप्त नही होता—एक जैसा रहता है—बदलता नही, वह अव्यय कहाता है । व्याख्या—अव्ययम् यह अन्वर्थ अर्थात् अर्थानुसारिणी सज्ञा है । नास्ति व्यय =विनाश =विकृतिर्यस्य यस्मिन् वा तद् अव्ययम् । जिस में किसी प्रकार की विकृति न हो—प्रत्येक अवस्था मे एक जैसा स्वरूप रहे उसे अव्यय कहते हैं । इसी लक्षण को ऊपर के श्लोक में और अधिक परिष्कृत किया गया है । श्लोक मे 'विभक्ति' से तात्पर्य कर्म आदि कारक और 'वचन' से एकत्व, द्वित्व, बहुत्व का ग्रहण समझना चाहिये । अब 'अव' और 'अपि' उपसर्गों के विषय मे भागुरि आचार्य का मत दर्शाते हैं— [लघु०] वष्टि' भागुरिरल्लोपम् अवाप्योरुपसर्गयोः । आप् चैव हलन्ताना यथा वाचा निशा दिशा ॥ वगाहः। अवगाहः। पिधानम् । अपिधानम् ॥ अर्थ —भागुरि आचार्य 'अव' और 'अपि' उपसर्गों के (आदि) अकार का लोप चाहते हैं तथा हलन्त शब्दो से स्त्रीत्ववोधक 'आप्' प्रत्यय भी विधान करना चाहते हैं । १. वष्टेश्चान्दसत्वेन प्रयोगश्चिन्त्य इति नागेशः । एतज्ज्ञापकाद् भाषायामप्यस्य प्रयोग इति तत्त्वबोधिनी-बालमनोरमाकारादयः ।

अव्यय-प्रकरणम् ५८१

व्याख्या—भागुरि आचार्य सम्भवतः पाणिनि से पूर्ववर्त्ती वैयाकरण हो चुके हैं। जगदीश तर्कालङ्कार ने शब्दशक्तिप्रकाशिका में उन के अनेक मन्तव्यों का उल्लेख किया है। परन्तु अष्टाध्यायी में पाणिनि ने उन के मत का कहीं उल्लेख नहीं किया। भागुरि के मत में 'अव' और 'अपि' उपसर्गों के आदि अकार का लोप हो जाता है¹। अन्य आचार्यों के मत में न होने से विकल्प सिद्ध हो जाता है। उदाहरण यथा— (१) वगाहः, अवगाहः (स्नान आदि)। अवपूर्वक गाह् (गाहूँ विलोडने, भ्वा० आ०) धातु से भाव आदि में घञ् प्रत्यय हो कर अनुबन्धलोप करने से 'अव- गाहः' प्रयोग सिद्ध होता है। परन्तु भागुरि आचार्य के मत में 'अव' उपसर्ग के अकार का लोप हो कर—'वगाहः' प्रयोग बनता है। हमें सब आचार्य मान्य हैं अतः लोक में 'अवगाहः, वगाहः' दोनों प्रयोग मान्य हैं। इसी प्रकार शिष्टप्रयोगानुसार अन्य प्रत्ययों में भी समझ लेना चाहिये। साहित्यगत कुछ उदाहरण यथा—सुभगसलिलावगाहाः (शाकुन्तल० १.३)। जलावगाहक्षणमात्रशान्ता (रघु० ५.४७)। दग्धानामवगाहनाय विधिना रम्यं सरो निर्मितम् (शृङ्गारतिलक)। पूर्वापरौ तोयनिधी वगाह्य (कुमार० १.१)। तमोऽपहन्त्री तमसां वगाह्य (रघु० १४.७६)। सुरभीकृतमपि नीर वगाह- मानमत्तमत्तङ्गजमदधाराभिः कटूकूर्वन् (शिवराज० २)। इसी प्रकार—अवतंसः—वतंसः (कर्णभूषण या शिरोभूषण, श्रेष्ठ)। यैर्वतंस- कुसुमैः प्रियमेताः(माघ० १०.६७)। पित्तेन दूने रसने सितापि तिक्तायते हंसकुलावतंस (नैषध० ३.६४)। अवस्था—वस्था (हालत, दशा)। कुम्भोऽप्येतां पितुरूपनतां वीक्ष्य वस्थां वपुष्मान् (महावीर० ६.४४)। अवस्था वस्तूनि प्रथयति च सङ्कोचयति च (नीति० ३६)। अवक्रयः - वक्रयः (मूल्य)। अवकीयतेऽनेनेति अवक्रयः, पुंसि संज्ञायां घः प्रायेण (८७२) इति घः। मूल्यं वस्नोऽप्यवक्रय इत्यमरः। भागुरिमतेऽकारलोपे वक्रयः। मूल्ये वस्नाऽर्घ-वक्रया इति हेमचन्द्रः। अवक्रमः—वक्रमः (आप्टे०)। (२) पिधानम्, अपिधानम् (ढांपना या ढक्कन)। अपिपूर्वक धा (डुधाञ् धारण-पोषणयोः, जुहो० उ०) धातु से भाव या करण में ल्युट् प्रत्यय करने पर युवोर- नाकौ (७८५) सूत्र से युङ्को अन आदेश हो कर विभक्ति लाने से 'अपिधानम्' प्रयोग निष्पन्न होता है। भागुरि आचार्य के मत में 'अपि' के अकार का लोप हो कर— 'पिधानम्' बनेगा। हमें सब आचार्य मान्य हैं अतः लोक में 'अपिधानम्, पिधानम्' दोनों प्रयोग चलते हैं। इसी प्रकार अन्य प्रत्ययों में भी शिष्टप्रयोगानुसार जान लेना चाहिये। 'अपि' के अकारलोप के साहित्यगत कुछ उदाहरण यथा—गुरोर्यन्त्र परीवादो निन्दा वापि प्रवर्त्तते। कर्णौ तत्र पिधातव्यौ गन्तव्यं वा ततोऽन्यतः (मनु० २.२००)। भुजङ्गपिहितद्वारं पातालमधितिष्ठति (रघु० १.८०)। अधित काऽपि मुखे सलिलं सखी प्यधित कापि सरोजदलैः स्तनौ (नैषध० ४.१११)। लोपाभाव पक्ष में भी प्रयोग


१. यहां यह ध्यातव्य है कि 'अपि' के साहचर्य के कारण 'अव' के भी आद्य अकार का ही लोप होता है अन्त्य का नहीं।

