भारतकोश
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लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

परिशिष्टानि ५६७ हलि लोपः (३७३) | हल्ङ्याब्भ्यो० (२२६) | हो हन्तेर्० (३८७) हलि सर्वेषाम् (१४८) | हृणि च (१४६) | ह्रस्वनद्या० (१८५) हलोऽनन्तराः० (३१) | हे मपरे वा (१२३) | ह्रस्वस्य गुणः (२२२) हल् (२) | हो ढः (३४६) | ह्रस्वो नपुंस० (३३२) (५) परिशिष्ट—पूर्वार्धगत-वार्त्तिकादि-तालिका [यहाँ पूर्वार्धमूलगत वार्त्तिकों तथा उणादि, गण और इष्टिसूत्रों की तालिका दी गई है। इन के आगे इस ग्रन्थ की पृष्ठसंख्या निर्दिष्ट है।] अक्षादूहिन्याम्० (६१) | ओङः श्यां० (३२३) | प्रयम्लिङ्गं० (२४५) अध्वपरिमाणे च (४८) | गतिकारके० (२५६) | प्रवत्सतर० (६३) अनाम्नवति० (१०३) | ङावुत्तरपदे० (३८०) | प्रादूहोढो० (६१) अन्तरं बहिर० (१६३) | चयो द्वितीयाः० (१२८) | यणः प्रतिषे० (४४) अन्वादेशे नपुं० (४६६) | छत्वममीति (११८) | यवलपरे० (१२३) अस्य सम्बु० (४७०) | तीयस्य डित्सु० (२१०) | वृद्धचौत्व० (३३६) आकृतिगणो० (६७) | त्त्वक्तरपुनः० (२७३) | शकन्ध्वादिषु० (६७) उपसर्गविभक्ति० (५४५) | द्विपर्यन्तानाम्० (२४१) | समानवाक्ये० (४३६) ऋलृवर्णयोर्० (२०) | न समासे (६६) | संपुंकानां सो० (१३५) ऋते च तृती० (६२) | नुमचिर० (२६७) | संबुद्धौ नपुं० (४६६) ॠवर्णान्नस्य० (२७५) | परी व्रजेः पः० (४१४) | स्पर्शस्यैव इष्यते (१०१) एकरात्रप्रति० (३३१) | पूर्वपरावर० (१६३) | स्वमज्ञाति० (१६३) एते वान्नावाद० (४३७) | प्रत्यये भाषा० (१०८) | (६) परिशिष्ट—सुबन्त-शब्द-तालिका [निम्नस्थ शब्दों की रूपमाला तथा सुबन्तप्रक्रिया के लिये आगे पृष्ठसंख्या देखें।] अग्निमथ् (४३६) | अन्य (पुं०) (२००) | अष्टन् (४०१) अतिचमू (२६६) | अन्यतर (२००) | अस्मद् (४१६) अतिलक्ष्मी (२४८) | अपर (२०७) | अहन् (४६७) अदस् (पुं०) (४७३) | अप् (४८७) | आशिष् (४६१) अदस् (स्त्री०) (४६१) | अम्बा (२६७) | इतर (२०१) अदस् (नपुं०) (५१३) | अर्ध (२१०) | इदम् (पुं०) (३७०) अधर (२०८) | अर्यमन् (३६०) | इदम् (स्त्री०) (४८४) अनडुह् (३५८) | अर्वन् (३६६) | इदम् (नपुं०) (४६६) अनेहस् (४७१) | अल्प (२१०) | उखास्रस् (३६२) अन्तर (२०८) | अवर (२०७) | उत्तर (२०७)

५६८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् उत्तरपूर्वा (२६४) | गोपा (२६८) | दशन् (४०४) उदच् (४४३) | गौरी (३०५) | दिव् (४८२) उदञ्च् (४४८) | ग्रामणी (२५३) | दिश् (४८६) उपानह् (४८१) | ग्लौ (२८४) | दीव्यत् (५०८) उभ (१६८) | घृतस्पृश् (४६१) | दुह् (३५१) उभय (१६६) | चतुर् (पु०) (३६६) | दृन्भू (२७२) उल्लू (२७१) | चतुर् (स्त्री०) (४८३) | दृश् (४८६) उशनस् (४७०) | चतुर् (नपु०) (४१५) | देवेज (४१३) उष्णिक् (४८१) | चरम (२०६) | द्यो (३१६) ऊर्ज् (५००) | चिकीर्षू (२६५) | द्रुह् (३५४) ऋत्विज् (४०६) | जक्षत् (४५५) | द्वि (पु०) (२४१) ऋभुक्षिन् (३६७) | जरा (२६७) | द्वि (स्त्री०) (३०५) एक (२०२) | ज्ञान (३२१) | द्वि (नपु०) (३३२) एकतर (३३१) | तद् (पु०) (४१८) | द्वितय (२०६) एतद् (पु०) (४१६) | तद् (स्त्री०) (४८६) | द्वितीय (२११) एतद् (स्त्री०) (४८७) | तद् (नपु०) (५००) | द्वितीया (२६६) एतद् (नपु०) (५०१) | तादृश (४१८) | धनुष् (५१०) कतर (पु०) (२००) | तादृश् (४५८) | धातृ (पु०) (२७४) कतर (नपु०) (३२८) | तिर्यञ्च् (४४६) | धातृ (नपु०) (३४१) कति (२३६) | तिर्य्यञ्च् (४४८) | धीमत् (४५१) कतिपय (२१०) | तुदत् (५०६) | धेनु (३१४) करभू (२७३) | तुरासाह् (३६२) | नवन् (४०४) किम् (पु०) (३६६) | त्यद् (पु०) (४१७) | नश् (४६०) किम् (स्त्री०) (४८४) | त्यद् (स्त्री०) (४८६) | निर्जर (२१२) किम् (नपु०) (४६६) | त्रि (पु०) (२४०) | नी (२५३) क्रुञ्च् (४४८) | त्रि (स्त्री०) (३०३) | नृ (२८०) क्रोष्टु (पु०) (२६२) | त्रि (नपु०) (३३३) | नेम (२१०) क्रोष्टु (स्त्री०) (३१५) | त्व (२०१) | नौ (३१६) गञ्ज् (४११) | दिग्पू (४६०) | पचत् (५०७) खलपू (२७०) | दक्षिण (२०७) | पञ्चन् (३६६) गिर् (४८२) | दण्डिन् (४६८) | पति (२३४) गुप् (४५७) | ददत् (पु०) (४५४) | पथिन् (३६७) गो (२८१) | ददत् (नपु०) (५०५) | पपी (२४३) गोअञ्च् (गतौ) (५०१) | दधि (३३८) | पयस् (५१२) गोअञ्च् (पूजा) (५०२) | दधृष् (४६१) | पयोमुच् (४४६) | | पर (२०७)

