लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअव्यय-प्रकरणम् ५७७ कृदन्तत्वात् प्रातिपदिकत्वेन उत्पन्न सुँप् का अव्ययादाप्सुपः (३७२) से लुक् हो जाता है। अब नित्यवीप्सयोः (८८६) से द्वित्व हो कर 'स्मारं स्मारम्' प्रयोग सिद्ध होता है। इसीप्रकार—'ध्यायं ध्यायम्' । ध्यायं ध्यायं परं ब्रह्म स्मारं स्मारं गुरोर्गिरः । सिद्धा- न्तकौमुदीव्याख्यां कुर्मः प्रौढमनोरमाम् (प्रौढमनोरमादौ), परब्रह्म का बार बार ध्यान कर तथा गुरुजी के वचनों का बार बार स्मरण कर मैं (भट्टोजिदीक्षित) सिद्धान्त- कौमुदी की व्याख्या प्रौढमनोरमा की रचना करता हूं । कमुँल्—यह प्रत्यय वेद में ही प्रयुक्त होता है । अग्निं वै देवा विभाजं नाश- क्नुवन् (मैत्रा० सं० १.६.४), विभाजम् = विभक्तुमित्यर्थः । यहां विपूर्वक भज् धातु से णमुँल् प्रत्यय किया गया है । अपलुपं नाशक्नोत् (मैत्रा० सं० १.६.५), अपलुपम् = अपलोप्तुमित्यर्थः । अपपूर्वक लुप् धातु से कमुँल् प्रत्यय किया गया है । विभाजम् और अपलुपम् दोनों के अन्त में मकारान्त कृत् है अतः इन की प्रकृतसूत्र से अव्ययसंज्ञा हो कर अव्ययादाप्सुपः (३७२) से सुँप् का लुक् हो जाता है । खमुँञ्—चोरङ्कारम् आक्रोशत (तुम चोर हो—ऐसा कह कर गाली देता है)। यहां 'कृ' धातु से कर्मण्याक्रोशे कृञः खमुँञ् (३.४.२५) सूत्र द्वारा खमुँञ् प्रत्यय किया गया है । मकारान्त कृत् प्रत्यय अन्त में होने के कारण 'चोरङ्कारम्' की अव्ययसंज्ञा हो कर सुँब्लुक् हो जाता है । तुमुँन्—पठितुम् (पढ़ने के लिये), भवितुम् (होने के लिये) । इन में तुमुँ- ण्वुलौ० (८४६) आदि सूत्रों से तुमुँन् (तुम्) प्रत्यय किया जाता है । मकारान्त कृत् प्रत्यय अन्त में होने के कारण अव्ययसंज्ञा हो कर इन से परे सुँप् का लुक् हो जाता है । अनुवादोपयोगी तीन सौ से अधिक सार्थ तुमुन्प्रत्ययान्तों का एक बृहत्संग्रह इस व्याख्या के तृतीयभागस्थ (८५०) सूत्र पर दिया गया है वहीं देखें । ध्यान रहे कि णमुँल् आदि चारों कृत्प्रत्यय अनुबन्धों का लोप हो जाने से मकारान्त हो जाते हैं । यथा—णमुँल् = अम्, कमुँल् = अम्, खमुँञ् = अम्, तुमुँन् = तुम् । कृत्प्रत्ययों में एजन्तप्रत्यय (एकारान्त, ओकारान्त, ऐकारान्त, औकारान्त) तुमर्थे से-सेन्० (३.४.६) आदि सूत्रों से वेद में विधान किये जाते हैं। तदन्तों की भी प्रकृतसूत्र से अव्ययसंज्ञा हो जाती है । अव्ययसंज्ञा का प्रयोजन सुँब्लुक् आदि है । तथाहि— १. से—वक्षे (कहने के लिये) ।२ | ३. असे—जीवसे (जीने के लिये) । २. सेन् (से) = एषे (जाने के लिये) । | ४. असेन् (असे)—पूर्वोक्त उदाहरण । १. इन की पूरी सिद्धि इस व्याख्या के तृतीयभागस्थ (८८६) सूत्र पर देखें । २. तुमर्थे से-सेन्-असे-असेन्-क्से-कसेन्-अध्यै-अध्यैन्-कध्यै-कध्यैन्-शध्यै-शध्यैन्-तवै- तवेङ्-तवेनः (३.४.६)—वेद में तुमुन् प्रत्यय के अर्थ में धातु से परे से, सेन् ल० प्र० (३७)