भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 542, कुल 633 में से

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पृष्ठ 542

अव्यय-प्रकरणम् ५२७ [६०] उपांशु ॥ उपांशु विजनेऽव्ययम् इति विश्वः । १. एकान्त—परिचेतुमुपांशु धारणां कुश- पूतं प्रवयास्तु विष्टरम् (रघु० ८.१८); रघु ने वृद्धावस्था को प्राप्त हो कर एकान्त में धारणा का अभ्यास करने के लिये कुशापवित्र आसन को ग्रहण किया । नोट—जिह्वोष्ठौ चालयेत् किञ्चिद् देवतागतमानसः । निजश्रवण-योग्यः स्यादुपांशुः स जपः स्मृतः । इस प्रकार का जप भी 'उपांशु' कहाता है परन्तु वह प्रायः उकारान्त पुंलिङ्ग होता है अव्यय नहीं । [६१] क्षमा ॥ १. क्षमा, माफ़ी—क्षमा करोतु भवान् (व्या० सि० सु०) । नोट—इस अव्यय के संस्कृतसाहित्य में प्रयोग अन्वेषणीय हैं । यदि इसे अव्यय मानना ही हो तो विभक्तिप्रतिरूपक माना जा सकता है, अथवा स्वरभेदार्थ यहां पाठ किया गया है । [६२] विहायसा ॥ १. आकाश—विहायसा पश्य विहङ्गराजम् (हेमचन्द्र) । विहायसा रम्यमितो विभाति (व्या० सि० सु०) । इस अव्यय के प्रयोग अन्वेषणीय हैं। संस्कृत में आकाश- वाचक तथा पक्षिवाचक सकारान्त विहायस् शब्द बहुत प्रसिद्ध है—विहायः शकुनौ पुंसि, गगने पुन्नपुंसकम्—इति मेदिनी । [६३] दोषा ॥ १. रात्रि— दोषापि नूनंमहिमांशुमसौ किलेति (माघ० ४.४६), रात्रि के समय भी वह (चन्द्र) सूर्य है ऐसा समझ कर । दोषामन्यम् अहः (महाभाष्य), घने बादलों या धुन्ध के कारण अपने आप को रात्रि समझने वाला दिन । यहां 'दोषा' के अव्यय होने से खित्यननव्ययस्य (८०६) से ह्रस्व नहीं होता । नोट—'दोषा' यह रात्रिवाचक आकारान्त स्त्रीलिङ्ग भी प्रयोग में देखा जाता है। यथा—ततः कथाभिः समतीत्य दोषाम् (भट्टि० २२.२४) । [६४] मृषा* ॥ असत्य, झूठ, मिथ्या । अयं दरिद्रो भवितेति वेधसो लिपिं ललाटेऽर्थिजनस्य जाग्रतीम् । मृषा न चक्रेऽल्पितकल्पपादपः प्रणीय दारिद्र्यदरिद्रतां नलः । (नैषध० १.१५) । मृषा मिथ्या च वितथे—इत्यमरः । [६५] मिथ्या* ॥ १.झूठ असत्य—मिथ्यैव व्यसनं वदन्ति मृगयामोदृग्विनोदः कुतः (शाकुन्तल० २.५) । २. व्यर्थ, बेकार—ज्योतिषं जलदे मिथ्या, मिथ्या श्वासिनि वैद्यकम् । योगो बह्वशने मिथ्या, मिथ्याज्ञानं च मद्यपे (समयोचित०) । [६६] मुधा ॥ १. व्यर्थ में—रात्रिः सैव पुनः स एव दिवसो मत्वा मुधा जन्तवः (वैराग्य० ४४)।

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