५८२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् उपलब्ध होते हैं—अपिधाय बिलद्वारं गिरिशृङ्गेण तत्तदा (रामायण० ४।१०।५) । ध्वनति मधुपसमूहे श्रवणमपिदधाति (गीत० ५।३) । इसी प्रकार—नह् (णह बन्धने, दिवा० उ०) धातु के साथ प्रायः 'अपि' के अकार का लोप देखा जाता है—मन्दारमाला हरिणा पिनद्धा (शाकुन्तल० ७।२) । कुसुममिव पिनद्धं पाण्डुपत्रोदरेण (शाकुन्तल० १।१६)। कवचं पिनह्य (भट्टि० ३।४७)। पिनह्य तानि पुष्पाणि केशेषु वरवर्णिनि (महाभारत० १३।४२।६)। लोपाभाव में भी— अभिजानामि पुष्पाणि तानीमानीह लक्ष्मण । अपिनद्धानि वैदेह्या मया दत्तानि कानने (रामायण० ३।६४।२७) । यहां यह विशेष ज्ञातव्य है कि भागुरि का यह मत हम यहां विस्तृत रूप से नहीं लेना चाहिये । अतः यह विकल्प हमारी इच्छा पर निर्भर नहीं है बल्कि कुछ शिष्टप्रयोगों तक ही सीमित है । पाणिनीयमत में भागुरिसम्मत प्रयोगों को पृषोदरा- दित्वेन सिद्ध किया जा सकता है । किञ्च—हलन्त शब्दों से स्त्रीलिङ्गबोधक आप् (टाप्) हो' यह भी भागुरि आचार्य चाहते हैं। पाणिनि के मत में हलन्त शब्दों से टाप् का विधान करने वाला कोई सूत्र नहीं अतः विकल्प सिद्ध हो जायेगा । उदाहरण यथा — १ वाच् (वाणी) भागुरिमते—वाच् + आ (आप्) = वाचा ।¹ २ निश् (रात्रि) भागुरिमते—निश् + आ (आप्) = निशा ।² ३ दिश् (दिशा) भागुरिमते—दिश् + आ (आप्) = दिशा ।³ इसी प्रकार— ४ क्षुध् (भूख) भागुरिमते—क्षुध् + आ (आप्) = क्षुधा ।⁴ ५ गिर् (वाणी) भागुरिमते—गिर् + आ (आप्) = गिरा ।⁵ ६ तृप् (प्यास, लोभ) भागुरिमते—तृप् + आ (आप्) = तृपा ।⁶ ७ रुज् (पीडा) भागुरिमते—रुज् + आ (आप्) = रुजा ।⁷ ८ मुद् (प्रसन्नता) भागुरिमते—मुद् + आ (आप्) = मुदा ।⁸ १ ब्राह्मणी वचनं वाचा जल्पितं गदितं गिरा—इति शब्दार्णव । तच्छ्रुत्वा ब्राह्मणेन तिसृभिर्वाचाभि स्वजीविताधं दत्तम् (पञ्च० ४) । २ या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी (गीता० २।६६) । निशाकर, निशा- चर आदि शब्द इसी से बनते हैं । दिवा-विभा-निशा० (३,२।२१) । ३ दिशांगजस्तु तच्छ्रुत्वा प्रत्याहाशुमतो वचः (रामायण० १।४१।६) । ४. स्त्रीरत्नं विविधान् भोगान् वस्त्राण्याभरणानि च । न चेच्छति नरः किञ्चित् क्षुधया क्षुत्पीडितः (वह्निपुराण, प्रेतोपाख्यान) । ५. तां गिरां कर्णां श्रुत्वा (दशरथविलापनाटकम्, शब्दकल्पद्रुम में उद्धृत) । ६. लोभेन बुद्धिश्चलति लोभो जनयते तृषाम् (हितोप० १।१४२) । ७ निपातात्तस्य शस्त्राणां शरीरे ऽाऽभवद् रुजा (महाभारत० ८।३०।१४६) । ८. तत्पार्श्ववर्त्तिनी कन्या शुश्रावाथ मुदावती (मार्कण्डेयपु० ११६.३०) ।

अव्यय-प्रकरणम् ५८३ ९. प्रतिपद् (पड़वा तिथि) भागुरिमते—प्रतिपद् + आ (आप्) = प्रतिपदा ।¹ १०. वीरुध् (विस्तृत बेल) भागुरिमते—वीरुध् + आ (आप्) = वीरुधा ।² इत्थम्—दृग्—दृशा (नेत्र); शुच्—शुचा (शोक); रुप्—रुपा (क्रोध ; विपद्—विपदा (विपत्ति); आपद्—आपदा; रुच्—रुचा (कान्ति); मृद्—मृदा (मिट्टी); त्वच्—त्वचा (चमड़ी); त्विष्—त्विषा (कान्ति); ऋच्—ऋचा (ऋङ्मन्त्र) आदि समझने चाहिये । परन्तु शेखरकार श्रीनागेश इस आप् वाले पक्ष को अप्रामाणिक मानते हैं । विशेष जिज्ञासु उन का मत वही देखें । [लघु०] इत्यव्ययप्रकरणं समाप्तम् ॥ इति सुबन्तम् ॥ इति पूर्वार्धम् ॥ अर्थः—यहां अव्ययप्रकरण और इस के साथ सुबन्तप्रकरण समाप्त होता है । किञ्च ग्रन्थ का पूर्वार्ध भी यहां समाप्त समझना चाहिये । अभ्यास (४६) (१) 'मिथ्यो' का स्वरादिगण में पाठ उपयुक्त है या नहीं, विवेचन करें । (२) तद्धितश्चासर्वविभक्तिः सूत्रगत 'असर्वविभक्तिः' को स्पष्ट करते हुए यह बताएं कि इस सूत्र के रहते परिगणन की क्या ज़रूरत है ? (३) उपसर्गप्रतिरूपक तथा विभक्तिप्रतिरूपकों का सोदाहरण विवेचन करें । (४) निम्नस्थ अव्ययों को सार्थ सोदाहरण स्पष्ट करें तथा इन की अव्यय- संज्ञा करने वाला सूत्र भी अर्थसहित लिखें— अथ, पठितुम्, परस्तात्, स्थाने, अलम्, नाना, त्रिसृपः, यर्हि, पुरा, अस्ति, ऐषमः, अन्तरा, चिरम्, सार्धम्, कच्चित्, परुत्, जीवसे, खलु, प्रसह्य, यथाशक्ति, किल, सनुतर् । (५) 'परिगणनं कर्तव्यम्' कह कर किन २ प्रत्ययों का परिगणन किया है ? (६) स्वर्, अन्तर्, प्रातर् यदि सकारान्त हों तो क्या अनिष्ट होगा ? (७) भागुरि के मत में निम्नस्थों का क्या रूप होगा सोदाहरण लिखें— क्षुध्, वाच्, अपिधानम्, प्रतिपद्, मुद्, अवगाहः, निश् । (८) मान्त कृत्प्रत्यय कौन २ से हैं ? तदन्तों की अव्ययसंज्ञा कैसे होती है ? (९) अव्ययसंज्ञा की अन्वर्थता सिद्ध कर अव्यय का सार्थ लक्षण लिखें । (१०) 'यत्र' का पाठ चादियों में क्यों किया गया है ? १. देवानामय यक्षाणां गन्धर्वाणां च सत्तम । आदौ प्रतिपदा येन त्वमुत्पन्नोऽसि पावक (वराहपुराण, महातपोपाख्यान, अग्न्युत्पत्तिनामाध्याय) । २. श्रेष्ठमसि भेषजानां वसिष्ठं वीरुधानाम् (अथर्व० ६.२१.२) ।