परिशिष्टानि ६०१ ५८८ परिव्राज् (४१४) यद् (पुं०) (४१८) श्री (३११) पर्णध्वस् (३६२) यद् (नपुं) (५०१) श्रीपा (३३१) पितृ (२७६) यवक्री (२५५) श्रेयस् (पुं०) (४६८) पिपठिष् (४६३) यशस्विन् (३६०) श्वन् (३६४) पुनर्भु (२७३) युज् (४०६) षष् (४६२) पुर् (४८३) युवन् (३६५) सखि (२२७) पुंस् (४६६) युष्मद् (४१६) सजुष् (४६०) पूर्व (२०७) रत्नमुष् (४६२) सध्रयच् (४४५) पूषन् (३८६) रमा (२८५) सध्रयञ्च् (४४८) प्रत्यच् (४४२) राजन् (३७६) सर्व (१६४) प्रत्यञ्च् (४४७) राज् (४११) सर्वा (२६२) प्रथम (२०६) राम (१६७) सिम (२०१) प्रद्यो (३४६) रै (पुं०) (२८३) सुखी (२५८) प्रधी (२४६) रै (स्त्री०) (३१६) सुती (२५८) प्ररै (३४७) लक्ष्मी (३०६) सुदिव् (३६३) प्रशाम् (३६६) लिहू (३४६) सुधी (पुं०) (२५७) प्राच् (४४१) वधू (३१७) सुधी (नपुं०) (३४०) प्राञ्च् (४४७) वर्षाभू (२७२) सुनां (३४८) प्रियत्रि (२४१) वाच् (४८७) सुपथिन् (४६६) बहुश्रेयसी (२४४) वारि (३३३) सुपाद् (४३८) ब्रह्मन् (३८४) वार् (४६५) सुपुंस् (५१३) भवत् (४५२) विद्वस् (४६६) सुयुज् (४१०) भवत् (४५२) विभ्राज् (४१२) सुलू (पुं०) (२७१) भूपति (२३५) विश् (४५६) सुलू (नपुं०) (३४३) भृज्ज (४१५) विश्व (१६७) सुश्री (२५४) भ्रातृ (२८०) विश्वपा (२१५) स्त्री (३१०) भ्रू (३१६) विश्वराट् (४१४) स्नुह् (३५५) मघवन् (३६१) विश्ववाह् (३५६) स्व (२०८) मति (२६६) विश्वसृज् (४१३) स्वनडुह् (४६४) मथिन् (३६७) वृत्रहन् (३८५) स्वभू (२७१) मधु (३४३) वेधस् (४७२) स्वयम्भू (३१७) महत् (४५०) शकृत् (५०५) स्वसृ (३१७) मातृ (३१८) शम्भु (२६०) हरि (२२१) मुहू (३५५) शार्ङ्गिन् (३८७) हाहा (२२०) यज्वन् (३८३) शुद्धधी (२५६) हूहू (२६६)

६०० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्

(७) परिशिष्ट-परिभाषा-न्यायादि-तालिका

[व्याख्या वा मूलगत परिभाषाओं, न्यायों, पक्तिकाओं तथा विशेष स्मरणीय वचनों की यहां तालिका दी जा रही है। ध्यान रहे कि इन को हृदयंगम कर लेने पर ही संस्कृत-व्याकरण में निष्णातता प्राप्त की जा सकती है।]

