भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 557

५४२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् नोट- 'जितना' अर्थ में त्रिलिङ्गी 'यावत्' शब्द का भी बहुधा प्रयोग देखा जाता है। यथा—यावान् अर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके। तावान् सर्वेषु वेदेषु ब्राह्म- णस्य विजानतः (गीता० २।४६)। यावती सम्भवेद् बुद्धिस्तावतीं दातुमर्हति (मनु० ८।१५५)। यावन्ति पशुरोमाणि (मनु० ५।३८)। [२८] तावत्* ॥ १ तब तक—तावच्च शोभते मूर्खो यावत् किञ्चिन्न भाषते (हितोप० १)। २ पहले (अन्य कार्य करने से पूर्व)—आर्ये ! इतस्तावदागम्यताम् (शाकुन्तल० १)। ३. तो—एव कृते तव तावत् क्लेशं विना प्राणयात्रा भविष्यति (पञ्च० १ कथा ८)। विग्रहस्तावदुपस्थित (हितोप० ३)। ४. निश्चित ही—त्वमेव तावत् प्रथमो राजद्रोही (मुद्रा० १)। ५ यावत् के प्रतिसम्बन्ध मे --एकस्य दुःखस्य न यावदन्तं गच्छाम्यहं पारमिवार्णवस्य। तावद् द्वितीय समुपस्थित मे छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति (पञ्च० २।१०६)। यावत् त्रयस्ते जीवेयुस्तावन्नान्य समाचरेत् (मनु० २ २३५), माता, पिता और गुरु जब तक जीवित रहे तब तक उन की ही सेवा मे रत रहे। नोट—'उतना' अर्थ मे त्रिलिङ्गी 'तावत्' शब्द का भी बहुधा प्रयोग होता है। उदाहरण ऊपर 'यावत्' के नोट मे देखें। [२९] त्वै ॥ १ विक्षेप—अयं त्वै प्रकृत्यते (गणरत्न०)। २. वितर्कं—कस्त्या एषोऽभि- गच्छति (गणरत्न०)। नोट—यह निपात ब्राह्मणग्रन्थो के कतिपय प्रयोगो के अतिरिक्त अन्यत्र कही उपलब्ध नही हुआ। शतपथ (माध्यन्दिनीय) के (१२.२.२१२) में इस का प्रयोग देखा जाता है। एवम् अन्य ब्राह्मणो मे भी क्वाचित्क प्रयोग है। [३०] न्वै ॥ १ वितर्कं—को न्वा एषोऽभिगच्छति (गणरत्न०)। पादपूरणेऽपि—इति वर्धमान। नोट- कई लोग 'त्वै' के स्थान पर 'न्वै' का पाठ मानते हैं। परन्तु ब्राह्मण- ग्रन्थों मे दोनो का पाठ देखा जाता है। निदर्शनार्थं 'न्वै' का पाठ माध्यन्दिनीय शतपथ मे (१२ ४ १ ३) के स्थान पर देखें। [३१] द्वै ॥ १ वितर्कं। इस का प्रयोग वर्तमान उपलब्ध वैदिक वा लौकिक वाङ्मय मे हमे कही नही मिला। [३२] रै ॥ १ अनादर—त्य ह रे किं करिष्यसि (गणरत्न०)। दान—रै करोति (गण- रत्न०), दान ददातीत्यर्थ। नोट- इस के उदाहरण अन्वेष्टव्य हैं। वर्धमानोक्त उदाहरण ही दीक्षित ने शब्दकौस्तुभ मे उद्धृत किये हैं। किसी को भी अन्य कोई उदाहरण नही मिला।