भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 560

अव्यय-प्रकरणम् ५४५ गया यह 'अथ' अन्य अर्थ का वाचक होता हुआ केवल स्वरूपमात्र से मङ्गल का द्योतन कराता है। यथा - अथातो ब्रह्मजिज्ञासा (वेदान्तदर्शन १.१.१), यहां आनन्तर्य अर्थ का वाचक 'अथ' शब्दस्वरूप अर्थात् ध्वनिमात्र में माङ्गलिक (मङ्गलद्योतक) है। कहा भी है— ओंकारश्चाथशब्दश्च द्वावेतौ ब्रह्मणः पुरा । कण्ठं भित्त्वा विनिर्यातो तेन माङ्गलिकावुभौ ॥ [४४] सुष्ठु* ॥ इस का विवेचन स्वरादियों के आकृतिगणत्वेन परिगणित संग्रह में कर चुके हैं। यहां निपातों में इस का पुनर्ग्रहण निपाता आद्युदात्ताः (फिद्मसूत्र ८०) द्वारा आद्यु- दात्तस्वर के लिये ही किया गया है। स्वरादियों में प्रायः फिषोऽन्त उदात्तः (फिद्मसूत्र १) से अन्तोदात्त स्वर होता है। जिन में दोनों स्वर अभीष्ट होते हैं उन अनेकाचों का दोनों जगह पाठ किया जाता है। ध्यान रहे कि एकाचों में स्वरसंबंधी कोई अन्तर नहीं होता। [४५] स्म* ॥ १. भूतकाल में—भासुरको नाम सिंहः प्रतिवसति स्म (पञ्च० १) । क्रीणन्ति स्म प्राणमूल्यैर्यशांसि (माघ० १८.१५)। इस के योग में भूतकाल में भी लट् का प्रयोग होता है—देखें लट् स्मे (७६३) तथा अपरोक्षे च (३.२.११६) । २. शब्द सौन्दर्य बढ़ाने के लिये प्रायः 'मा' (माङ्) के साथ—भर्तृविप्रकृतापि रोषणतया मा स्म प्रतीपं गमः (शाकुन्तल० ४.१८)। मा स्म सीमन्तिनी काचिज्जनयेत् पुत्रमीदृशम् (हितोप० २.७)। ३. पादपूर्ति के लिये—तु हि च स्म ह वै पादपूरणे —इत्यमरः । [४६] आदह् ॥ १. हिंसा—आदहारीन् पुरन्दर (गणरत्न०) । २. उपक्रम—आदह भक्तस्य भोजनाय (गणरत्न०)। ३. कुत्सन—कुर्वादह् यदि करिष्यसि (गणरत्न०)। नोट—इस अव्यय का हमें कहीं प्रयोग नहीं मिल सका । भट्टोजिदीक्षित को भी इस का प्रयोग उपलब्ध नहीं हुआ, यह उन्होंने शब्दकौस्तुभ में स्पष्ट स्वीकार किया है। उपसर्ग-विभक्ति-स्वर-प्रतिरूपकाश्च (गणसूत्रम्) ॥ अर्थः—उपसर्गप्रतिरूपक, विभक्तिप्रतिरूपक तथा स्वरप्रतिरूपक भी चादियों में पड़ने चाहिये । जो वस्तुतः उपसर्ग तो न हों पर आकृत्या उपसर्ग के समान प्रतीत हों उन्हें 'उपसर्गप्रतिरूपक' कहते हैं। इसी प्रकार विभक्ति अर्थात् विभक्त्यन्त के समान प्रतीत होने वाले 'विभक्तिप्रतिरूपक' तथा स्वर अर्थात् अच् के समान प्रतीत होने वाले 'स्वरप्रतिरूपक' कहलाते हैं। उपसर्गप्रतिरूपक यथा— [४७] अवदत्तम् ॥ १. दिया जा चुका । किमन्नम् अवदत्तं त्वया ? ल० प्र० (३५)