लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
नोट—इस अव्यय के योग में भी पूर्ववत् चतुर्थी का विधान है। [५४] अलम्* ॥ १ भूषित करना सजाना—वाण्येका समलंकरोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते (नीति० १५) । अलङ्कृत्य सुतादानं दैवं धर्मं प्रचक्षते (मनु० ३।२८)१। २ पर्याप्त होना काफी होना समर्थ होना—तस्यालमेशा क्षुधितस्य तृप्त्यै (रघु० २।३६)। अहर्त्स्येन शमयितुमलं वारिधारासहस्रं (मेघ० २।५३) । अलम्मल्लो मल्लाय (काशिका)२ । ३ निषेध करना मना करना रोकना अलं महीपाल तव श्रमेण प्रयुक्तमप्यस्त्रमितो वृथा स्यात् (रघु० २।३४) । अलं हसितेन३। अलं बहु विकत्थ्य बहुत डींग न मारिये। अलम् अन्यथा गृहीत्वा अन्यथा ग्रहण न कीजिये । यहां के स्पष्टीकरण के लिये (८७८) सूत्र पर हमारी व्याख्या देखें । [५५-५७] वषट् । श्रौषट् । वौषट् ॥ १ देवताओ के निमित्त हविर्दान में—वषडस्तु तुभ्यम् (यजु० ११।३६) । अस्तु श्रौषट् पुरो अग्निम् (ऋ० १।१३६।१) । सोमस्याग्ने वीहि वौषट् (ऐतरेय ब्रा० ४।४।४६) । नोट—इन में से वषट् के योग में नमःस्वस्ति० (८६८) द्वारा चतुर्थी विभक्ति होती है । [५८] अन्यत ॥ १ अन्य पुनः इसके अतिरिक्त—देवदत्त आयातोऽन्यच्च यज्ञदत्तः (गण रत्न०) । प्रयोग अवेषणीय हैं । विभक्ति प्रतिरूपक अव्यय मान कर काम चल सकता है । [५६] अस्ति ॥ १ विद्यमान मौजूद—अतिधैर्य्यश्चैव राजा भार्या तथैव च । अस्ति नास्ति न जानन्ति देहि देहि पुनः पुनः (चाणक्य०) । अस्तिक्षीरा (अस्ति—विद्य मानं क्षीरमस्या ) गौ । अस्ति (विद्यमानं परलोक ) इति मतिरस्येत्यास्तिकः । अस्ति-नास्ति दिष्टं मति (४।४।६०) इति ठक् टस्येक (१०२४) इति ठस्येका देशः । अस्तित्वम् । नोट—इसे तिङन्तप्रतिरूपक अव्यय भी माना गया है । विशेष चादिगण में अस्ति क्षीरा शब्द पर देखें । १ यहां भूषणेऽलम् (१।४।६३) सूत्र से अलम् की गतिसंज्ञा होकर कुगति प्रादयः (६४६)द्वारा समास होकर समासेऽनञ्पूर्वे क्त्वो ल्यप्(८८४) से क्त्वा को ल्यप् हो जाता है । २ इस अर्थ में नमःस्वस्तिस्वाहा० (८६८) सूत्रस्थ अलमिति पर्याप्त्यर्थग्रहणम् (वा० ५२) वार्त्तिक से अलम् के योग में चतुर्थी विभक्ति होती है । ३ ऐसे स्थलों में अलम् के साथ तृतीया विभक्ति का प्रयोग होता है। इस के स्पष्टी करण के लिये इस व्याख्या के विभक्त्यर्थ परिशिष्ट में (२०) संख्या देखें ।