५८४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् (११) निम्नस्थ प्रश्नो का संक्षिप्त उत्तर दें— (क) चादयोऽसत्त्वे में 'असत्त्वे' क्यो कहा गया है ? (ख) 'दण्' और 'च' मे तथा 'नञ्' और 'न' मे अन्तर बताएं । (ग) तिरःकृत्वा और तिरस्कृत्य मे प्रक्रिया-भेद स्पष्ट करें । ———.०.——— शून्य-वेद-नभो-नेत्रे वैक्रमे शुभवत्सरे । आश्विनस्य सिते पक्षे परिवृत्तिंस्वरूपधृक् ॥१॥ सर्वत्र शोधितो यत्नाद् बहुत्र परिवर्धितः । समापन्ननवाऽऽकारः पुम्गद्यः प्रकाशितः ॥२॥ पूर्वमुद्रितभागेऽस्मिन् संशुद्धिपरिवर्धने । विदुषा लेखकेनैव कृते नाऽन्येन केनचित् ॥३॥ श्रमस्यास्य महत्मूल्यं ज्ञास्यन्ति वीतमत्सराः । रत्नस्यार्घे प्रमाणं हि ज्ञातारो न पृथग्जनाः ॥४॥ विद्वत्सु छात्रवर्गेषु गवेषणपरेषु च । आदरं प्राप्नुयान्नूनं मत्कृतिः पूर्वतोऽधिकम् ॥५॥ द्वितीयावृत्ति { आश्विन २०४०, वैक्रमाब्द } { अक्तूबर सन् १६८३ } इति भूतपूर्वाखण्ड-भारतान्तर्गत-सिन्धुतटवर्त्ति-डेराइस्माईलखाना- दयानगरवास्तव्य-भाटियावंशावतंस-स्वर्गत-श्रीमद्रामचन्द्र- वर्मसूनुना एम्० ए० साहित्यरत्नेत्याद्यनेकोपाधि- भृता वैद्येन भीमसेनशास्त्रिणा विरचितायां लघुसिद्धान्तकौमुद्या भैमीव्याख्याया- मव्ययप्रकरणं पूत्तिंमगात् । [समाप्तञ्चात्र पूर्वार्धम् ॥] [ शुभम्भूयादध्यायकानामध्यापकानाञ्च ॥]

परिशिष्टानि ५८५ (१) परिशिष्ट—विशेष-स्मरणीय-पद्यतालिका [भैमीव्याख्या-प्रथमभागस्थ दर्जनों पद्यों में से व्याकरणसम्बन्धी कुछ विशेष स्मरणीय पद्य यहां प्रस्तुत किये गये हैं ।] (१) प्रत्ययाः शिवसूत्राणि आदेशा आगमास्तथा । धातुपाठो गणे पाठ उपदेशाः प्रकीर्तिताः ॥ (पृष्ठ ८) (२) परेणैवेण्ग्रहाः सर्वे पूर्वेणैवाऽण्ग्रहा मताः । ऋतेऽणुदित्सवर्णस्येत्येतदेकं परेण तु ॥ (पृष्ठ २६) (३) संहितैकपदे नित्या नित्या धातूपसर्गयोः । नित्या समासे वाक्ये तु सा विवक्षामपेक्षते ॥ (पृष्ठ ३५) (४) द्वौ नञौ तु समाख्यातौ पर्युदास-प्रसज्यकौ । पर्युदासः सदृग्ग्राही प्रसज्यस्तु निषेधकृत् ॥ (पृष्ठ ३८) (५) तुम्बिकातृणकाष्ठञ्च तैलं जलमुपागतम् । स्वभावादूर्ध्वमायाति रेफस्यैतादृशी गतिः ॥ (पृष्ठ ५४) (६) अक्षौहिण्याः प्रमाणं तु खाऽङ्ग्राष्टैकद्विकैर्गजैः । रथैरेतैर्हयैस्त्रिघ्नैः पञ्चघ्नैश्च पदातिभिः ॥ (पृष्ठ ६१) (७) ईषदर्थे क्रियायोगे मर्यादाऽभिविधौ च यः । एतमातं ङितं विद्याद् वाक्यस्मरणयोरङित् ॥ (पृष्ठ ६०) (८) वच्छौ वच्छा जच्छा वक्षाविति चतुष्टयम् । रूपाणामिह तुक्-छत्व-चलोपानां विकल्पनात् ॥ (पृष्ठ १३१) (९) सैष दाशरथी रामः सैष राजा युधिष्ठिरः । सैष कर्णो महात्यागी सैष भीमो महाबलः ॥ (पृष्ठ १५६) (१०) विद्वान्कीदृग्वचो ब्रूते को रोगी कश्च नास्तिकः । कस्याश्चन्द्रं न पश्यन्ति सूत्रं तत्पाणिनेर्वद ॥ (पृष्ठ १६०) (११) जकारश्च शकारश्च टकारश्च ङपावपि । सुङस्योरुदितौ चैव सुपि सप्त स्मृता इतः ॥ (पृष्ठ १६१) (१२) सकारो जश्शसोरोसि ङसि भ्यसि न चेद्द्विसि । मकारश्च तथा ज्ञेय आमि भ्यामि स्थितस्त्वमि ॥ (पृष्ठ १६२) (१३) संयोगान्तस्य लोपे हि नलोपादिर्न सिध्यति । रात्तु तेनैव लोपः स्याद् हलस्तस्माद्विधीयते ॥ (पृष्ठ २३०) (१४) लक्ष्म्या वै जायते भ्रातुः सरस्वत्यापि जायते । अत्र षष्ठीपदं गुप्तं यो जानाति स पण्डितः ॥ (पृष्ठ २८१) (१५) एकोना विंशतिः स्त्रीणां स्नानार्थं सरयूं गता । विंशतिः पुनरायाता एको व्याघ्रेण भक्षितः ॥ (पृष्ठ २८१)

