लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् लोगो ने अन्दर से भड़का कर चन्द्रगुप्त को कुपित कर दिया है। २ मध्य मे, बीच मे—त्रिशङ्कुरिव अन्तरा तिष्ठ (शाकुन्तल० २), त्रिशङ्कु की तरह मध्य मे लटके रहो। मैनम् अन्तरा प्रतिबघ्नध्व (शाकुन्तल० ६); इसे बीच मे मत टोको। नाश्नीयाच्चैव तयोरन्तरा (मनु० २ ५६) सवेरे-शाम दो भोजनो के मध्य मे कुछ न खाए। ३. अन्दर ही अन्दर —अक्षेत्रे बीजमुत्सृष्टमन्तरैव विनश्यति (मनु० १० ७१), अयोग्य खेत मे डाला गया बीज अन्दर ही अन्दर नष्ट हो जाता है। ४ बिना, बगैर— न प्रयोजन- मन्तरा चाणक्य स्वप्नेऽपि चेष्टते (मुद्रा०), प्रयोजन के बिना चाणक्य स्वप्न मे भी चेष्टा नहीं करता। ५ मार्ग मे, रास्ते मे—अन्तरा चारणेभ्यस्त्वदीय जयोदाहरणं श्रुत्वा त्वामिहस्थमुपागता. (विक्रमो० १), मार्ग मे ही चारणो से तुम्हारी यशोगाथा सुनकर तुम्हारे पास यहा आये हैं। ६ सदृश—न द्रक्ष्याम. पुनर्जातु धार्मिकं रामम- न्तरा (रामायण० २ ५७ १३) राम सदृश धार्मिक पुरुष फिर हम कभी नही देखेगे। नोट—अन्तराऽन्तरेणयुक्ते (२३४) सूत्रद्वारा अन्तरा के योग मे द्वितीया विभक्ति का विधान है। [४५] अन्तरेण*॥ १ बिना, बगैर—न राजापराधमन्तरेण प्रजास्वकालमृत्युश्चरति (उत्तरराम० २)। न चान्तरेण नाव तरीतु शक्येय सरित्। क्रियान्तरान्तरायमन्तरेण आर्यं द्रष्टु- मिच्छामि (मुद्रा० २), यदि किसी काम मे विघ्न न हो तो आप के दर्शन करना चाहता हू। २ मध्य मे, बीच मे, के विषय मे—त्वां माञ्चान्तरेण कमण्डलु. (महाभाष्य), तेरे और मेरे बीच कमण्डलु है। अथ भवन्तमन्तरेण कीदृशोऽस्या दृष्टिराग ? (शाकुन्तल० २), आप के विषय मे इस का चक्षूराग कैसा था? नोट—इस के योग मे भी पूर्ववत् द्वितीया का विधान है।¹ [४६] ज्योक् ॥ १ दीर्घ काल तक, लम्बे समय तक—ज्योक् च सूर्यं दृशे (ऋ० १ २३ २१)। सधैमापुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या (छान्दोग्योपनिषद् २.११.२)। नोट—यह अव्यय प्राय वैदिकसाहित्य मे प्रयुक्त देखा जाता है। [४७] कम् ॥ १. जल—कं (जले) जायत इति कञ्जम् (कमलम्)। कम् (जलम्) अल- करोतीति कमलम्। २ सुख—कम् =सुखम् अस्त्यस्येति कयु =सुखी। कशाभ्यां ष-भ-युस्-ति-तुन्त-यसः (५२१३८) इति मत्वर्थीयो युस्। सिति च (१.४.१६) इति पदत्वेनानुस्वारपरसवणौ। ३. सिर—क (शिरसि) जायन्त इति कञ्जा =केशा। १. अन्तराऽन्तरेणयुक्ते (२३४) सूत्र के भाष्य मे भाष्यकार ने अन्तरा और अन्तरेण को निपात माना है। परन्तु निपातसज्ञा करने के लिये तब इन का पाठ चादियो मे मानना होगा। अतः यहाँ स्वरादयो मे इन का पाठ प्रक्षिप्त समझना चाहिये