भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 554

अव्यय-प्रकरणम् ५३६ गृहीत्वा (तर्कसंग्रह) । भूयोभूयः शरान् घोरान् विससर्ज महामृधे (रामायण० ६.४५.१४) । २. अधिक—रामभद्र ! उच्यतां किं ते भूयः प्रियमुपकरोमि (उत्तरराम० अन्ते) । इस अव्यय का वर्णन पीछे (पृष्ठ ५३२) स्वरादियों के आकृतिगणत्व के कारण परिगृहीत शब्दों में भी आ चुका है । [११] कूपत् ॥ १. प्रश्न या प्रशंसा में—कूपदयं गायति (गणरत्न०) । नोट—इस के प्रयोग अन्वेषणीय हैं । [१२] सूपत् ॥ १. प्रश्न या प्रशंसा में । इस का प्रयोग कहीं उपलब्ध नहीं हुआ । [१३] कुवित् ॥ १. बहुत—कुवित् सोमस्यापाम् (ऋ० १०.११६.१), मैं ने बहुत सोम पिया । नोट—इस के प्रयोग वैदिक साहित्य में बहुत हैं पर लोक में नहीं । [१४] नेत् ॥ १. ऐसा न हो—नेज्जिह्मायन्त्यो नरकं पताम (ऋ० खिलपाठ, ३.२२), ऐसा न हो कि कुटिल आचरण करती हुई हम नरक में पड़ जायें । नेच्छत्रुः प्राशं जयाति (अथर्व० २.२७.१), ऐसा न हो कि शत्रु हमारा भक्ष्य छीन ले । नोट—वेद में 'नेत्' का प्रयोग तो अनेक बार आया है परन्तु पदपाठकारों ने सर्वत्र 'न + इत्' ऐसा छेद ही माना है । अतः यह निपातसमुदाय है । [१५] चेत्* ॥ १. अगर, यदि—लोभश्चेदगुणेन किं पिशुनता यद्यस्ति किं पातकैः । सत्यं चेत्तपसा च किं शुचि मनो यद्यस्ति तीर्थेन किम् (नीति० ४४) । उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् (गीता० ३.२४) । अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्य- भाक् । साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः (गीता० ९.३०)। किमप्यहिंस्यस्तव चेन्मतोऽहं यशःशरीरे भव मे दयालुः (रघु० २.५७) । अथ चेत् (और अगर)—अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि । ततः स्वधर्मं कीर्तिञ्च हित्वा पापमवाप्स्यसि (गीता० २.३३) । नोट—इस अव्यय का प्रयोग वाक्य के आदि में नहीं होता । [१६] चण् ॥ १. यदि, अगर— इन्द्रश्च मृडयाति नः (नागेशद्वारा उद्धृत), इन्द्र यदि हमें सुखी करे । अयं च मरिष्यति (काशिका ८.१.३०), यदि यह मरेगा । नोट—इस निपात में णकार इत्संज्ञक है अतः उस का लोप हो कर 'च' ही अवशिष्ट रहता है । इस णित् 'च' निपात के योग में निपातैर्यद्-यदि-हन्त-कुविन्ने- च्चेच्चण्-कच्चिद्य-यत्र-युक्तम् (८.१.३०) सूत्र द्वारा तिङन्त को निघातस्वर का निषेध हो जाता है । समुच्चयाद्यर्थक पूर्वोक्त निरनुबन्ध 'च' से पृथक् रखने के लिये ही इसे णित् किया गया है । अतः पूर्वोक्त 'च' के योग में निघातस्वर का निषेध नहीं होता ।