५८६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् (१६) अवी-तन्त्री-स्तरी-लक्ष्मी-तरी-धी-ह्री-श्रिया भियः। अङ्यन्तत्वात् स्त्रियामेषां न सुलोपः कदाचन॥(पृष्ठ ३०६) (१७) पाणिनेर्न नदी गङ्गा यमुना च स्थली नदी। प्रभु स्वातन्त्र्यमापन्नो यदिच्छति करोति तत्॥(पृष्ठ ३०६) (१८) पीलुवृक्षः फलं पीलु पीलुने न तु पीलवे। वृक्षे निमित्तं पीलुत्वं तज्जत्वं तत्फले पुनः॥(पृष्ठ ३४३) (१९) इदमस्तु सन्निकृष्टे समीपतरवर्त्ति चैतदो रूपम्। अदसस्तु विप्रकृष्टे तदिति परोक्षे विजानीयात्॥(पृष्ठ ३७०) (२०) काचं मणि काञ्चनमेकसूत्रे ग्रथ्नासि बाले किमिदं विचित्रम्। विचारवान् पाणिनिरेकसूत्रे श्वानं युवानं मघवानमाह॥ (पृष्ठ ३६३) (२१) पञ्चम्याश्च चतुर्थ्याश्च षष्ठीप्रथमयोरपि। यान्यद्विवचनान्यत्र शेषे-लोपो विधीयते॥ (पृष्ठ ४२२) (२२) जक्षि-जागृ-दरिद्रा-शास्-दीधीङ्-वेवीङ्-चकास्तयः। अभ्यस्तसंज्ञा विज्ञेया धातवो मुनिभाषिताः॥ (पृष्ठ ४५५) (२३) सम्बोधने तूशनसस्त्रिरूपं सान्तं तथा नान्तमथाप्यदन्तम्। माध्यन्दिनिर्वेष्टि गुणं ङिगन्ते नपुंसके व्याघ्रपदां वरिष्ठः॥ (पृष्ठ ४७१) (२४) जायन्ते नव सौ, तथाऽमि च नव, भ्याम्भिस्भ्यसां सङ्गमे, षट् संख्यानि, नवैव सुप्प्यथ जसि त्रीण्येव तद्वच्छसि। चत्वार्यन्यवचःसु कस्य विबुधाः! शब्दस्य रूपाणि तज् जानन्तु प्रतिभास्ति चेन्निगदितुं षाण्मासिकोऽत्रावधिः॥(पृष्ठ ५०४) (२५) गवाक्षशब्दस्य रूपाणि क्लीबेऽर्चागति-भेदतः। असङ्ख्यवड्पूर्वरूपंनवाधिकशतं मतम्॥ (पृष्ठ ५०४) (२६) रामं सीतां लक्ष्मणं जीविकार्थे विक्रीणीते यो नरस्तं च धिग्धिक। अस्मिन्पद्ये योऽपशब्दं न वेत्ति व्यर्थप्रज्ञं पण्डितं तञ्च धिग्धिक॥ (पृष्ठ ५३०) (२७) अवदत्तं विदत्तं च प्रदत्तञ्चादिकर्मणि। सुदत्तमनुदत्तञ्च निदत्तमिति चेष्यते॥ (पृष्ठ ५४६) (२८) सदृशं त्रिषु लिङ्गेषु सर्वासु च विभक्तिषु। वचनेषु च सर्वेषु यन्न व्येति तदव्ययम्॥ (पृष्ठ ५८०) (२९) वष्टि भागुरिरल्लोपमवाप्योरुपसर्गयोः। आपं चैव हलन्तानां यथा वाचा निशा दिशा॥ (पृष्ठ ५८०)

परिशिष्टानि ५८७ (२) परिशिष्ट—ग्रन्थ-संकेत-तालिका [इस व्याख्या में प्रायः ग्रन्थों का पूरा नाम दिया गया है। क्वचित् जो ग्रन्थ- संकेत दिये गये हैं उन की तालिका यहां प्रस्तुत की जा रही है।] अथर्व० = अथर्ववेद महावीर० = महावीरचरित अमरु० = अमरुशतक मालती० = मालतीमाधव आप० ध० = आपस्तम्बधर्मसूत्र मालविका० = मालविकाग्निमित्र ऋ० = ऋग्वेद मार्कण्डेयपु० = मार्कण्डेयपुराण ऋतु० = ऋतुसंहार मुण्डकोप० = मुण्डकोपनिषत् उत्तरराम० = उत्तररामचरित मुद्रा० = मुद्राराक्षस ऐ० ब्रा० = ऐतरेयब्राह्मण मृच्छ० = मृच्छकटिक कठोप० = कठोपनिषत् मेघ० = मेघदूत कथासरित्० = कथासरित्सागर मैत्रा० सं० = मैत्रायणीसंहिता काव्यप्र० = काव्यप्रकाश मोहमुद्गर० = मोहमुद्गरस्तोत्र किरात० = किरातार्जुनीय यजु० = यजुर्वेद कुमार० = कुमारसम्भव याज्ञ० = याज्ञवल्क्यस्मृति कुवलया० = कुवलयानन्द रघु० = रघुवंश कौषी० ब्रा० = कौषीतकिब्राह्मण रामचरित० = रामचरित (युवराजकवि) गणरत्न० = गणरत्नमहोदधि लौकिक० = भुवनेशलोकिकन्यायसाहस्री गीत० = गीतगोविन्द वामनवृत्ति० = काव्यालंकारसूत्रवृत्ति गीता० = श्रीमद्भगवद्गीता विक्रमो० = विक्रमोर्वशीय चर्पट० = चर्पटपञ्जरिका वेणी० = वेणीसंहार चाणक्य० = चाणक्यनीतिकथा (लुडविक) वैराग्य० = वैराग्यशतक (भर्तृहरि) चौरपञ्चा० = चौरपञ्चाशिका व्या० च० = व्याकरणचन्द्रोदय तै० उ० = तैत्तिरीयोपनिषत् व्या० सि० सु० = व्याकरणसिद्धान्तसुधानिधि दशकु० = दशकुमारचरित शत० ब्रा० = शतपथब्राह्मण देवीक्षमा० = देवीक्षमापनस्तोत्र शिवराज० = शिवराजविजय द्व्या० = द्व्याश्रयकाव्य शृङ्गार० = शृङ्गारशतक (भर्तृहरि) नागानन्द० = नागानन्दनाटक श्वेता० = श्वेताश्वतरोपनिषत् नीति० = नीतिशतक (भर्तृहरि) समयोचित० = समयोचितपद्यमालिका न्यायद० वा०भा० = न्यायदर्शनवात्स्यायन० सांख्यका० = सांख्यकारिका पञ्च० = पञ्चतन्त्र साहित्य० = साहित्यदर्पण बृ० उ० = बृहदारण्यकोपनिषत् सि० कौ० = वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी भट्टि० = भट्टिकाव्य सुभाषित० = सुभाषितरत्नभाण्डागार भामिनी० = भामिनीविलास सुभाषितसुधा० = सुभाषितसुधानिधि मनु० = मनुस्मृति स्वप्न० = स्वप्नवासवदत्त (भास) हितोप० = हितोपदेश

