भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 591

५७६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्

(वतिँ)—[तेन तुल्यं क्रिया चेद्वति (५।१।११४)]। ब्राह्मणेन तुल्यं वर्तते इति ब्राह्मणवद् वर्तते। ब्राह्मण जैसा व्यवहार करता है। प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत् (चाणक्य०)। गुरुवद् गुरुपुत्रे वर्तित- व्यम्। इसी प्रकार—यद्वत्=जैसे, तद्वत्=वैसे, यथावत्=ठीक तरह। आदि। (वतिँ)—[तत्र तस्येव (५।१।११५)]। मथुरायामिव स्रुघ्ने प्राकारः—मथुरावत् स्रुघ्ने प्राकारः। मथुरा में जैसे प्राकार है वैसे स्रुघ्न में है। यज्ञदत्तस्येव—यज्ञदत्तवद् देवदत्तस्य दन्ताः। यज्ञदत्त के दांतों की तरह देवदत्त के दान्त हैं। (वतिँ)—[तदर्हम् (५।१।११६)]। राजानमर्हतीति—राजवदस्य पालनं क्रियताम्। ऋषिवदस्य समादरः कर्तव्यः। [च] नानाञौ—ना और नाञ् प्रत्यय। (ना, नाञ्)—[विनञ्भ्यां नानाञौ न सह (५।२।२७)]। विना—वगैर। विना मलयमन्यत्र चन्दनं न प्ररोहति (पञ्च० १।४१)। नाना=वगैर। नाना नारीं निष्फला लोकयात्रा (गणरत्न०)। इन दोनों का उल्लेख पीछे स्वरादिगण में हो चुका है। विशेष वक्तव्य वहीं देखें। यहां पर तद्धितान्त अव्ययों का वर्णन समाप्त होता है। अब अग्रिम दो सूत्रों द्वारा कृदन्त अव्ययों को प्रस्तुत करते हैं— [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(३६६) कृन्मेजन्तः। १।१।३८॥ कृद् यो मान्त एजन्तश्च तदन्तमव्ययं स्यात्। स्मारं स्मारम्। जीवसे। पिबध्यै॥ अर्थ—मकारान्त कृत्प्रत्यय या एजन्त कृत्प्रत्यय जिस के अन्त में हो उस की अव्ययसञ्ज्ञा हो जाती है। व्याख्या—कृत् १।१। मेजन्तः १।१। अव्ययम् १।१। (स्वरादिनिपातमव्ययम् से)। समास—म् च एच् च—मेचौ, इतरेतरद्वन्द्वः। मेचोऽन्तो यस्य स मेजन्तः, बहुव्रीहिसमासः। सौत्रत्वात्कुत्वाभावः। ध्यान रहे कि केवल कृत्प्रत्यय का प्रयोग नहीं हो सकता अतः सञ्ज्ञाविधि में भी तदन्तविधि हो कर 'कृत्' से कृदन्त का ग्रहण होना है। अर्थ—(मेजन्त) मकारान्त या एजन्त (कृत्=कृदन्त) जो कृत्, वह जिस के अन्त में हो ऐसा शब्द (अव्ययम्) अव्ययसञ्ज्ञक होता है। णमुल्, वमुल्, खमुञ्, तुमुन्—ये चार प्रत्यय ही कृत्प्रत्ययों में मान्त होते हैं। इन के उदाहरण क्रमशः यथा— णमुल्—स्मारं स्मारम्। स्मृ चिन्तायाम् (भ्वा० प०) धातु से आभीक्ष्ण्ये णमुल् च (८८५) सूत्रद्वारा णमुल् प्रत्यय, अनुबन्धलोप तथा अचो ञ्णिति (१८२) से वृद्धि और रपर करने से—स्मारम्। 'स्मारम्' यह कृदन्त है, इस के अन्त में णमुल् (अम्) यह कृत्प्रत्यय किया गया है। अतः प्रकृतसूत्र से अव्ययसञ्ज्ञा होने के कारण