अकृतव्यूहाः पाणिनीया(४६७)इदमस्तु सन्निकृष्टे समीपतर०(३७०)
अक्षौहिणी-प्रमाणम्(६१)इह इङ्गितेन चेष्टितेन०(११६)
अङ्गवृत्ते पुनर्वृत्तौ अविधिर्०(४२८)ईषदर्थे क्रियायोगे मर्यादा०(६०)
अच परस्यैव झलो नुम्विधानम्(३२४)उणादिनिष्पन्नाना तृन्प्रत्ययान्ताना०(२७८)
अज्भीन परेण संयोज्यम्(४४)उत्तरोत्तर मुनीना प्रामाण्यम्(२१)
अत्र एव ज्ञापकादन्त्यस्य यण् ०(३६५)उद्भूतावयव-अनुद्भूतावयवसमु०(१६४)
अनिदेशः (मिहो मानवके )(२३२)उपदेश आद्योच्चारणम्(७)
'अथेवाणपरेण णकारेण' विवेचन(२६)उपसर्गविभक्तिस्वरप्रतिरूपकाश्च(५४५)
अनन्तरस्य विधिर्वा भवति प्रति०(४५३)उभयनिर्देशे पञ्चमीनिर्देशो०(१२६)
अनिन्सम्रग्रहणाम्यर्थवता चान०(३६०)एकतिङ् वाक्यम्(४३६)
अनुस्वार्यमाना च नासिका०(२१)एकदेशविकृतमनन्यवत्(२१४)
अनेकाल्पपरिभाषाविवेचन(७८)एकवचनमुत्सर्गंतः क्रियते(१६०)
अन्तरतमपरिभाषाविवेचन(३७)एका च सिकता तैलदाने०(४८८)
अन्तादिवद्भाव (अन्तादिवच्च)(७१)एकादेशः (एक पूर्वपरयो)(५१)
अन्यत्रान्यत्रलब्धावकाशयोर्(१५२)एतैर्व्यस्तैंर्यथासम्भव मिलितैश्च०(१७८)
'अन्वादेश' सोदाहरणविवेचन(३७७)कर्तव्योऽत्र यत्नः(६)
अपवादो वचनप्रामाण्यात्(१००)काच मणि वारुचनमेकसूत्रे०(३६३)
अप्प्रत्यये द्वयक्षर यदि(२६७)किञ्चित्कार्य विधातुमुपात्तस्य०(३७७)
अयोगवाहा विज्ञेया आश्रय०(२१)कृताकृतप्रसङ्गी यो विधि सः(३६४)
अर्धमात्रालाघवेन पुत्रोत्सव०(१३०)ङिब्वन्ता धातुत्व न जहति(२७०)
अलोऽन्त्यपरिभाषाविवेचन(४३)ङिब्वन्ता णिजन्ता षिङन्ता धातु०(३५२)
अवी-तन्त्र्यो स्त्री-लक्ष्मी०(३०६)गुणो दीर्घोत्त्वानापवादः(३०४)
अष्टम्य इति वक्तव्ये कृतात्व०(४०२)द्विस्परिभाषाविवेचन(७६)
असति माद्ग्रहणे एकारोऽप्यनु०(८७)चादिगणः(५३६)
असंयुक्ता ये ऽल्कास्तद्०(२६७)छन्दोवत्कवय कुर्वन्ति(२३६)
असिद्ध बहिरङ्गमन्तरङ्गे(१६८)छन्दोवत्सूत्राणि भवन्ति(७)
असिद्धाधिकारः (पूर्वत्रासिद्धम्)(५६)जजोर्मं(३८१)
'आकृतिगण' विवेचन(७०)जलबुम्बिकान्यायेन रेफस्यो०(५४)
आदे परस्य(११२)जश्त्वचर्वे (जश् तु अचर्वे)(१८४)
इतरेतराश्रयाणि कार्याणि न०(३५७)डित्वाभावेऽपि सिद्धेऽपि०(३३०)

परिशिष्टानि ६०१ तदन्तविधि (येन विधिरस्तदन्तस्य) (४२) पाणिनैनं नदी गङ्गा यमुना च० (३०६) तदादिविधि (यस्मिन्विधिस्तदा०) (४८) पूर्वत्रासिद्धमिति विभक्तिकार्यं० (४७५) तद्गुणसंविज्ञान-अतद्गुणसंविज्ञान (१७४) पूर्वत्रासिद्धम् (५६) तन्मध्यपतितस्तद्ग्रहणेन० (१५४) पूर्वत्रासिद्धे नास्ति विप्रतिषेधो० (४७६) तपरः (तपरस्तत्कालस्य) (५०) पूर्वंपरनित्यान्तरङ्गापवादानाम्० (३७५) तस्मादित्युत्तरस्य (१११) प्रकल्प्य चापवादविषयं ततः० (३५६) तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य (३५) प्रकृतिवदनुकरणं भवति (३३८) तुम्बिकातृणकाष्ठं च तैल० (५४) प्रतिज्ञानानुनासिकाः पाणिनीयाः (५३) तेन विनेति मर्यादा (६०) प्रतिज्ञास्वरिताः पाणिनीयाः (१११) तेन सहेत्यभिविधिः (६०) प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणम् (१६६) त्यदादिष्विति दृशेः क्विन्० (४८६) प्रत्ययलक्षणम् (प्रत्ययलोपे०) (२३८) त्रिमुनि व्याकरणम् (२१) प्रत्यर्थ शब्दः (१६६) देवदत्तस्य हन्तरि हते० (४७६) प्रत्ययात् पूर्वं क्रियत इति प्रकृतिः (१६१) द्विर्वद्धं सुवद्धं भवति (३२१) प्रवृत्तिनिमित्तम् (३४१) द्वौ नञौ तु समाख्यातौ० (३८) प्रसज्यप्रतिषेधः (३८) धातूपसर्गयोः कार्यमन्तरङ्गम् (७२) प्रातिपदिकग्रहणे लिङ्गविशिष्टस्या ०(२६२) न केवला प्रकृतिः प्रयोक्तव्या० (६६) ब्राह्मणवसिष्ठन्यायः (१५६) न पादादौ खल्वादयः (५४३) भावसप्तमीविवेचनम् (३६) नप्त्रादिग्रहणं व्युत्पत्तिपक्षे० (२७८) भाव्यमानोऽप्यण् क्वचित्सवर्णान्० (२६६) नरजानां संयोगः (५००) मित्रवदागमा भवन्ति (१२६) 'न लुमताङ्गस्य' विवेचन (२३६) यथा देवदत्तस्यैकः पुत्रः सः० (६७) 'न लुमताङ्गस्य' अनित्यत्वम् (३३५) यथासङ्ख्यविधिः (४७) न हि पिष्टस्य पेषणम् (१६२) यदागमास्तद्गुणीभूतास्तद्० (१६७) न हि सर्वः सर्वं जानाति . (२१) यस्मात्पूर्वं नास्ति परमस्ति० (३७४) नानर्थकेऽलोन्त्यविधिरनभ्यास० (३७३) यस्मात्पूर्वमस्ति परञ्च नास्ति० (३७४) नानुबन्धकृतमनेकाल्त्वम् (७६) यस्य येनार्थसम्बन्धः० (३६) निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्य० (३५५) यः शिष्यते स लुप्यमानार्था० (१६६) निरनुबन्धग्रहणे न सानु० (३६४) या पराऽनवकाशा च (२१८) निर्दिश्यमानस्यादेशा भवन्ति (२१३) युष्मदस्मत्षट्संज्ञकास्त्रिषु० (२४०) पदाङ्गाधिकारे तस्य च तद० (२१३) रपरविधिः (उरण्रपरः) (५३) परेणैवेणग्रहाः सर्वे० (२६) रेफोष्मणां सवर्णा न सन्ति (३१) पर्जन्यवल्लक्षणप्रवृत्तिः (६४) लक्षणप्रतिपदोक्तयोः प्रतिपदोक्त० (७८) पर्यायशब्दानां लाघवगौरवचर्चा० (१४३) लक्षणं विनैव निपतति लक्ष्येषु० (४०५) पर्युदास-प्रतिषेधः (३८) लण्सूत्रस्थावर्णेन सहोच्चार्य० (५२) पश्य मृगस्ते धावति (४३७) वष्टि भागुरिरल्लोपमवाप्योर् (५८०)