५८८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् (३) परिशिष्ट—अव्यय-तालिका [इस ग्रन्थ में व्याख्यात अव्ययों की वर्णानुक्रमणिका यहां दी गई है।] १ अ (५४८) ३४ अनेकश (५७४) ६७ अवरत (५७१) २ अकस्मात् (५५६) ३५ अन्त (५१५) ६८ अव (५२०, ५७३) ३ अकाण्डे (५५३) ३६ अन्तरा (५२३) ६९ अवश्यम् (५३४) ४ अग्निमात् (५७४) ३७ अन्तरेण (५२४) ७० अव्यथिष्यै (५७८) ५ अग्नी (५७४) ३८ अन्यत (५६७) ७१ अष्टधा (५७३) ६ अघो (५५१) ३९ अन्यत् (५२६) ७२ असकृत् (५७५) ७ अङ्ग (५४६) ४० अन्यत्र (५६८) ७३ असाम्प्रतम् ५३४) ८ अजस्रम् (५३३) ४१ अन्यथा (५७०) ७४ अस्ति (५२६) ९ अञ्जसा (५३२) ४२ अन्यदा (५६६) ७५ अस्तु (५५६) १० अत (५६६, ५६७) ४३ अन्यद्यु (५७०) ७६ अस्मि (५४७) ११ अति (५६५) ४४ अन्वक् (५६१) ७७ अह (५३७) १२ अतीव (५५४) ४५ अप (५६५) ७८ अहम् (५४६) १३ अत्र (५६८) ४६ अपरेद्यु (५७०) ७९ अहह (५५१) १४ अथ (५३०, ५४४) ४७ अपप्लुपम् (५७७) ८० अहो (५५१) १५ अथकिम् (५६१) ४८ अपि (५६४) ८१. अह्नाय (५६०) १६ अथवा (५६१) ४९ अपिवा (५६१) ८२ आ (५४८) १७ अथो (५४४) ५० अभि (५६४) ८३ आ(ङ्) (५६३) १८ अद्धा (५२२) ५१ अभित (५६७) ८४ आत् (५५०) १९ अद्य (५७०) ५२ अभीक्ष्णम् (५२६) ८५ आत्तृद (५७६) २० अद्यापि (५५५) ५३. अमा (५५४) ८६ आदह (५४५) २१ अधरात् (५७२) ५४ अमुत्र (५६८) ८७ आदित (५७४) २२ अधरेद्यु (५७०) ५५ अम् (५३०, ५७५) ८८ आम् ५३१, ५७५) २३ अधरेण (५७२) ५६ अयि (५५०) ८९ आरात् (५१८) २४ अध ५२०, ५७३) ५७ अय (५४६) ९० आर्यंहलम् (५२६) २५ अधस्तात् (५७१) ५८ अरम् (५६२) ९१. आवि (५३३) २६ अधि (५६३) ५९ अरे (५५१) ९२ आ (५६०) २७ अधिहरि (५७६) ६० अरेरे (५५१) ९३ आहुवद्यै (५७८) २८ अधुना (५६६) ६१ अर्जुनत (५७४) ९४ आहो (५५४) २९ अधोऽध (५२०) ६२ अलम् (५२६) ९५ आहोस्वित् (५५४) ३० अध्ययनत (५७४) ६३ अल्पश (५७४) ९६ इ (५४८) ३१ अनिशम् (५३३) ६४. अवगाहे (५७८) ९७ इतरेद्यु (५७०) ३२ अनु (५६३) ६५ अवचक्षे (५७८) ९८ इत (५६७) ३३ अनेकधा (५७३) ६६ अवदत्तम् (५४५) ९९ इति (५५७)

परिशिष्टानि ५६६ १००. इत् (५५२) १३५. ऌ (५४८) १७०. कस्मात् (५६१) १०१. इत्थम् (५७०) १३६. ऋते (५१७) १७१. कामम् (५३२) १०२. इदानीम् (५६६) १३७. ऋधक् (५१७) १७२. कार्षापणशः ५७४ १०३. इद्धा (५२१) १३८. ऋषिवत् (५७६) १७३. किञ्च (५६०) १०४. इवं (५५७) १३९. ए (५४८) १७४. किन्तमाम् ५७५) १०५ इह (५६८) १४०. एकत्र (५६८) १७५. किन्तराम् ५७५) १०६. ई (५४८) १४१. एकदा (५६६) १७६. किमङ्ग (५४६) १०७. ईषत् (५१६) १४२. एकधा (५७३) १७७. किमपि (५५३) १०८. उ (५४८) १४३. एकपदे (५५०) १७८. किमिति (५५३) १०९. उच्चैः (५१७) १४४. एकशः (५७४) १७९. किमिव (५५३) ११०. उत (५५२) १४५. एतर्हि (५६६) १८०. किमु (५५३) १११. उताहो (५५४) १४६ एव (५३३) १८१. किमुत (५५३) ११२. उत्तरतः (५७१) १४७. एवम् (५३३) १८२. किम् (५५३) ११३. उत्तरत्र (५६८) १४८ एधे (५७३) १८३. किम्पुनः (५१६) ११४. उत्तरात् (५७२) १४९ ऐ (५४८) १८४ किल (५४४) ११५. उत्तराहि (५७२) १५० ऐकव्यम् (५७३) १८५. कु (५३४) ११६. उत्तरेण (५७२) १५१. ऐषमः (५७०) १८६. कुतः (५६७) ११७. उत्तरेद्युः (५७०) १५२. ओ (५४८) १८७. कुत्र (५६८) ११८. उदकसात् ५७४) १५३. ओम् (५३३) १८८. कुवित् (५३६) ११९. उदकी (५७४) १५४. औ (५४८) १८९ कुह (५६८) १२०. उदेतोः (५७६) १५५. कच्चित् (५४०) १९०. कूपत् (५३६) १२१. उन्मनी (५७४) १५६. कथञ्चन (५७१) १९१. कृतम् (५३३) १२२ उप (५६५) १५७ कथञ्चित् ५७१) १९२. कृत्वा (५७६) १२३. उपजोषम् ५६२) १५८. कथमपि (५७०) १९३. क्व (५६८) १२४. उपधा (५२३) १५९. कथम् (५७०) १९४. क्वचित् (५६६) १२५. उपरि (५७१) १६०. कथंकथमपि ५७१ १९५. क्वापि (५६६) १२६. उपरिष्टात् ५७२ १६१. कया (५७१) १९६. क्षत्रियवत् ५२२) १२७. उपर्युपरि (५७२) १६२ कदा (५६६) १९७. क्ष्मा (५२७) १२८. उपांशु (५२७) १६३. कदाचन (५६६) १९८. खलु (५४३) १२९. उभयतः (५६७) १६४. कदाचित् (५६६) १९९. गत्वा (५७६) १३०. उभयत्र (५६८) १६५. कदापि (५६६) २००. गुरुवत् (५७६) १३१. उभयथा (५७०) १६६. कम् (५२४) २०१. च (५३६) १३२. उभयद्युः (५७०) १६७. कर्तवे (५७८) २०२. चतुर्धा (५७३) १३३. उभयेद्युः (५७०) १६८. कर्हि (५६६) २०३. चतुः (५७५) १३४. उपा (५३३) १६९. कर्हिचित् ५६६) २०४. च(ण्) (५३६)

