लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् स्वरप्रतिरूपक यथा— [५०] अ ॥ १ सम्बोधन—अ अनन्त । २ आक्षेप (निन्दा) में—अपचसि जाल्म (सि० कौ०) हे दुष्ट ! तुम गर्हितरीत्या पकाते हो । अनेक वैयाकरण इस अर्थ में नञ् के नकार का नञो नलोपस्तिङि क्षेपे (वा०) वार्तिक द्वारा लोप हुआ मानते हैं, स्वतन्त्रतया 'अ' निपात का प्रयोग नहीं । [५१] आ ॥ १ पूर्व प्रक्रान्त वाक्य के अन्यथा करने में—आ एव नु मन्यसे (काशिका), अब तू ऐसा मानता है अर्थात् पहले त ऐसा नहीं मानता था अब मानने लगा है। २ स्मरण में—आ एव किल तत् (काशिका), ओह ! वह ऐसा ही है । इस का विवेचन पीछे निपात एकाजनाङ (५५) सूत्र पर कर चुके हैं । [५२] इ ॥ १ सम्बोधन—इ इन्द्र पश्य (काशिका), ऐ ! इन्द्र को देखो । २ विस्मय— इ इन्द्र (सि० कौ०), ओह ! यह इन्द्र है । [५३] ई ॥ १ सम्बोधन—ई ईश ! । ई ईदृश ससार (गणरत्न०) । [५४] उ ॥ १ सम्बोधन—उ उत्तिष्ठ (गणरत्न०) । २ वितर्क—उ उमेश (सि० कौ०), जान पड़ता है कि उमेश है । [५५–५६] ऊ । ए । ऐ । ओ । औ ॥ १ सम्बोधन—ऊ उपरे बीजं वपति । ए इतो भव । ऐ वाचं देहि । ओ धावय (गणरत्न०)। औ महात्मन् ! । नोट—इन स्वरप्रतिरूपक निपातों की अच् परे होने पर 'निपात एकाजनाङ् (५५) सूत्रद्वारा प्रगृह्यसंज्ञा हो कर प्रकृतिभाव हो जाता है, अतः स्वरसन्धि नहीं होती । [६०] पशु ॥ १ ठीक तरह में —सोध नयन्ति पशु मन्यमाना (ऋ० ३।५३।२३) । [६१] शुकम् ॥ १ शीघ्र—शुकं गच्छति (गणरत्न०), शीघ्र जाता है । नोट—इस के प्रयोग अन्वेषणीय हैं। कुछ कोषकार यहां 'शकम्' पाठ मानते हैं । १ स्वरादिरिति सम्बोधन भर्त्सनाऽनुकम्पा-पादपूरण-प्रतिषेधेषु यथासम्भवं भवति— इति गणरत्नमहोदधौ वर्धमानः ।