६०२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् वार्णादाङ्गं बलीय (४२२) संयोगान्तस्य लोपे हि० (२३०) विप्रतिषेधेऽपरं कार्यम् (२६७) संहितैकपदे नित्या० (३५) विप्रतिषेधे यद् बाधितं तद्० (२४८) सार्थकनिरर्थकयो ० (३६०) विषादप्यमृतं ग्राह्यम् (१७२) सिद्धे सत्यारम्भो नियमार्थ. (२३५) व्यपदेशिवद्भाव (३७५) सिंहो माणवक (२३२) व्यवस्थितविभाषा (८०) सुंडस्योह्वारेमारी जश्ट० (१६१) व्युत्पत्ति-अव्युत्पत्तिपक्ष (१६१) सूत्रशाटन्याय. (३५७) शत्रुवदादेशा भवन्ति (३८) सूत्रेष्वदृष्टं पदं सूत्रान्तराद० (५) संज्ञाविधौ प्रत्ययग्रहणे तदन्त० (१५६) स्थान-प्रयत्न-विवेक. (२१) सन्निपातलक्षणो विधिरनि० (२१५) स्थानषष्ठी (षष्ठी स्थानेयोगा) (३४) समुदायो ह्यर्थवान् तस्यैक० (२८८) स्थानिवद्भाव (स्थानिवदादेशो०)(१८४) समां वा लोपमेके (१३५) स्पर्दास्येवेष्यते (१०१) सम्बोधने तृशनसस्त्रिरूप० (४७१) स्वरादिगण. (५१५) सर्वापहारलोप (३४६) स्वाभिधेयापेक्षावधिनियमो० (२०३) सवर्णार्थमनिगन्तार्थं च (६६) हकारादिष्वकार उच्चारणार्थं (३)

** भैमी-प्रकाशन BHAIMI-PRAKASHAN प्राप्य वरान् निबोधत

● भैमीप्रकाशन के ग्रन्थों की नवीन मूल्यसूची ● वैद्य भीमसेन शास्त्री M.A. Ph. D. की मुद्रित अनुपम कृतियां (१) लघु-सिद्धान्त-कौमुदी भैमीव्याख्या प्रथम भाग । यह भाग पञ्च-सन्धि- षड्‌लिङ्ग-अव्ययप्रकरणात्मक है। यह द्वितीय बार मुद्रित हुआ है। इस नवीनतम संस्करण मे लेखक ने अनेक नये संशोधन वा परिवर्धन किये हैं। विषय को परिमा- र्जित तथा स्पष्ट करने के लिए सैकड़ों नये उदाहरण तथा दो सौ से अधिक नये शोध- पूर्ण फुटनोट तथा टिप्पण दिये गये हैं। अव्ययप्रकरण को पहले से लगभग दुगना कर दिया गया है। इस प्रकार प्रायः दो सौ पृष्ठों की ठोस सामग्री पूर्वापेक्षया इस संस्करण में अधिक संगृहीत है । अन्य भागों की तरह इस भाग को भी समानरूप में परिणत किया गया है। चार प्रकार के नवीन आधुनिक टाइपों के द्वारा सुन्दर शुद्धतम छपाई, अंग्रेजी पक्की सिलाई, स्क्रीनप्रिंटिड आकर्षक सम्पूर्ण कपड़े की मजबूत जिल्द । (२३ × ३६) ÷ १६ साइज के लगभग साढ़े छः सौ पृष्ठों का मूल्य केवल एक सौ रु० । (२) लघु-सिद्धान्त-कौमुदी भैमीव्याख्या द्वितीय भाग । इस भाग में तिङन्त- प्रकरण (दस गण तथा एकादश प्रक्रिया) की अत्यन्त विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत की गई है। ७५० पृष्ठों पर आश्रित यह महाकाय भाग वैयाकरणजगत् में अपना अपूर्व स्थान बना चुका है। इस का विशेष विवरण विस्तृत सूचीपत्र में देखें । पूर्ववत् सुन्दर छपाई, अंग्रेजी पक्की सिलाई, स्क्रीनप्रिंटिड कपड़े की मनोहर मजबूत जिल्द । मूल्य केवल एक सौ रु० । (३) लघु-सिद्धान्त-कौमुदी भैमीव्याख्या तृतीय भाग । इस भाग में कृदन्त और कारक प्रकरणों का विस्तृत वैज्ञानिक विवेचन प्रस्तुत किया गया है। सुप्रसिद्ध कृत्प्रत्ययों के लिये कई विशाल शब्दसूचियां अर्थ तथा समृद्धटिप्पणों के साथ बड़े यत्न से गुम्फित की गई हैं, जिन में अढ़ाई हज़ार से अधिक शब्दों का अपूर्व संग्रह है । प्रायः प्रत्येक प्रत्यय पर संस्कृतसाहित्य में से अनेक सुन्दर सुभाषितों या सूक्तियों का संकलन किया गया है। कारकप्रकरण लघुकौमुदी में केवल सोलह सूत्रों तक ही सीमित है जो स्पष्टतः बहुत अपर्याप्त है। भैमीव्याख्या में इन सोलह सूत्रों की विस्तृत व्याख्या करते हुए अन्त में अत्यन्त उपयोगी लगभग पचास अन्य सूत्र-वार्त्तिकों की भी सोदा- हरण सरल व्याख्या प्रस्तुत की गई है। इस प्रकार कुल मिलाकर कारकप्रकरण ५६ पृष्ठों में समाप्त हुआ है। अनेक प्रकार के उपयोगी परिशिष्टों सहित यह भाग लगभग चार सौ पृष्ठों में समाश्रित हुआ है। पूर्ववत् अङ्ग्रेजी पक्की सिलाई, स्क्रीनप्रिंटिड आकर्षक कपड़े की सम्पूर्ण जिल्द । मूल्य केवल पचास रु० । (४) लघु-सिद्धान्त-कौमुदी भैमीव्याख्या चतुर्थ भाग । इस भाग में समास, तद्धित तथा स्त्रीप्रत्यय प्रकरणों की नवीन शैली से विस्तृत व्याख्या की गई है। यह भाग शीघ्र उपलब्ध होगा ।