५६० भैमीव्याख्योपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् २०५ चन (५५३)    २४० ते (५५६)    २७५ न(ञ्) (५२१) २०६ चारित्रत ५७४)    २४१ तेन (५५६)    २७६ ननु (५५६) २०७ चित (५५३)    २४२ त्वै (५४२)    २७७ नम (५२६) २०८ चिरम् (५१६)    २४३ त्रिधा (५७३)    २७८ नवधा (५७३) २०९ चिररात्राय ५३५    २४४ त्रिश (५७४)    २७६ नह (५४०) २१० चिरस्य (५३५)    २४५ त्रि (५७५)    २८० नहि (५५२) २११ चिरात् (५३५)    २४६ त्रेधा (५७३)    २८१ नाना (५२५) २१२ चिराय (५३४)    २४७ त्रैधम् (५७३)    २८२ नाम (५५७) २१३ चिरे (५३५)    २४८ दक्षिणत (५७१)    २८३ नामत (५७४) २१४ चिरेण (५३४)    २४६ दक्षिणा (५७२)    २८४ नास्ति (५५६) २१५ चैत (५३६)    २५० दक्षिणात् (५७२)    २८५ निकषा (५२०) २१६ चोरद्वारम ५७७    २५१ दक्षिणाद्दि ५७२)    २८६ नीचे (५१७) २१७ चोरत (५७४)    २५२ दक्षिणेन (५७२)    २८७ नु (५५८) २१८ जातु (५५२)    २५३ दमदमा (५७५)    २८८ नूनम् (५३७) २१९ जीवम (५७७)    २५४ दातवै (५७८)    २८६ नेत् (५३६) २२० जोपम (५१६)    २५५ दिवा (५१८)    २६० नैकधा (५७३) २२१ ज्ञानन (५७४)    २५६ दिष्ट्या (५५८)    २६१ नो (५५२) २२२ ज्योक् (५२४)    २५७ दुष्ठु (५३४)    २६२ नोचेत् (५५२) २२३ झगिति (५३२)    २५८ दृशे (५७८)    २६३ न्वै (५४२) २२४ तत (५६७)    २५६ दोषा (५२७)    २६४ पचतितमाम् ५७५ २२५ तत्र (५६८)    २६० द्य (५५०)    २६५ पचतितराम् ५७५ २२६ तया (५७०)    २६१ द्राक् (५३२)    २६६ पञ्चकृत्व ५७५ २२७ तयाहि (५४३)    २६२ द्विधा (५७३)    २६७ पञ्चधा (५७३) २२८ तदपि (५६०)    २६३ द्विश (५७४)    २६८ पटपटा (५७५) २२६ तदा (५६६)    २६४ द्वि (५७५)    २६६ पठितुम् (५७७) २३० तद (५५८)    २६५ द्वेधा (५७३)    ३०० पठित्वा (५७६) २३१ तद्वत (५७६)    २६६ द्वै (५४२)    ३०१ परत (५७१) २३२ तरमा (५३०)    २६७ द्वैधम् (५७३)    ३०२ परश्व (५६२) २३३ तर्हि (५६६)    २६८ धिक् (५३०)    ३०३ परस्तात् (५७१) २३४ तस्मात् (५६०)    २६६ धिग्धिक (५३०)    ३०४ परारि (५७०) २३५ तावत् (५४२)    २७० ध्यायध्याय ५७७    ३०५ परि (५६५) २३६ तिर (५२३)    २७१ न (५२१)    ३०६ परित (५६७) २३७ तु (५५५)    २७२ नकि (५४१)    ३०७ परुत् (५७०) २३८ तुम (५४३)    २७३ नकीम् (५४१)    ३०८ परेद्यवि (५७०) २३६ तूष्णीम् (५१६)    २७४ नक्तम् (५२१)    ३०६ पनु (५४८)

परिशिष्टानि ५६१ ३१०. पश्च (५७२) ३४६. प्रशांन् (५३१) ३८२. माकीम् (५४१) ३११. पश्चा (५७२) ३४७. प्रसह्य (५५६) ३८३. माङ्५३१,५४१) ३१२. पश्चात् (५७२) ३४८. प्राक् (५७१) ३८४. मादयध्यै (५७८) ३१३. पाट् (५४६) ३४६. प्रातः (५१६) ३८५. मा स्म (५३२) ३१४. पादशः (५७४) ३५०. प्रादुः (५३३) ३८६. मित्रवत् (५७६) ३१५. पिवध्यै (५७८) ३५१. प्रायः (५२८) ३८७. मिथः (५२८) ३१६. पीलूमूलतः ५७५) ३५२. प्रायशः (५६१) ३८८. मिथुः (५३४) ३१७. पुत् (५५०) ३५३. प्रायेण (५६१) ३८६. मिथु (५३४) ३१८. पुनरपि (५१६) ३५४. प्रेत्य (५६१) ३६०. मियो (५२८) ३१९. पुनः (५१६) ३५५. प्रेपे (५७८) ३६१. मिथ्या (५२७) ३२०. पुनःपुनः (५१६) ३५६. बत (५५५) ३६२. मुधा (५२७) ३२१. पुरतः (५६१) ३५७ बदि (५३३) ३६३. मुहुर्मुहुः (५२६) ३२२. पुरः (५७२) ३५८. बलवत् (५६०) ३६४. मुहुः (५२६) ३२३. पुरस्तात् (५७१) ३५६. बहिः (५२०) ३६५. मृषा (५२७) ३२४. पुरा (५२८) ३६०. बहुकृत्वः (५७५) ३६६. मे (५५६) ३२५. पूर्वत्र (५६८) ३६१. बहुत्र (५६८) ३६७. म्लेच्छितवै ५७८) ३२६. पूर्वेद्युः (५७०) ३६२ बहुधा (५७५) ३६८. यज्ञदत्तवत् ५७६) ३२७. पृथक् (५१८) ३६३. बहुशः (५७३) ३६६. यतः (५६७) ३२८. पृथक्पृथक् ५१८) ३६४. ब्राह्मणत्रा (५७५) ४००. यत्र ५४०, ५६८) ३२६. पृणध्यै (५७८) ३६५. ब्राह्मणवत् ५२२) ४०१. यथा (५७०) ३३०. प्याट् (५४६) ३६६. भगोः (५५१) ४०२ यथाकथाच ५४६ ३३१. प्रकामम् (५३३) ३६७. भवतु (५६०) ४०३. यथावत् (५७६) ३३२. प्रगे (५६२) ३६८. भवितुम् (५७७) ४०४. यथाशक्ति (५७६) ३३३. प्रचरितोः ५७६) ३६६. भूत्वा (५७६) ४०५. यदपि (५५६) ३३४. प्रतरम् (५७५) ३७०. भूयः ५३२,५३८) ४०६. यदा (५६६) ३३५. प्रतान् (५३१) ३७१. भूयोभूयः (५३८) ४०७. यदि (५६०) ३३६. प्रताम् (५३१) ३७२. भूरिशः (५७४) ४०८. यदिवा (५६१) ३३७. प्रशाम् (५३१) ३७३. भो (५४६) ४०६. यद् (५५८) ३३८. प्रति (५६४) ३७४. भोः (५४६) ४१०. यद्वत् (५७६) ३३६. प्रत्यक् (५७१) ३७५. मङ्क्षु (५३२) ४११. यद्यपि (५६१) ३४०. प्रत्युत (५५३) ३७६. मथुरा्रवत् ५७६) ४१२. यद्वा (५६१) ३४१. प्रभृति (५५५) ३७७. मध्यतः (५७४) ४१३. यदिह (५६६) ३४२. प्रवदितोः(५७६) ३७८. मनाक् (५१६) ४१४. यस्मात् (५६०) ३४३. प्रवाहिका ५२६) ३७६. मम (५५६) ४१५. यावत् (५४१) ३४४. प्रवाहकम् ५२६) ३८०. मा (५३१) ४१६. युगपत् (५१८) ३४५. प्रयै (५७८) ३८१. माकिः (५४०) ४१७. युत् (५५०) ४१८. येन (५५६)

