लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअव्यय-प्रकरणम् ५४३ [३३-३७] श्रौषट्, वौषट्, स्वाहा, स्वधा, वषट् ॥ इन की व्याख्या स्वरादियों में की जा चुकी है। इन का यहां पुनर्ग्रहण स्वर (आद्युदात्त) के लिये ही समझना चाहिये। [३८] तुम् ॥ १. तूं तूं कह कर निरादर करना—गुरुं हुंकृत्य तुंकृत्य विप्रं निर्जित्य वादतः । श्मशाने जायते घोरे काकगृध्रोपसेविते (सुप्रसिद्ध) । नोट—यहां 'तुम्' से उपर्युक्त उदाहरणगत 'तुम्' के ग्रहण में हमारा मन सन्देह करता है। किसी कोषकार ने इस का उल्लेख नहीं किया । [३६] तथाहि* ॥ १. क्योंकि, कारण कि, इसीलिये—तं वेधा विदधे नूनं महाभूतसमाधिना । तथाहि सर्वे तस्यासन् परार्थैकफला गुणाः (रघु० १.२६) । २. इस तरह, इस प्रकार —तथाहि रामो भरतेन ताम्यता प्रसाद्यमानः शिरसा महीपतिः । न चैव चक्रे गमनाय सत्त्ववान् मतिं पितुस्तद्वचने व्यवस्थितः (रामायण० २.१०६.३३) । नोट—यह निपात 'तथा' और 'हि' इन दो निपातों को मिला कर बना है । [४०] खलु* ॥ १. शैलीवशात् दबाव (Stress) डालते हुए वाक्यालंकार में—न खलु धीमतां कश्चिदविषयो नाम (शाकुन्तल० ४) । न खलु स उपरतो यस्य वल्लभो जनः स्मरति (सुभाषित०) । २. अनुनय करना—न खलु न खलु बाणः सन्निपात्योऽयमस्मिन् । मृदुनि मृगशरीरे तूलराशाविवाग्निः (शाकुन्तल० १)। न खलु न खलु मुग्धे साहसं कार्य- मेतत् (नागानन्द० ३)। ३. निश्चय ही, निस्सन्देह, सचमुच—अनुत्सेकः खलु विक्रमाऽ- लङ्कारः (विक्रमो० १), निश्चय ही अभिमानशून्यता वीरता का अलङ्कार है । न खल्वनिर्जित्य रघुं कृती भवान् (रघु० ३.५१), निश्चय ही रघु को जीते बिना आप कृतकृत्य नहीं हो सकते। दूरीकृताः खलु गुणैरुद्यानलता वनलताभिः (शाकुन्तल० १.१६), निस्सन्देह वन की वेलों ने बाग की वेलों को मात दे दी । पुत्रादपि प्रियतरं खलु तेन दानम् (पञ्च० २.५५), सचमुच दान पुत्र से भी अधिक प्रिय होता है। ४. प्रश्न पूछने में—न खलु तामभिक्रुद्धो गुरुः (विक्रमो० ३), तो क्या गुरु उस पर क्रुद्ध नहीं हुए ? न खलु विदितास्ते तत्र निवसन्तःइचाणक्यहतकेन (मुद्रा० २), तो क्या उन्हें वहां रहते हुए दुष्ट चाणक्य ने नहीं जाना ? ५. निषेध में—पीत्वा खलु (मत पिओ), यहां अलंखल्वोः प्रतिषेधयोः प्राचां क्त्वा (८७८) सूत्र से क्त्वा प्रत्यय हो जाता है । निर्धारितेऽर्थे लेखेन खलूक्त्वा खलु वाचिकम् (माघ० २.७०), लेख द्वारा अर्थ के जान लेने पर फिर मौखिक अभिप्राय समझाना व्यर्थ है। ६. हेत्वर्थ में (कारण कि, क्योंकि) —न विदीर्ये कठिनाः खलु स्त्रियः (कुमार० ४.५), मैं विदीर्ण नहीं हो रही कारण कि स्त्रियां कठोर होती हैं । नोट—न पादादौ खल्वादयः (वामनसूत्र ५.१.५) यह सूत्र निषेधार्थक से भिन्न 'खलु' के लिये है ।