लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
पृष्ठ 612, कुल 633 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्टानि ५६७ हलि लोपः (३७३) | हल्ङ्याब्भ्यो० (२२६) | हो हन्तेर्० (३८७) हलि सर्वेषाम् (१४८) | हृणि च (१४६) | ह्रस्वनद्या० (१८५) हलोऽनन्तराः० (३१) | हे मपरे वा (१२३) | ह्रस्वस्य गुणः (२२२) हल् (२) | हो ढः (३४६) | ह्रस्वो नपुंस० (३३२) (५) परिशिष्ट—पूर्वार्धगत-वार्त्तिकादि-तालिका [यहाँ पूर्वार्धमूलगत वार्त्तिकों तथा उणादि, गण और इष्टिसूत्रों की तालिका दी गई है। इन के आगे इस ग्रन्थ की पृष्ठसंख्या निर्दिष्ट है।] अक्षादूहिन्याम्० (६१) | ओङः श्यां० (३२३) | प्रयम्लिङ्गं० (२४५) अध्वपरिमाणे च (४८) | गतिकारके० (२५६) | प्रवत्सतर० (६३) अनाम्नवति० (१०३) | ङावुत्तरपदे० (३८०) | प्रादूहोढो० (६१) अन्तरं बहिर० (१६३) | चयो द्वितीयाः० (१२८) | यणः प्रतिषे० (४४) अन्वादेशे नपुं० (४६६) | छत्वममीति (११८) | यवलपरे० (१२३) अस्य सम्बु० (४७०) | तीयस्य डित्सु० (२१०) | वृद्धचौत्व० (३३६) आकृतिगणो० (६७) | त्त्वक्तरपुनः० (२७३) | शकन्ध्वादिषु० (६७) उपसर्गविभक्ति० (५४५) | द्विपर्यन्तानाम्० (२४१) | समानवाक्ये० (४३६) ऋलृवर्णयोर्० (२०) | न समासे (६६) | संपुंकानां सो० (१३५) ऋते च तृती० (६२) | नुमचिर० (२६७) | संबुद्धौ नपुं० (४६६) ॠवर्णान्नस्य० (२७५) | परी व्रजेः पः० (४१४) | स्पर्शस्यैव इष्यते (१०१) एकरात्रप्रति० (३३१) | पूर्वपरावर० (१६३) | स्वमज्ञाति० (१६३) एते वान्नावाद० (४३७) | प्रत्यये भाषा० (१०८) | (६) परिशिष्ट—सुबन्त-शब्द-तालिका [निम्नस्थ शब्दों की रूपमाला तथा सुबन्तप्रक्रिया के लिये आगे पृष्ठसंख्या देखें।] अग्निमथ् (४३६) | अन्य (पुं०) (२००) | अष्टन् (४०१) अतिचमू (२६६) | अन्यतर (२००) | अस्मद् (४१६) अतिलक्ष्मी (२४८) | अपर (२०७) | अहन् (४६७) अदस् (पुं०) (४७३) | अप् (४८७) | आशिष् (४६१) अदस् (स्त्री०) (४६१) | अम्बा (२६७) | इतर (२०१) अदस् (नपुं०) (५१३) | अर्ध (२१०) | इदम् (पुं०) (३७०) अधर (२०८) | अर्यमन् (३६०) | इदम् (स्त्री०) (४८४) अनडुह् (३५८) | अर्वन् (३६६) | इदम् (नपुं०) (४६६) अनेहस् (४७१) | अल्प (२१०) | उखास्रस् (३६२) अन्तर (२०८) | अवर (२०७) | उत्तर (२०७)