(५) अव्ययप्रकरणम् । लघुकौमुदी का अव्ययप्रकरण भैमीव्याख्यासहित पृथक् छपवाया गया है। इस में लगभग सवा पाच सौ अव्ययों का सोदाहरण साङ्गोपाङ्ग विवेचन प्रस्तुत किया गया है। प्रत्येक अव्यय पर वैदिक वा लौकिक संस्कृतसाहित्य से अनेक सुन्दर सुभाषितों वा सूक्तियों का संकलन किया गया है। कठिन सूक्तियों का अर्थ भी साथ में दे दिया गया है। आजतक इतना शोधपूर्ण परिश्रम इस प्रकरण पर पहली बार देखने में आया है। साहित्यप्रेमी विद्यार्थियों तथा शोध में लगे जिज्ञासुओं के लिये यह ग्रन्थ विशेष उपादेय है। सुन्दर अंग्रेजी सिलाई, आकर्षक जिल्द। मूल्य केवल पच्चीस रु० । (६) वैयाकरण-भूषणसार (धात्वर्थनिर्णय) भैमीभाष्य । इस हिन्दी भाष्य से इस ग्रन्थ की दुष्टता समाप्त हो गई है। अब परीक्षा में भूषणसार की पक्तियों को रटने की कोई आवश्यकता नहीं रही। सरल भाषा में लिखे इस ग्रन्थ का एक बार पारायण करना ही पर्याप्त है। देश-विदेश में समानरूप से आदृत यह ग्रन्थ विद्वत्समाज में अपना गौरवपूर्ण स्थान पा चुका है। मजिल्द मूल्य केवल तीस रुपये । (७) बालमनोरमा-भ्रान्ति-दिग्दर्शन । यह निबन्ध विद्वत्समाज की आंखो को खोलने वाला विलक्षण शोधपत्र है। एक बार पढ जाइये, ज्ञानवृद्धि के साथ साथ आप का मनोरञ्जन भी होगा। मूल्य केवल पांच रुपये । (८) प्रत्याहारसूत्रों का निर्माता कौन ? । इति माहेश्वराणि सूत्राणि—के अन्धविश्वासरूप तिमिर से मुक्त होने के लिये यह शोधपत्र प्रत्येक जिज्ञासु के लिये सङ्ग्रहणीय, मननीय तथा अभ्यसनीय है। अश्रुतपूर्वं दर्जनों प्रमाणों के आलोक में निश्चय ही वर्षो से छाया इस विषय का अज्ञान मिट जायेगा। मूल्य केवल बारह रु० । (६) न्यास-पर्यालोचन । यह ग्रन्थ व्याकरणसम्बन्धी सैकडो अछूत विषयो का आगार है। इस प्रकार का शोधपूर्ण प्रयत्न व्याकरणविषय पर प्रथम बार प्रकाशित हुआ है। इस के विषयवार वैशिष्ट्य के लिये पुस्तकसूची देखें। स्क्रीन प्रिंटिड सुन्दर जिल्द, पक्की अंग्रेजी सिलाई। मूल्य केवल एक सौ रु० । विद्यार्थियों तथा अध्यापको को विशेष कमीशन दिया जाता है। विस्तृत सूचीपत्र के लिए लिखें— भैमी प्रकाशन ५३७, लाजपतराय मार्केट, दिल्ली-११०००६

पुस्तक-सूची [ देश-विदेश के सैकड़ों विद्वानों द्वारा प्रशंसित संस्कृत व्याकरण के मूर्धन्य विद्वान् श्री वैद्य भीमसेन शास्त्री एम्० ए० पी० एच्० डी० द्वारा लिखित उच्चकोटि के अनमोल संग्रहणीय व्याकरणग्रन्थों की सूची ] १९८० १. लघुसिद्धान्तकौमुदी—भैमीव्याख्या (चार भाग) २. वैयाकरणभूषणसार—भैमीभाष्योपेत ३. बालमनोरमाभ्रान्तिदिग्दर्शन ४. प्रत्याहारसूत्रों का निर्माता कौन ? ५. न्यास-पर्यालोचन भैमी प्रकाशन ५३७, लाजपतराय मार्केट दिल्ली-११० ००६

