भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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५३९ श्रीमद्व्याकरणसिद्धांतां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् तद्धिताः (२८३) | दिवश्शिविते रा० (१५०) | सर्वत्र विभाषा ० (७६) तद्धितश्चाऽसर्व० (५०६) | दिश्चाऽनेकाल् (१७१) | सर्वनामस्थान दे० (२२८) तद्धितान्तः द्वित्त्वे० (८३) | दिश्चाऽप द्वित्त्वो (३३६) | सर्वनाम्नः स्मै (२६५) तुजादीनाम् दी० (५३३) | दिश्चाऽप तृतौ० (२६८) | सर्वनाम्नः स्या० (१६२) तृतीयप्रभृत्यन्य० (४०३) | दिश्चाऽप द्वित्त्व० (२३५) | सर्वादीनि सर्व० (१२३) तृतीयायाश्चास० (५६७) | दिश्चाऽनेकाल्शसर्वस्य (१६३) | सप्तम्यर्थे हलो (१८५) तृज्वत्क्रोश्टुनि (८२८) | दिश्चाऽल्प द्वयु० (११५) | सप्तम्यां मसि (८८५) तृज्वद्वि० द्वे० (२८८) | दिश्चद्वेर्नित्यमपि (१३६) | सहे श्चा० (३९३) तोस्लोपि (६०६) | दिश्चद्वेर्नित्यपदस्य (१६३) | साम्प्रत्यय ० (५३०) त् प्रत्यये (८०४) | दृष्टिाद्वेव (५३) | सात् प्रत्यय (४३१) | दृष्टिद्वेर्विवि (४७) | सादन्सुट् (३५६) [थ] | दृष्टानुगम्य (८०३) | सुट्प्रत्ययस्य (२१६) थशस्सा नाम् (३६६) | दृष्टवत्प्रत्य० (४१२) | सुँपि च (१७६) [द] | [ध] | सुँप् (१६५) दग्धस्य (२६६) | धन्वन्तोऽन् (३०७) | सुँडपुंसक० (३१) दन्तो ऽसिश्च (२०२.) | धन्वोऽसि (३६८) | सोऽचि नाऽसि ० (१५५) दद्धि (३५२) | धन्बोऽसि (११३) | सो न (३८५) दध्नोऽस्थि (२/६) | धन्वन् (२) | सप्तम्यामपञ्चम्य० (३५८) दध्नःसुटि (३६८) | धनी न (४६६) | सद्गटो न (२८६) दीर्घोऽतः समा० (८०३) | धन् (६६) | सद्गतो ऽन्य० (६१) [न] | धि तुँप् (१३०) | सद्गोऽन्यद० (४२) नॄन् (२) | धि सर्वनाम (३२१) | स्को संयोगा० (४१५) नश्चाऽपदान्तात्सि (२८६) | घेर्घे ऽन्तः (४२१) | स्फी.स्फुटा० (६८) नेर्लड् डाप्यप्रत्यये (५५) | धैर्यो यन्मसि (२२३) | स्मिता च (३१५) [प] | ध्वमुवम० (३१३) | स्मियाः (३१०) _ पदान्तान्यस्य (२००) | [न] | स्वर्निददा० (१२१) पर्णतृणादिभ्यो० (३६०) | नटवत्तुर्ण्यन्तस्य (३६६) | स्वश्चेतरद० (३३) पती ऽपत्यऽ० (५६१) | नढ्भ्यो लुक् (२३२) | सृष्टीतुद्वेके० (४६०) पा द्रहः (३५३) | नृन् षट् (१०१) | स्वमनादि० (२०५) पा ऽनुदात्तस्य (१०५) | नान्ता षट् (५००) | स्वसीर्णपुंस० (३०३) पात्तो ऽसि ० (४८) | [म] | स्वर्गतिनिरा० (५१५) पा पदान्तस्य (१०३) | मध्यमषष्ठौ (२३१) | स्वादिरसमदं० (२१६) पाऽस्यसि (३१३) | ममहान् स्व० (१५) | स्वीडनमोद्वे० (१६२) पाऽस्याऽसी (३१०) | मय् मसि (२४४) | [ह] पाऽस्याऽसि (१८३) | मय् मुटि (१३३) | हनश्चटूँ (२) पा ऽसि (१८६) | मयश्चाऽपिच० ।१६८) | हस्त्यपम् (५) पाद् षद् (३५३)