लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअव्यय-प्रकरणम् ५३१ नोट—वर्त्तमान उपलब्ध लौकिक वा वैदिकसाहित्य में हमें यह अव्यय कहीं नहीं मिला। दीक्षित आदि इसे प्रत्यय मानते हैं। उन का कथन है कि अमुं च च्छ- न्दसि (५.४.१२) सूत्र से विहित अम्प्रत्ययान्त की अव्ययसंज्ञा होती है। उदाहरण यथा—प्र तं नय प्रतरं वस्यसः (यजु० १२.२६) । परन्तु चाहे यहां 'अम्' से प्रत्यय भी समझ लें तो भी तद्धितश्चाऽसर्वविभक्तिः (३६८) से ही इस के अव्ययसंज्ञक हो जाने से यहां ग्रहण व्यर्थ सा प्रतीत होता है। [८३] आम् ॥ १. स्वीकृति या स्मृति द्वारा 'जी हां' के अर्थ में—आम् ! ज्ञातम् (शाकुन्तल० ३) । नोट—कई वैयाकरण यहां भी पूर्ववत् किमेत्तिङव्ययघादास्वद्रव्यप्रकर्षे (५.४.११) आदि सूत्रों से विहित आम्प्रत्ययान्तों की अव्ययसंज्ञा मानते हैं। [८४] प्रताम् ॥ १. ग्लानि—इस के उदाहरण अन्वेष्टव्य हैं। नोट—'प्रताम्' शब्द प्रपूर्वक तम् (तमूँ काङ्क्षायाम्) धातु से क्विप् प्रत्यय कर उपधादीर्घ (७२७) करने से निष्पन्न होता है। यहां सुब्लुक् हो जाने पर मो नो धातोः (२७०) से इस के मकार को नकार नहीं होता क्योंकि यदि ऐसा करना होता तो आचार्य इस गण में प्रशान् (प्रतान्) शब्दों को नकारान्त निर्दिष्ट न करते । [८५] प्रशान् ॥ १. तुल्य, सदृश, समान—प्रशान् देवदत्तो यज्ञदत्तेन (गणरत्न०) । नोट—इस के प्रयोग अन्वेषणीय हैं। कई वैयाकरण 'प्रशान्' के स्थान पर 'प्रशाम्' पाठ मानते हैं। कुछ अन्य लोग यहां 'प्रतान्' शब्द को भी पढ़ते हैं। [८६] मा* ॥ १. निषेध (मत) अर्थ में—मा जानीत विदर्भजामविदुषीम् (नैषध० १५.८६)। मा ब्रूहि दीनं वचः(नीति० ५१)। माऽसमीक्ष्य परं स्थानं पूर्वमायतनं त्यजेत् (हितोप० १.१०२) । मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि(गीता० २.४७)। २. 'ऐसा न हो' इस अर्थ में— मा कश्चिन्ममाप्यनर्थो भवेत् (पञ्च० ५), ऐसा न हो कि मुझ पर भी कोई अनर्थ आ पड़े। लघु एनां परित्रायस्व मा कस्यापि तपस्विनो हस्ते पतिष्यति (शाकुन्तल० २), शीघ्र ही इसे बचाइये ऐसा न हो कि यह किसी तपस्वी के हाथ में पड़ जाये । ३. धिक्कार—मा जीवन् यः परावज्ञादुःखदग्धोऽपि जीवति (माघ० २.४५), धिक्कार है उस के जीवन पर जो शत्रुओं से तिरस्कृत हुआ भी जीता है। नोट—कुछ वैयाकरण इस अव्यय को नहीं मानते केवल अग्रिम 'माङ्' को ही स्वीकार करते हैं। इस विषय का स्पष्टीकरण इस व्याख्या के द्वितीय-भागस्थ माङि लुङ् (४३५) सूत्र पर देखें। [८७] माङ्* ॥ १. मत—पापे रतिं मा कृथाः (भागवत० २.७७), पाप में प्रेम मत कर।