लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअव्यय-प्रकरणम् ५२६ [७१] मुहुस्* ।। १. पुनः पुनः, वार वार—ग्रीवाभङ्गाभिरामं मुहुरनुपतति स्यन्दने दत्तदृष्टिः (शाकुन्तल० १.७) । मुहुर्लक्ष्योद्भूदा मुहुरधिगमाभावगहना । मुहुः संपूर्णाङ्गी मुहु- रतिकृशा कार्यवशतः । मुहुर्भ्रश्यद्वीजा मुहरपि बहुप्रापितफलेत्यहो चित्राकारा नियतिरिव नीतिर्नयविदः (मुद्रा० ५.३) । मुहुर्मुहुः=वार वार—मुहुर्मुहुर्वारि पिवेदभूरि (सुभाषित) । [७२-७३] प्रवाहुकम् । प्रवाहिका ।। १. समानकाल, उसी समय । २. ऊर्ध्व । प्रवाहुकं गृह्णीयात् (गणरत्न०) । नोट—कई गणपाठों में 'प्रवाहुकम्' के स्थान पर 'प्रवाहिका' पाठ पाया जाता है । इन अव्ययों के प्रयोग अन्वेषणीय हैं । किसी कोष में इन का उल्लेख नहीं । ग्रहणीरोगवाची 'प्रवाहिका' शब्द टावन्त होता है । स्वामी दयानन्दसरस्वती ने 'प्रवाहुकम्' पाठ मान कर उस का 'प्रावल्य' अर्थ किया है । इस अर्थ में 'प्रवाहुक्' शब्द तो काठकसंहिता में देखा जाता है—देवा वा असुरान् यज्ञमभिजित्य ते प्रवाहुग्- ग्रहान् गृह्णाना आयन् (काठकसंहिता २६.६) । सम्भव है कि इस शब्द का किसी लुप्तशाखा में उल्लेख हो । [७४] आर्यहलम् ।। १. बलपूर्वक, जबरदस्ती—आर्यहलं गृह्णाति (गणरत्न०) । नोट—इस अव्यय के प्रयोग अन्वेषणीय हैं । [७५] अभीक्ष्णम्* ।। १. निरन्तर, वार वार, पुनः पुनः—क्षते प्रहारा निपतन्त्यभीक्ष्णम् (पञ्च० २.१६२) । [७६] साकम्* ।। १. के साथ—आस्स्व साकं मया सौधे माधिष्ठा निर्जनं वनम् (भट्टि० ८.७६) । साकं ग्रावगणैर्लुठन्ति मणयो बालार्कबिम्बोपमाः (भामिनी० १.४०) । नोट—साकम्, सार्धम्, समम्, सह आदि सहार्थक अव्ययों के योग में अप्रधान में सहयुक्तेऽप्रधाने (२.३.१६) द्वारा तृतीया विभक्ति का विधान है। [७७] सार्धम्* ।। १. के साथ—नाश्नीयाद् भार्यया सार्धं नैनामीक्षेत चाश्नतीम् (मनु० ४.४३)। वनं मया सार्धमसि प्रपन्नः (रघु० १४.६३) । [७८] नमस्* ।। १. नमस्कार—नमस्तत्कर्मभ्यो विधिरपि न येभ्यः प्रभवति (नीति० ६१) । येन धौता गिरः पुंसां विमलैः शब्दवारिभिः । तमश्चाज्ञानजं भिन्नं तस्मै पाणिनये नमः (पाणिनीयशिक्षा ५८) । नोट—इस अव्यय के योग में नमःस्वस्तिस्वाहा० (८६८) सूत्र द्वारा चतुर्थी विभक्ति का विधान है । इस अव्यय के 'अन्न, वज्र' आदि अन्य अनेक अर्थ भी वेद में प्रसिद्ध हैं । ल० प्र० (३४)