भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

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अव्यय-प्रकरणम् ५५१ (नीति०) । रे पान्थ ! विह्वलमना न मनागपि स्याः (भामिनी० १.३६) । दिने दिने त्वं तनुरेधि रेऽधिकम् (नैषध० १.६०) । (३) अरे=अपने से निकृष्टों के सम्बोधन में - आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः (बृ० उ० २.५), अरी ! आत्मा ही देखने योग्य, सुनने योग्य तथा मनन करने योग्य है। यहां याज्ञवल्क्य अपनी पत्नी मैत्रेयी को सम्बो- धित कर रहे हैं। (४) अरेरे=क्रोध या निरादर से सम्बोधन करने में - अरेरे राधागर्भभार- भूत सूतापसद (वेणी० ३) । (५) भगोस् = देवों या मान्यों के सम्बोधन में - भगो नमस्ते (भगवन् ! आप को नमस्कार हो) । सा होवाच मैत्रेयी यन्नु मे इयं भगोः सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात् कथं तेनामृता स्यामिति (बृ० उ० २.४.२), वह मैत्रेयी बोली - हे भग- वन् ! यदि यह सम्पूर्ण पृथ्वी धन से परिपूर्ण हुई मेरी हो जाये तो भी मैं कैसे उस से मुक्त हो जाऊंगी ? (६) अघोस् = निकृष्ट पापी या दुष्ट को सम्बोधित करने में - अघो याहि (रे दुष्ट ! तू जा) । (७) हंहो=प्रायः मध्यमदर्जे के जनों को सम्बोधित करने में - हंहो ब्राह्मण ! मा कुप्य (मुद्रा० १) । हंहो तिष्ठ सखे ! विवेक ! बहुभिः प्राप्तोऽसि पुण्यैर्मया (हेम- चन्द्र), हे मित्र विवेक ! तू मेरे पास रह जा, मैं ने तुम्हें बड़े पुण्यों से पाया है। (८) हा* = १. दुःख, शोक या खेद प्रकट करने में - हा कष्टं ललिता लवङ्ग- लतिका दावाग्निना दह्यते (भामिनी० १.५५) । हा पितः ! क्वासि हे सुभ्रु ! (भट्टि० ६.११) । हाहा तथापि विषया न परित्यजन्ति (वैराग्य० १५) । हाहा देवि ! स्फुटति हृदयं संस्रते देहबन्धः (उत्तरराम० ३. ३८) । २. आश्चर्य प्रकट करने में - हा कथं महाराजदशरथस्य धर्मदाराः प्रियसखी मे कौशल्या (उत्तरराम० ४) । (६) अहह = १. खेदातिशय प्रकट करने में - तुषाराद्रेः सूनोरहह पितरि क्लेशविवशे, न चासौ सम्पातः पयसि पयसां पत्युरुचितः (नीति० २८), पिता हिमा- लय के क्लेशविवश होने पर उस के पुत्र मैनाक का समुद्र में डुबकी लगाना अच्छा न था । २. आश्चर्य या अद्भुत अर्थ में - अहह महतां निःसीमानश्चरित्रविभूतयः (नीति० २७), आश्चर्य है कि महापुरुषों के चरित का माहात्म्य सीमारहित होता है। (१०) अहो* = १. महत्त्व या आश्चर्य प्रकट करने में - अहो मधुरमासां दर्शनम् (शाकुन्तल० १) । अहो दुरन्ता बलवद्विरोधिता (किरात० १.३३) । अहो कामी स्वतां पश्यति (शाकुन्तल० २.२) । अहो रूपमहो वीर्यमहो सत्त्वमहो द्युतिः । अहो दीप्तिरहो कान्तिरहौ शीलमहो बलम् । अहो शक्तिरहो भक्तिरहो प्रज्ञा हनूमतः (रामचरित० १.५२) । २. खेद या दुःख प्रकट करने में - अहो दुष्पन्तस्य संशयमा- रूढाः पिण्डभाजः (शाकुन्तल० ५) । विधिरहो बलवानिति मे मतिः (नीति० ८५) ।