लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअव्यय-प्रकरणम् ५४७ स्वरादियों में न पढ़ कर चादियों में ही पढ़ते है । ये सब विभक्तिप्रतिरूपक निपात या अव्यय हैं । विभक्ति न होने पर भी इन में विभक्ति का सा भ्रम होता है । सुब्विभक्त्यन्त का भ्रम होने से इन को सुबन्तप्रतिरूपक निपात भी कहते हैं । अत्र तिङन्तप्रतिरूपक निपात का उदाहरण देते हैं— [४६] अस्तिक्षीरा ।। अस्तिक्षीरा = क्षीरवती (गाय आदि) । अस्ति (विद्यमानम्) क्षीरं (दुग्धम्) यस्याः सा—अस्तिक्षीरा । बहुव्रीहिसमासः । यहां 'अस्ति' यह विद्यमानार्थक तिङन्त- प्रतिरूपक निपात (अव्यय) है । यदि यह वस्तुतः तिङन्त होता तो इस का सुबन्त क्षीरशब्द के साथ बहुव्रीहिसमास न हो सकता [देखें—अनेकमन्यपदार्थे (६३५)]। किसी घटना, कथा या वर्णन को आरम्भ करने में भी 'अस्ति' निपात का प्रयोग देखा जाता है । यथा—अस्ति पूर्वमहं व्योमचारी विद्याधरोऽभवम् (कथासरित्० २२.५६)। इसी निपात से अस्तिकायः, अस्तित्व आदि शब्द बनते हैं । कुछ लोगों का कहना है कि 'अस्ति' का पीछे स्वरादियों में पाठ आ चुका है अतः इसे तिङन्तप्रतिरूपक के रूप में उदाहृत करना बेकार है¹। इस के स्थान पर अस्मि (मैं) का उदाहरण यहां के लिये उपयुक्त है । 'अस्मि' के उदाहरण यथा— त्वामस्मि वच्मि विदुषां समवायोऽत्र तिष्ठति (साहित्य० ४), अस्मि = अहं वच्मि इत्यर्थः । दासे कृतागसि भवत्युचितः प्रभूणां पादप्रहार इति सुन्दरि नास्मि दूथे (साहित्य० १०), हे सुन्दरि ! अपराधी सेवक पर प्रभु पादप्रहार करें यह उचित ही है अतः मैं दुःखी नहीं हो रहा हूं । अन्यत्र यूयं पुष्पावचयं कुरुध्वमत्रास्मि करोमि सख्यः (काव्यप्र० ३.२०), हे सखियो ! आप दूसरी जगह फूल चुनो मैं यहां चुनता हूं । नृमांसमस्मि विक्रीणे गृह्यतामित्युवाच सः (कथासरित्०), मैं नरमांस बेच रहा हूं लीजिये ऐसा उस ने कहा । योगशास्त्र में प्रसिद्ध अस्मिता शब्द भी इसी निपात से निष्पन्न होता है । इसी प्रकार—'अस्तु' आदि अन्य भी तिङन्तप्रतिरूपक निपात समझ लेने चाहियें । १. उन का यह भी कहना है कि 'अस्ति' शब्द का अर्थ 'धन' भी होता है इस से अस्तिमान् (धनवान्) शब्द निष्पन्न होता है। अतः सत्त्ववाचक होने से स्वरादियों में ही इस का पाठ उचित है । क्योंकि यहां चादयोऽसत्त्वे (५३) में 'असत्त्वे' कथन के कारण धनवाचक 'अस्ति' शब्द की निपातसंज्ञा न हो सकेगी । परन्तु अन्य लोग उन के इस विचार से सहमत नहीं उन का कथन है कि (५.२.६४) सूत्रस्थ महाभाष्य के अवलोकन से यह सुतरां प्रमाणित होता है कि इस का स्वरादियों में पाठ अप्रामाणिक है चादियों में ही पाठ उचित है । अस्तिमान् का वास्तविक अर्थ 'सत्ता वाला' है । लोक में सत्ता प्रायः धनमूलक मानी जाती है अतः इस का अर्थ 'धनवान्' भी हो गया है ।