लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअव्यय-प्रकरणम् ५५३ मा कृणु देवेषुच शूद्रं उतार्ये (अथर्व० १६.६२.१). मुझे देवताओं का प्यारा बना, शूद्र और आर्य का भी । ३. श्लोक के अन्त में पादपूर्त्यर्थ—धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नम- धर्मोऽभिभवत्युत (गीता० १.४०) । (१८) किम्* = १. क्यों, क्या । किं बद्धः सरितां नाथः क्लेशिताः किं वनौ- कसः। त्यक्तव्या यदि वैदेही किं हतो दशकन्धरः (रामचरित० ४० ६३), यदि मुझे सीता का त्याग ही करना था तो समुद्र को क्यों बांधा, वनवासी वानरों को क्यों क्लेश दिया, रावण को क्यों मारा ? । न जाने संसारः किममृतमयः किं विषममयः (वैराग्य० ८६) । २. कुत्सा, निन्दा अर्थ मे—स किंसखा साधु न शास्ति योऽधिपम् (किरात० १.५), वह कुत्सित मित्र है जो राजा को ठीक सलाह नही देता । (१९) किमुत* = कहना ही क्या । ऋषिप्रभावान्मयि नान्तकोऽपि प्रभुः प्रहर्तुं किमुतान्यहिंस्राः (रघु० २.६२), ऋषि के प्रभाव से मुझ पर यम भी प्रहार नहीं कर सकता दूसरे हिंसक जीवों का तो कहना ही क्या ? (२०) किमु* = १. कहना ही क्या । यौवनं धनसम्पत्तिःप्रभुत्वमविवेकिता । एकैकमप्यनर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम् (हितोप० प्रस्तावना) । २. अथवा क्या—किमु विषविसर्पः किमु मदः (उत्तरराम० १.३५) । ३. क्या—प्रियसुहृत्सार्थः किमु त्यज्यते (आटे०) । (२१) किमिति* = किस कारण से, किस लिये—किमित्यपास्याभरणानि यौवने धृतं त्वया वार्धकशोभि वल्कलम् (कुमार० ५.४४)। तत् किमित्युदासते भरताः (मालती० १), तो नटवर्ग क्यों उदास है ? (२२) किमिव* = क्या (इव वाक्यालंकार में है)—किमिव हि मधुराणां मण्डनं नाऽऽकृतीनाम् (शाकुन्तल० १.१८) । स्पृशन्त्यास्तारुण्यं किमिव न हि रम्यं मृगदृशः (शृङ्गार० ६) । (२३) किमपि* = १. कुछ अनिर्वाच्य—किमपि कमनीयं वपुरिदम् (शाकुन्तल० ३.७), यह शरीर इतना सुन्दर है कि बखान नहीं किया जा सकता । २. कुछ—जानन्ति ते किमपि तान् प्रति नैष यत्नः (मालती० १.८)। (२४) प्रत्युत* = के विपरीत, उल्टा—कृतमपि महोपकारं पय इव पीत्वा निराशङ्कः । प्रत्युत हन्तुं यतते काकोदरसोदरः खलो जगति (भामिनी० १.७५), किये हुए महोपकार को दूध की तरह पी कर निःशङ्क हुआ दुर्जन सांप की तरह उल्टा मारने को दौड़ता है । विषादे कर्तव्ये विदधति जडाः प्रत्युत मुदम् (वैराग्य० ५८), दुःख प्रकट करना चाहिये पर मूढ़ लोग इस के विपरीत प्रसन्नता प्रकट करते हैं। (२५) अकाण्डे* = अचिन्तित रूप से, अचानक—दर्भाङ्कुरेण चरणः क्षत इत्यकाण्डे तन्वी स्थिता कतिचिदेव पदानि गत्वा (शाकुन्तल० २.१३); कुछ कदम चल कर वह सुन्दरी कुशाङ्कुर से पांव छिल गया है इस का बहाना कर अचानक रुक गई । (२६-२७) चित्*, चन* । ये दोनों निपात प्रायः किसी भी विभक्त्यन्त या