भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 561

५४६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् नोट—अव + दा + क्त = अव + दद् + त = अवदत्तम् । यहां 'अव' उपसर्ग नहीं अपितु उपसर्गप्रतिरूपक (उपसर्ग के सदृश दिखाई देने वाला) निपात है । अतः उपसर्ग न होने से इस से परे 'दा' धातु के आकार को अच उपसर्गात्त (७।४।४७)१ सूत्रद्वारा त् आदेश नहीं होता । दो दद् घो (८२७)२ द्वारा सम्पूर्ण 'दा' के स्थान पर दद् आदेश ही होता है । ध्यान रहे कि 'अव' उपसर्ग के योग में 'दा' के आकार को त् आदेश करने पर—अव + द त् + क्त = अवत्तम् रूप बनता है । इसी प्रकार— अवदत्तं विदत्तं च प्रदत्तञ्चादिकर्मणि । सुदत्तमनुदत्तञ्च निदत्तमिति चेष्यते ॥ (महाभाष्य) इन में अनु, प्र, सु, वि और नि को भी उपसर्गप्रतिरूपक निपात समझना चाहिये । विभक्तिप्रतिरूपक यथा— [४८] अहंयु ॥ १ अहङ्कारवान्—स शुश्रुवांस्तद्वचनं मुमोह राजाऽसहिष्णु सुतविप्रयोगम् । अहंयुनाऽथ क्षितिपं शुभंयुस्तच्चे वचस्तापसकुञ्जरेण (भट्टि० १।२०), महाराज दशरथ विश्वामित्र के उन वचनों को सुन कर पुत्रवियोग को सहन न करते हुए मोह को प्राप्त हो गए । तब अहङ्कारवान् तापसश्रेष्ठ विश्वामित्र ने अपना कल्याण चाहने वाले राजा को यह वचन कहा । नोट—'अहम्' यह अहङ्कारवाचक विभक्तिप्रतिरूपक निपात है । 'अस्मद्' शब्द के प्रथमैकवचनान्त के समान प्रतीत होता है, परन्तु है यह उस से नितान्त ही भिन्न । इस निपात (अव्यय) से मत्वर्थ में अहञ्शुभमोर्युस् (११६२) सूत्रद्वारा युस् प्रत्यय हो जाता है । अहम् (अहङ्कार ) यस्यास्तीति—अहंयु । 'अहंयु' शब्द उकारान्त त्रिलिङ्गी हो जाता है । ध्यान रहे कि इसे सकारान्त समझना भूल है । प्रत्यय का सित्त्व पदसञ्ज्ञार्थ है । अतः भसञ्ज्ञा न हो कर पदसञ्ज्ञा के कारण मोऽनुस्वार (७७) से मकार को अनुस्वार हो जाता है । 'अहंयु' शब्द में यदि 'अस्मद्' शब्द होता तो प्रत्ययोत्तरपदयोश्च (७ २ ६८) द्वारा मपर्यन्त मद् आदेश होकर 'मद्यु' ऐसा अनिष्ट रूप बन जाता । इसी प्रकार 'शुभम्' (सुख, कल्याण) इस विभक्तिप्रतिरूपक निपात से भी युस् प्रत्यय हो कर—शुभम् यस्यास्तीति 'शुभंयु' निष्पन्न होता है । इस का साहित्यगत प्रयोग भी ऊपर के श्लोक में आ चुका है । अहङ्कारवानहंयुः शुभंयुस्तु शुभान्वित — इत्यमर । चिरेण, चिराय, चिरात्, चिरे, चिरस्य—इत्यादि अव्ययो को भी कई लोग १ अच उपसर्गात्त (७।४।४७) — अजन्त उपसर्ग से परे घुसंज्ञक दा धातु के आकार को त्' आदेश हो जाता है तकारादि कित् प्रत्यय परे हो तो । २ दो दद् घो (८२७)—घुसंज्ञक दा धातु को 'दद्' यह सर्वादेश हो जाता है तकारादि कित् प्रत्यय परे हो तो ।