५६२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् ४१९ रह (५६२) ४५५ शुवम् (५४८) ४९१ साचि (५३३) ४२० राजवत् (५७६) ४५६ शुवनी (५७४) ४९२ सामि (५२२) ४२१ राजसात् (५७५) ४५७ शुदि (५३३) ४९३ साम्प्रतम् (५३४) ४२२ रात्रीं (५१८) ४५८ शुभम् (५४६) ४९४ सायम् (५१६) ४२३ रे (५५०) ४५९ धियसे (५७८) ४९५ साधम् (५२६) ४२४ रे रे (५५०) ४६० श्रौषट् (५२६) ४९६ सु (५३४) ४२५ रै (५८२) ४६१ श्व (५१८) ४९७ सुदामत (५७५) ४२६ रोहिष्यै (५७८) ४६२ षड्धा (५७३) ४९८ सुदि (५३३) ४२७ व (५६०) ४६३ षोढा (५७३) ४९९ सुष्ठु (५३४) ४२८ वक्षे (५७७) ४६४ सकृत् (५७५) ५०० सूतवे (५७८) ४२९ वत् (५२२, ५७५) ४६५ स्ना (५३२) ५०१ सूपत (५३६) ४३० वदि (५३२) ४६६ स्ता (५६६) ५०२ स्तोवश (५७४) ४३१ वरम् (५३३) ४६७ सद्य (५७०) ५०३ स्थाने (५३३) ४३२ वषट् (५२६) ४६८ सनत (५२३) ५०४ स्म (५४५) ४३३ वस्तुत (५६१) ४६९ सना (५२२) ५०५ स्मारंस्मारम् ५७६ ४३४ वा (५३६) ४७० सनात (५२३) ५०६ स्वाक् (५६२) ४३५ वाम (५५६) ४७१ समुन (५१६) ५०७ स्वधा (५२५) ४३६ वारंवारम् ५६१ ४७२ सपदि (५३२) ५०८ स्वयम् (५२०) ४३७ वागुदवत् ५७४ ४७३ सप्तकृत्व (५७५) ५०९ स्व (५१५) ४३८ विख्य (५७८) ४७४ सप्तधा (५७३) ५१० स्वस्ति (५२५) ४३९ विना (५२५) ४७५ समन्तत (५६०) ५११ स्वाहा (५४३) ४४० विभाजम् ५७७) ४७६ समन्त (५६०) ५१२ स्वित (५५४) ४४१ विपु (५५०) ४७७ समम (५३२) ५१३ ह (५३७) ४४२ विमृप (५७६) ४७८ समया (५२०) ५१४ हत (५४०) ४४३ विहायसा (५२७) ४७९ समुपलेपम् ५६२ ५१५ हहो (५५१) ४४४ वीयत (५७४) ४८० सम्प्रति (५३४) ५१६ हा (५५१) ४४५ वृत्तत (५७४) ४८१ सचन (५६७) ५१७ हि (५५६) ४४६ वृथा (५२१) ४८२ सद्यन (५६८) ५१८ हिमवत्त (५७५) ४४७ वै (५६०) ४८३ सवथ (५७०) ५१९ हिरुक् (५३०) ४४८ वौषट् (५२६) ४८४ संवदा (५६६) ५२० ही (५६०) ४४९ शकम् (५४८) ४८५ सह (५५२) ५२१ हे (५४६) ४५० शनश (५७४) ४८६ सहसा (५२५) ५२२ हेतौ (५२१) ४५१ शनै (५१७) ४८७ सहस्रश (५७४) ५२३ है (५४६) ४५२ शनैश्शनै ५१७) ४८८ सवत (५३२) ५२४ ह्य (५१८) ४५३ शम (५२५) ४८९ सामम् (५२६) ———————— ४५४ शश्वत (५३८) ४९० साक्षात् (५३३)

परिशिष्टानि (४) परिशिष्ट---पूर्वार्धगताष्टाध्यायीसूत्रतालिका [सूत्रों के आगे इस ग्रन्थ की पृष्ठ संख्या दी गई है ।]

[अ]
अ इ उ ण्(२)अपृक्त एकाल्०(२२८)आमि सर्व०(१६६)
अकः सवर्णे०(७३)अपो भि(४८८)आ सर्वनाम्नः(४५८)
अचि र ऋतः(३०३)अप्तृन्तृच्०(२६३)[इ]
अचि श्नुधातु०(२४६)अमि पूर्वः(१७५)इकोऽचि वि०(३३४)
अचोऽन्त्यादि०(६६)अम्बार्थ०(२४५)इको यणचि(३४)
अचो ञ्णिति(२३२)अम्संबुद्धौ(३६०)इकोऽसवर्णे०(६४)
अचो रहाभ्यां०(६५)अर्थवदधातु०(१५६)इश्यणः संप्र०(३५६)
अचः(४४१)अर्वणस्त्रसा०(३६६)इतोत्सर्वनाम०(३६७)
अच्य घेः(२२५)अलोऽन्त्यस्य(४३)इदम्रो मः(३७०)
अट्कुप्वाङ्०(१७७)अलोऽन्त्यात्०(२२८)इदुद्भ्याम्(३०१)
अणुदित्०(२६)अल्लोपोऽनः(३३८)इदोऽय् पुंसि(३७१)
अतो गुणे(३७१)अवङ् स्फोटा०(७६)इन्द्रे च(८१)
अतो भिस ऐस्(१८०)अव्ययादाप्सुपः(५७६)इन्हन्पूषा०(३८५)
अतोऽम्(३२१)अव्ययीभावश्च(५७६)[ई]
अतो रोरप्लु०(१४५)अष्टन आ विभ०(४०१)ईदूदेद् द्वि०(८३)
अत्रानुनासिकः०(१३३)अष्टाभ्य औश्(४०२)[उ]
अत्वसन्तस्य०(४५१)अस्थिदधि०(३३८)उगिदचां सर्व०(३६१)
अदर्शनं लोपः(८)अहन्(४६८)उच्चैरूदात्तः(१४)
अदस औ सु०(४७३)[आ]उद ईत्(४४३)
अदसो मात्(८४)आकडारादेका०(२१८)उदः स्था०(११०)
अदसोऽसेर्दादु०(४७४)आङि चापः०(२८७)उपदेशेऽजनु०(५२)
अदेङ् गुणः(४६)आङो नास्त्रियाम्(२२४)उपसर्गादृति०(६५)
अदड् डतरा०(३२८)आङ्माङोश्च(१४१)उपसर्गाः क्रिया०(६४)
अनङ् सौ(२२७)आच्छीनद्योर्नुम्(५०६)उभे अभ्यस्तम्(४५३)
अनचि च(३८)आटश्च(२४६)उरण्रपरः(५३)
अनाप्यकः(३७२)आनय्रा.(२४६)[ऊ]
अनिदितां हल०(४४०)आतो धातोः(२१६)ऊकालोऽझ्रस्व०(१३)
अनुनासिकात्०(१३४)आदिरन्त्येन०(६)[ऋ]
अनुस्वारस्य०(१२०)आदेशप्रत्यययोः(१८६)ऋऌक्(२)
अनेकाल्शित्०(७८)आदेः परस्य(११२)ऋत उत्(२६५)
अन्तरं वहिर्यो०(२०६)आद् गुणः(५१)ऋतो ङि०(२६२)
अन्तादिवच्च(७१)आद्यन्तवदेक०(३७४)ऋत्यकः(६६)
आद्यन्तौ०(१२७)ऋत्विग्दधृक्०(४०५)
ल० प्र०(३८)