“लघु-सिद्धान्त-कौमुदी—भैमीव्याख्या” [ वैद्य भीमसेन शास्त्री एम० ए०, पी० एच्० डी० कृत विश्लेषणात्मक भैमीनामक विस्तृत हिन्दी व्याख्या सहित ] प्रथम भाग लेखक के दीर्घकालिक व्याकरणाध्यापन का यह निचोड़ है। कौमुदी पर इस प्रकार की विस्तृत वैज्ञानिक विश्लेषणात्मक हिन्दी व्याख्या आज तक नहीं निकली। इस व्याख्या में प्रत्येक सूत्र का पदच्छेद, विभक्तिवचन, समास विग्रह, अनुवृत्ति अधिकार, सूत्रगत तथा अनुवर्तित प्रत्येक पद का अर्थ परिभाषाजन्य विशेषता अर्थ की निष्पत्ति, उदाहरण प्रत्युदाहरण तथा विस्तृत सिद्धि देते हुए छात्रों और अध्यापकों के मध्य आने वाली प्रत्येक शंका का पूर्णतया विस्तृत समाधान प्रस्तुत किया गया है। इस हिन्दी व्याख्या की देश-विदेश के डेढ़ सौ से अधिक विद्वानों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की है। स्थान-स्थान पर परिशिष्ट विषय के आलोडन के लिये बड़े यत्न से पर्याप्त विस्तृत अभ्यास सङ्गृहीत किये गये हैं। इस व्याख्या की रूपमालाओं से अनुवादोपयोगी लगभग दो हज़ार शब्दों का अर्थ सहित बृहत्सङ्ग्रह प्रस्तुत करते हुए णत्वप्रक्रियोपयुक्त प्रत्येक शब्द को चिह्नित किया गया है। आज तक लघुकौमुदी की किसी भी व्याख्या में ऐसी विशेषता दृष्टि- गोचर नहीं होती। व्याख्या की सबसे बड़ी विशेषता अव्ययप्रकरण है। प्रत्येक अव्यय के अर्थ का विस्तृत विवेचन करके उसके लिए विशाल संस्कृत वाङ्मय से किसी न किसी सूक्ति व प्रसिद्ध वचन को सङ्गृहीत करने का प्रयास किया गया है। अकेला अव्यय- प्रकरण ही लगभग साठ पृष्ठों में समाप्त हुआ है। एक विद्वान् समालोचक ने ग्रन्थ की समालोचना करते हुए यहां तक कहा था कि—“यदि लेखक ने अपने जीवन में अन्य कोई प्रणयन न कर केवल अव्यय-प्रकरण ही लिखा होता तो केवल यह प्रकरण ही उसे अमर करने में सर्वथा समर्थ था।” सन्धिप्रकरण में लगभग एक हज़ार अभूतपूर्व नये उदाहरण विद्यार्थियों के अभ्यास के लिए सङ्कलित किये गये हैं—उदाहरणार्थ अकेले ‘इको यणचि’ सूत्र पर ३५ नये उदाहरण दिये गये हैं। इस व्याख्या में ग्रन्थगत किसी भी शब्द की रूपमाला को तद्वत् नहीं लिखा गया प्रत्युत प्रत्येक शब्द एवं धातु की पूरी-पूरी सार्थ रूपमाला दी गई है। स्थान-स्थान पर समझाने के लिये नाना प्रकार के कोष्ठकों और चक्रों से यह ग्रन्थ ओत प्रोत है। इस प्रकार का यत्न व्याकरण के किसी भी ग्रन्थ पर अद्यावत् नहीं किया गया। यह व्याख्या छात्रों के लिए ही नहीं अपितु अध्यापकों तथा अनुसन्धान-प्रेमियों के लिए भी अतीव उपयोगी है। अन्त में अनुसन्धानोपयोगी कई परिशिष्ट दिये गये हैं। यह ग्रन्थ भारत-सरकार द्वारा सम्मानित हो चुका है। बृहदा- कार २०×२६—८ साइज के लगभग सात सौ पृष्ठों में इस व्याख्या का केवल पूर्वार्ध भाग समाप्त हुआ है। पूर्वार्ध भाग का लागत से भी कम मूल्य केवल तीस रुपया रखा गया है।

३ पाण्डीचरी स्थित अरविन्दयोगाश्रम का प्रमुख त्रैमासिक पत्र 'अदिति' इस व्याख्या के विषय में लिखता है— “जहां तक हमें ज्ञात है यह आधुनिक शैली से विश्लेषणपूर्वक विषय का मर्म समझाने वाली अपने ढंग की पहली व्याख्या है। व्याख्याकार ने भाष्यशैली में आधुनिक- व्याख्याशैली का पुट देकर सर्वांग सुन्दर व्याख्या प्रस्तुत की है। इस में मूल ग्रन्थ के एक-एक शब्द व विचार को पूरा-पूरा खोल कर पाठकों के हृदय पर अंकित कर देने का सुन्दर यत्न किया गया है। विद्वान् व्याख्याकार ने लघुसिद्धान्त-कौमुदी की भैमी- नामक सर्वांगपूर्ण व्याख्या प्रकाशित कर के राष्ट्रभाषा की महान् सेवा की है। व्याकरण में प्रवेश के इच्छुक छात्र, व्युत्पन्न विद्यार्थी, जिज्ञासु, व्याकरणप्रेमी, अध्यापक और अन्वेषक सभी के लिये यह ग्रन्थरत्न एक-सा उपयोगी सिद्ध होगा।” हिन्दी के प्रमुख मासिक पत्र 'सरस्वती' की सम्मति— “लघुकौमुदी पर अब तक हिन्दी में कोई विश्लेषणात्मक व्याख्या नहीं निकली है। प्रस्तुत व्याख्या की लेखनशैली, क्लिष्ट स्थलों का विस्तृत उद्घाटन तथा सूत्रों की प्राञ्जल व्याख्या प्रत्येक संस्कृतप्रेमी पाठक पर अपना प्रभाव डाले बिना नहीं रह सकेगी। पुस्तक न केवल विद्यार्थियों वरन् संस्कृत का अध्ययन करने वाले सभी लोगों के लिये संग्रहणीय है।” उत्तर भारत का प्रमुख पत्र 'नवभारत टाइम्स' लिखता है कि— “लेखक महोदय ने कई वर्षों के कठोर परिश्रम के पश्चात् यह ग्रन्थ तैयार किया है जो उपयोगी है। ग्रन्थकर्ता स्वयं विद्याव्यसनी हैं और विद्याप्रसार ही उनके जीवन की लगन है। हमें पूरी-पूरी आशा है कि आबाल-वृद्ध संस्कृत-प्रेमी इस ग्रन्थरत्न को अपनाकर परिश्रमी लेखक के इस प्रकार अन्य भी अपूर्व ग्रन्थ प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त करेंगे।” दिल्ली का प्रमुख हिन्दी दैनिक 'हिन्दुस्तान' लिखता है— “वैसे तो कौमुदी की अनेक हिन्दी टीकाएं निकल चुकी हैं; मगर इस व्याख्या की अपनी विशेषताएं हैं। इसमें व्याकरण शास्त्र के अध्ययन-अध्यापन के आधुनिक तरीकों का सहारा लिया गया है। सूत्रार्थ और अभ्यास इसी के उदाहरण हैं। लघु- कौमुदी में आये प्रत्येक सूत्र की अर्थविधि को जानने के बाद विद्यार्थी को वृत्ति घोटने की आवश्यकता न रहेगी। वह सूत्रार्थ समझ कर स्वयमेव उसकी वृत्ति तैयार करने योग्य हो सकेगा। लघुकौमुदी के आये प्रत्येक शब्द के रूप देकर टीकाकार ने शब्द- रूपावली का पृथक् रखना व्यर्थ कर दिया है। इसी सिलसिले में करीब दो हज़ार शब्दों की अर्थसहित सूची देकर टीकाकार ने इस विशेषता को चार चाँद लगा दिये हैं। अव्यय प्रकरण इस पुस्तक की पांचवी बड़ी विशेषता है—। यह हिन्दी टीका विद्यार्थियों के लिए उपयोगी है। एक बार अध्यापक से पढ़ने के बाद वे इस टीका के सहारे बड़े आराम से पुनरावृत्ति कर सकते हैं। उन्हें ट्यूटर रखने की आवश्यकता न रहेगी।

