लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् [४१] किल* ॥ १ वार्ता अर्थात् ऐतिह्य बात कहने मे—बभूव योगी किल कार्तवीर्यः (रघु० ६.३८), सुनते हैं कि कार्तवीर्य नाम वाला एक ब्रह्मवेत्ता था। जघान कंसं किल वासु- देवः (महाभाष्ये ३ २ १११), कहते हैं कि वासुदेव ने कंस को मार डाला। २ निश्चय मे—इदं किलाव्याजमनोहरं वपुः (शाकुन्तल० १.१८), निश्चय से यह शरीर स्वाभाविक सुन्दर है। स्वादुष्किलायं मधुमाँ उतायम् (ऋ० १.४७ १) निश्चय ही यह सोम स्वादु है और मधुर है। ३ अलीक अर्थात् अवास्तविक बात कहने मे— प्रसह्य सिंहः किल तां चकर्ष (रघु० २ २७), सिंह ने बलपूर्वक उस नन्दिनी को दबो- चने का बहाना किया। अयि कठोर यशः किल ते प्रियम् (उत्तरराम० ३ २७), ऐ निर्दय ! तुझे यश प्यारा है— यह झूठ है। द्राघीयसा वयोऽतीतं परिक्लांन्तः किला- ध्वना (किरात० ११.२), वह बूढ़ा कपटरूप से दीर्घ मार्ग के कारण थका हुआ प्रतीत हो रहा था। ४ सम्भावना मे—पार्थः किल विजेष्यते कुरून् (गणारत्न०), आशा है कि अर्जुन कौरवो को जीतेगा। गुरुन् किलातिशेते शिष्यः (व्या० व०), सम्भावना है कि शिष्य गुरुओ से बढ़ जायेगा। ५ अरुचि मे—एवं किल केचिद्वदन्ति (गणारत्न०), [हम तो नहीं मानते] परन्तु कुछ लोग ऐसा कहते हैं। ६ निरादर मे—त्वं किल योत्स्यसे (गणरत्न०), तू और फिर युद्ध करेगा अर्थात् युद्ध करना तेरे बूते से बाहर है। ७. हेतु अर्थ मे (क्योंकि)—क्षतात् किल त्रायत इत्युदग्रः क्षत्रस्य शब्दो भुवनेषु रूढः (रघु० २ ५३), क्योकि घाव से बचाता है इस कारण उग्र क्षत्रशब्द तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। {४२} अथो ॥ इस के भी प्राय 'अथ' की तरह अर्थ होते हैं। १. समुच्चय ('च' के अर्थ) में—स्त्रियो रत्नान्यथो विद्या धर्मः शौचं सुभाषितम् । विविधानि च शिल्पानि समादे- यानि सर्वतः (मनु० २.४०)। २ अनन्तर—अथो वयस्यां परिपार्श्ववर्त्तिनीं विवर्त्तिता- ऽनञ्जननेत्रमंक्षकं (कुमार० ५.५१), तब अञ्जनशून्य नेत्रों वाली पास खड़ी सखी को पार्वती ने देखा। नोट—'अथो' निपात (५३) है अतः इस के आगे स्वर वर्ण आने पर ओत् (५६) सूत्र द्वारा प्रगृह्यसंज्ञा हो जाती है। तब प्रकृतिभाव होने से सन्धि नहीं होती। यथा—अनेन व्याकरणमधीतमथो एनं छन्दोऽध्यापयेति (सि० कौ०) । [४३] अथ* ॥ इस का विवेचन स्वरादियों में हो चुका है। स्वरादियो में इस के पढ़ने का प्रयोजन यह है कि मङ्गलप्रशस्तववाचक 'अथ' शब्द की भी अव्ययसंज्ञा सिद्ध हो जाये । यथा नैषध० (१५.६) में— उदस्य कुम्भोरय शातकुम्भजाद्यदम्बुकं चारुसितापि वेदिकोदरे। यथाङ्गुराचारमथावनोन्द्रजा पुरन्ध्रिवर्गः स्नपयाम्बभूव ताम् ॥ यहाँ 'अथ स्नपयाम्बभूव' का 'मङ्गलं स्नपनं चकार' ऐसा अर्थ है। निपातो में पढ़ा