९६४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् ऋदुशनस्० (२६३) ऋन्नेभ्यो० (३१५) [ए] एओङ् (२) एकवचनस्य च (४०६) एकवचनं सम्बु० (१७२) एकाचो बशो० ३५२) एक जु० (३८६) एङ् पदान्ता० (५४) एङि पररूपम् (८८) एड्ह्रस्वात्० (१७४) एच गद्यम्वा० (३४६) एचोऽयवायावः (४६) एत ईद् बहु० (४७४) एतत्तदोः सु० (१५३) एत्येधत्यूठ्सु (५६) एरनेकाचो० (२५०) [ऐ] ऐऔच् (२) [ओ] ओत् (६१) ओमाङोश्च (७०) ओर्गुणः (१८६) ओसि च (२७०) [औ] औङ आपः (२८६) औतोऽम्शसोः (२८२) औङ् (२३४) [क] कपय् (२) कानामाम्रेडिते (१३६) किमः कः (३६६) कुप्वोः ≍क≍पौ (१३७) कृत्तद्धित० (१६१) कृदतिङ् (६०७) कृन्मेजन्तः (५७६) क्त्वातोसुन्० (५७८) क्विनप्रत्ययस्य० (४०८) [ख] खफछठथचटतव् (२) खरवसानयोर्० (१३४) खरि च (११४) ख्यात्यात्परस्य (२१३) [ग] गतिश्च (२५५) गोतो णित् (२८१) [घ] घढधष् (२) घेर्डिति (२२४) [ङ] ङमो ह्रस्वाद० (१३१) ङसिंङसोश्च (२२५) ङसिंङ्योः स्मात् (१६५) ङिच्च (७६) ङिति ह्रस्वश्च (२६६) ङेप्रथमोराम् (४२०) ङेराम्नद्याम्० (२४७) ङेर्यः (१८०) ङ्णोः कुक्टुक्० (१२८) ह्नह्याप्रान्ति० (१६३) [च] चतुरनडुहो० (३५६) चादयोऽसत्त्वे (८८) चुटू (१७१) चोः कुः (४१०) च्वौ (४४२) [छ] छे च (१४०) [ज] जसित्यादयः० (४५४) जबगडदश् (२) जराया जरसन्य० (२१२) जशशसोः शि (३२३) जसि च (२२१) जस् शसी (१६४) [झ] झभञ् (२) झयो होऽन्य० (११६) झरो झरि० (११३) झलां जशोऽन्ते (१०५) झलां जश्झशि (४१) [ञ] ञमङणनम् (२) [ट] टाङसिङसाम्० (१७६) टेः (३२६) [ड] डति च (२३६) ङ सि धूँट् (१२६) [ढ] ढ्रलोपे पूर्वस्य० (१५१) [त] तदोः सः सावन० (४१७) तद्धितश्चा० (५६५) तपरस्तत्काल० (५०) तवममौ ङसि (४३०) तस्माच्छसो नः पु० (१७६) तस्मादित्यु० (१११) तस्मिन्निति० (३५) तस्य परमाम्रे० (१३८) तस्य लोपः (८) तिरस्तिर्यम्० (४४५) तुभ्यमह्यौ० (४२८) तुल्यास्य० (१६) तृज्वत्क्रोष्टुः (२६२) तृतीयादिषु भा० (३४०)

परिशिष्टानि : तेमयावेक० (४३५) तोर्लि (१०६) तोः षि (१०४) त्यदादिषु० (४५७) त्यदादीनामः (२४१) त्रिचतुरोः० (३०३) त्रेस्त्रयः (२४०) त्वमावेकवचने (४२४) त्वामौ द्विती० (४३५) त्वाहौ मौ (४२०) [ थ ] थो न्थः (३६८) [ द ] दश्च (३७२) दादेर्धातोर्घः (३५१) दिव उत् (३६४) दिव औत् (३६३) दीर्घाज्जसि च (२१५) दूराद्धूते च (८१) द्वितीयाटौस्० (३७६) द्वितीयायां च (४२५) द्व्येकयोर्द्वि० (१६६) [ ध ] धात्वादेः षः सः (३५५) [ न ] न ङिसम्बु० (३७६) न चवाहा० (४३८) न तिसृचतसृ (३०४) न पदान्ताट्टोर० (१०२) नपरे नः (१२५) नपुंसकस्य झल० (३२४) नपुंसकाच्च (३२२) न भूसुधियोः (२५७) न मु ने (४७७) न लुमताङ्गस्य (२३८) नलोपः प्राति० (२३१) नलोपः सुप्स्वर० (३८१) न विभक्तौ तुष्माः (१७२) नशेर्वा (४५६) नश्च (१२६) नश्छाप्रशा० (१२०) नश्छव्य० (१३६) न षट्स्वस्रा० (३१७) न सम्प्रसारणे० (३६५) न संयोगाद्० (३८४) नहि-वृति-वृषि० (४८०) नहो धः (४८०) नाञ्चेः पूजा० (४४६) नादिचि (१७०) नाम्यन्ताच्छतुः (४५४) नामि (१८५) निपात एका० (८६) नीचैरनुदात्तः (१४) नुम्विसर्ज० (४६४) नृ च (२८०) नॄन्पे (१३७) नेदमदसो० (३७५) नेयडुवङ्० (३१२) नोपधायाः (४००) [ प ] पञ्चम्या अत् (४२६) पतिः समास० (२३४) पन्थिन्मथ्यृभू० (३६७) पदान्तस्य (१७६) पदान्ताद्वा (१४०) परश्च (१६३) परः सन्नि० (३१) पर्यायैश्चा० (४३८) पादः पत् (४३८) पुमः खय्यम्० (१३५) पुंसोऽसुँङ् (४६८) पूर्वत्रासिद्धम् (५६) पूर्वपरावर० (२०२) पूर्वादिभ्यो नव० (२०६) प्रत्ययलोपे० (२३८) प्रत्ययस्य लुक्० (२३७) प्रत्ययः (१६३) प्रथमचरम० (२०८) प्रथमयोः पूर्व० (१६६) प्रथमायाश्च० (४२३) प्रादयः (८८) प्लुतप्रगृह्या० (८२) [ ब ] बहुगणवतु० (२३६) बहुवचनस्य वस्० (४३४) बहुवचने झ० (१८३) बहुषु बहु० (१७०) [ भ ] भस्य टेर्लोपः (३६८) भूवादयो० (६४) भोभगो० (१४७) भ्यमो भ्यम् (४२८) [ म ] मघवा बहुलम् (३६१) मय उञो वो० (६३) मिदचोऽन्त्यात्० (३२४) मुखनासिका० (१७) मोऽनुस्वारः (११६) मो नो धातोः (३६६) मो राजि समः० (१२२) [ य ] यचि भम् (२१७) यथासंख्यमनु० (४७) यरोऽनुनासिके० (१०७) यस्मात्प्रत्यय० (१७३) यस्येति च (३२२)