यह टीका उनके लिए ट्यूटर का काम करेगी। आशा है कि संस्कृत व्याकरण का अध्यापन करने वाली संस्थाएं इस ग्रन्थ का हृदय से स्वागत करेंगी।' राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पदवाक्यप्रमाणज्ञ, स्व० श्री पं० ब्रह्मदत्त जी जिज्ञासु, आचार्य पाणिनि महाविद्यालय काशी की सम्मति— "मैंने लघुसिद्धान्तकौमुदी पर श्रीभीमसेनशास्त्रिकृत भैमीव्याख्या सूक्ष्मरीत्या देखी है। काश ! कि शास्त्री जी ने ऐसी व्याख्या अष्टाध्यायी पर लिखी होती। परन्तु इतना मैं निःसन्देह कह सकता हूँ कि इस प्रकार विशद स्पष्ट और सर्वांगीण व्याख्या लघुकौमुदी पर पहली बार देखने को मिली है। इस व्याख्या में अष्टाध्यायी पद्धति का जो पदे-पदे मण्डन किया गया है उसे देख कर मुझे अपार हर्ष होता है।" अनुसन्धानविद्यानिष्णात डॉ० वासुदेवशरण जी अग्रवाल की सम्मति— "मैंने लघुसिद्धान्तकौमुदी पर श्रीभीमसेन शास्त्री जी की विशद भैमीव्याख्या का अवलोकन किया। यह व्याख्या मुझे बहुत पसन्द आई। ऐसा स्तुत्य परिश्रम हिन्दी भाषा के माध्यम द्वारा ही सर्वप्रथम प्रकट हुआ है। यह व्याख्या कठिन से कठिन विषय को भी अत्यन्त सरलशैली से हृदयङ्गम कराने में सफल हो सकी है। प्रश्न-उत्तर, शंका-समाधान, सूत्रार्थ का स्फोटन करते समय स्थान-स्थान पर परिभाषाओं का उपयोग, अविकल रूपावलियां, सार्थ शब्दसंग्रह तथा परिश्रम से जुटाए गये अभ्यास आदि इस व्याख्या की अपनी विशेषताएं हैं। अव्ययप्रकरण का निसार प्रथम बार इस में देखने को मिला है। व्याकरण के ग्रन्थों पर इस प्रकार की व्याख्याएं निःसन्देह प्रशंस- नीय हैं। यदि शास्त्री जी इस प्रकार की व्याख्या सिद्धान्त-कौमुदी पर भी लिखें तो छात्रों और अध्यापकों का बहुत उपकार होगा। मैं हृदय से इस ग्रन्थ के प्रचार एवं प्रसार की कामना करता हूँ।"

“लघु-सिद्धान्त-कौमुदी—भैमीव्याख्या” (द्वितीय भाग—तिङन्तप्रकरण) लघु-सिद्धान्त-कौमुदी के इस भाग में दश गण और एकादश प्रक्रियाओं की विशद व्याख्या प्रस्तुत की गई है। तिङन्तप्रकरण व्याकरण की पृष्ठास्थि (Backbone) समझा जाता है। क्योंकि धातुओं से ही विविध शब्दों की सृष्टि हुआ करती है। अतः इस भाग की व्याख्या में विशेष श्रम किया गया है। लगभग दो सौ ग्रन्थों के आलोड़न से इस भाग की निष्पत्ति हुई है। प्रत्येक सूत्र के पदच्छेद, विभक्तिवचन, समासविग्रह, अनुवृत्ति, अधिकार, प्रत्येक पद का अर्थ, परिभाषाजन्य वैशिष्ट्य, अर्थनिष्पत्ति, उदा- हरण-प्रत्युदाहरण और सारसंक्षेप के अतिरिक्त प्रत्येक धातु के दसों लकारों की रूप- माला सिद्धिसहित दिखाई गई है। वैयाकरणनिकाय में सैकड़ों वर्षों से चली आ रही अनेक भ्रान्तियों का सयुक्तिक निराकरण किया गया है। भाषा-विज्ञान के क्षेत्र में विद्यार्थियों के प्रवेश के लिए यत्र-तत्र अनेक भाषावैज्ञानिक नोट्स भी दिये हैं। चार

