भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 556

अव्यय-प्रकरणम् ५४१ किस्तोक्स्य नो रिषत (ऋ० ८.६७.११)। शाकटायन इसे सान्त मानते हैं। [२२] माकीम् ॥ १. मत (मत कोई)—माकिर्नेश्नन्माकीँ रिषन्माकीँ संशारि केवटे (ऋ० ६.५४.७)। गण में 'माकिम्' पाठ अपपाठ है। [२३] नकिर् ॥ १. न कोई—सत्यमद्धा नकिरन्यस्त्वोवान् (ऋ० १.५२.१३), सचमुच तेरे जैसा अन्य कोई नहीं है। नकिर् वक्ता ना दादिति (ऋ० ८.३२.१५), कोई यह कहने वाला नहीं है कि इन्द्र नहीं देता। नकिस्तं घ्नन्त्यन्तितो न दूरात् (ऋ० २.२७.१३), उसे कोई भी न तो समीप से मार सकता है और न दूर से। [२४] नकीम् ॥ १. न कोई—नकीम् इन्द्रो निकर्तवे (ऋ० ८.७८.५), कोई इन्द्र का तिर- स्कार नहीं कर सकता। इस गण में उपलभ्यमान 'नकिम्' पाठ अपपाठ है। नोट—माकिर् आदि चारों निपात वेद में ही उपलब्ध होते हैं। [२५] माङ्* ॥ १. निषेध (मत)—धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः। तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतो वधीत् (मनु० ८.१५)। नोट—अनुबन्ध ङकार का लोप हो कर 'माङ्' का 'मा' ही अवशिष्ट रहता है। ध्यान रहे कि इस का स्वरादियों में भी पाठ किया गया है। नागेशभट्ट के विचार में इस का स्वरादियों में पाठ व्यर्थ है; क्योंकि वहां पढ़ने से स्वर (अन्तोदात्त) में तो कोई अन्तर आता ही नहीं, उल्टा यहां पढ़ने के कारण लक्ष्मीवाची 'मा' शब्द की अव्ययसंज्ञा नहीं होती—जो न करनी ही अभीष्ट है। विशेष विचार सिद्धान्तकौमुदी की व्याख्याओं में देखें। [२६] नञ्* ॥ १. नहीं—न हि सुशिक्षितोऽपि वटुः स्वस्कन्धमारोढुं पटुः (भुवनेश०)। नोट—इस का स्वरादियों में विवेचन कर चुके हैं। नागेशभट्ट के अनुसार इस का भी स्वरादियों में पाठ अप्रामाणिक है। [२७] यावत्* ॥ १. अवधि (पर्यन्त)—स्तन्यत्यागं यावत् पुत्रयोरवेक्षस्व (उत्तरराम० ७)। सर्पकोटरं प्रावत् (पञ्च० १)। २. यदा, जब—यावदुत्थाय निरीक्षते तावद् हंसोऽव- लोकितः (हितोप० ३)। ३. जब तक—यावत्स्वस्थमिदं कलेवरगृहं यावच्च दूरे जरा (वैराग्य० ७५)। यावद्वित्तोपार्जनसक्तस्तावन्निजपरिवारो रक्तः (मोहमुद्गर० ८)। ४. तब तक, तब तक के लिये—यावदिमां छायामाश्रित्य प्रतिपालयामि (शाकुन्तल० १)। तद् यावद् गृहिणीमाहूय सङ्गीतकमनुतिष्ठामि (शाकुन्तल० १)। ५. निश्चय ही—यावद् भुङ्क्ते (वह निश्चय ही खायेगा)। यावत्पुरानिपातयोर्लट् (३.३.४) इति लट्।