५ सौ से अधिक सार्थ उपसर्गयोग तथा उनके लिए विशाल संस्कृतसाहित्य से चुने हुए एक सहस्र से अधिक उदाहरणों का अपूर्व संग्रह प्रस्तुत किया गया है। लगभग डेढ़ हज़ार रूपों की ससूत्र सिद्धि और एक सौ के करीब शास्त्रार्थ और शंका-समाधान इसमें दिये गए हैं। अनुवादादि के सौकर्य के लिए छात्रोपयोगी णिजन्त, सन्नन्त, यङन्त, भावकर्म आदि प्रक्रियाओं के अनेक शतक और संग्रह भी अर्थसहित दिए गए हैं। जैसे नानाविध लौकिक उदाहरणों से प्रक्रियाओं को इसमें समझाया गया है वैसे अन्यत्र मिलना दुर्लभ है। इससे प्रक्रियाओं का रहस्य विद्यार्थियों को हस्तामलकवत् स्पष्ट प्रतीत होने लगता है। अन्त में अनुसन्धानोपयोगी छः प्रकार के परिशिष्ट दिये गए हैं। ग्रंथ का मुद्रण आधुनिक बढ़िया मैप्लीथो कागज़ पर अत्यन्त शुद्ध व सुन्दर ढंग से पांच प्रकार के टाइपों में किया गया है। सुन्दर, बढ़िया, सम्पूर्ण कपड़े की जिल्द तथा पक्की अंग्रेजी सिलाई ने ग्रन्थ को और अधिक चमत्कृत कर दिया है। यह ग्रन्थ भी भारत सरकार से सम्मानित हो चुका है। यह भाग २३ × ३६ ÷ १६ आकार के ७५० पृष्ठों में समाप्त हुआ है। मूल्य लागत से भी कम केवल तीस रुपये । इस भाग के विषय में श्री पं० चारुदेव जी शास्त्री पाणिनीय लिखते हैं— "इतनी विस्तृत व्याख्या आज तक कभी नहीं हुई। यह अद्वितीय ग्रन्थ है । यह व्याख्या न केवल बालकों अपितु उपाध्यायों के लिए भी उपयोगी है। शब्दसिद्धि सर्वत्र स्फटिकवत् स्फुट और हस्तामलकवत् प्रत्यक्ष, परिपूर्ण और असन्दिग्ध है कि इस के ग्रहण के लिए अध्यापक की अपेक्षा नहीं रहती। कौमुदीस्य प्रत्येक धातु की अविकलरूपेण सूत्राद्युपन्यासपूर्वक सविस्तर सिद्धि दी गई है। व्याख्यांश में भी यह कृति अत्यन्त उपकारक है। स्थान-स्थान पर धात्वर्थप्रदर्शन के लिए साहित्य से उद्धरण दिये गये हैं। धातूपसर्गयोग को भी बहुत सुन्दर काव्यनाटकों से उद्धृत उदाहरणों से स्पष्ट किया गया है। यह इस कृति की अपूर्वता है। इस व्याख्या के प्रणयन में शास्त्री जी ने अथाह प्रयत्न किया है। महाभाष्य, न्यास, पदमञ्जरी आदि का वर्षों तक अव- गाहन करके उन्होंने यह व्याख्या लिखी है—।" इस भाग के विषय में दिल्ली का नवभारत टाइम्स लिखता है— “संस्कृत व्याकरण के अध्ययन में कौमुदी ग्रन्थों का अपना स्थान है। प्रायः लघुकौमुदी से ही व्याकरण का आरम्भ किया जाता है। परन्तु इस ग्रन्थ का समझना आसान नहीं है। छात्रों के लिए यह ग्रन्थ वज्र के समान कठोर है। प्रस्तुत ग्रन्थ में श्रीभीमसेनशास्त्री ने इस की हिन्दी व्याख्या की है। व्याख्याकार राजधानी के सुप्रसिद्ध वैयाकरण हैं। इस व्याख्या को देखकर हम दावे के साथ कह सकते हैं कि ऐसी व्याख्या लघु तो क्या, सिद्धान्तकौमुदी की भी नहीं प्रकाशित हुई । इस व्याख्या का प्रथम भाग आज से बीस वर्ष पूर्व प्रकाशित हुआ था। तब इसका भारी स्वागत हुआ था । जनता को उस के उत्तरार्द्ध भाग की व्याख्या की तभी से उत्कट लालसा रही है। लेखक ने अब इसे प्रकाशित कर जहां छात्रों का उपकार किया है, वहां शिक्षकों, प्राध्यापकों को भी उपकृत किया है। इस में लेखक का गहन अध्ययन, कठोर परिश्रम

तथा विद्वत्ता स्थान-स्थान पर प्रकट होते ही हैं। छात्रोपयोगी किसी भी विषय का विवेचन छोड़ा नहीं गया। यह इस की बड़ी भारी विशेषता है। इस भाग मे तिङन्त- प्रकरण (दशगण तथा एकादश प्रक्रियाओं) का अत्यन्त विशद विवेचन प्रस्तुत किया गया है। यह प्रकरण धातुसम्बन्धी होने से व्याकरण का प्राण है। इस मे प्रत्येक धातु के दस लकारों की ससूत्र प्रक्रिया साध कर उनकी सारी रूपमाला भी दी गई है। इससे विद्यार्थियों को धातुरूपावलियो की आवश्यकता नहीं रहती। छ सौ के करीब टिप्पणियां तथा साढे चार सौ से अधिक उपसर्गयोग इस ग्रन्थ की अपनी अपूर्व विशेषता है। इन के लिए व्याख्याकार ने महान् श्रम कर विपुल संस्कृत-साहित्य से जो डेढ़ हजार के करीब अत्यन्त सुन्दर संस्कृत की सूक्तियों का चयन किया है। यह स्तुत्य है। सैकड़ों उपयोगी शङ्का समाधान तथा णिजन्त, सन्नन्त, यङन्त भावकर्म आदि अर्थ सहित कई शतर विद्यार्थियों के लिए निश्चय ही उपयोगी सिद्ध होंगे। इस ग्रन्थ की उत्कृष्टता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि अकेली भूधातु पर ही विद्वान् व्याख्याकार ने ६० पृष्ठों मे अपनी व्याख्या पूर्ण की है। सक्षेप मे इस व्याख्या को लघुकौमुदी का महाभाष्य कह सकते हैं। यह ग्रन्थ न केवल छात्रो, परीक्षार्थियो तथा उपाध्यायो, अध्यापकों के लिए उपयोगी सिद्ध होगा बल्कि अनुसंधान मे रुचि रखने वालों के लिए भी परमोपयोगी एव सहायक सिद्ध होगा। इसे पढ़ने से जहा व्याकरण जैसे शुष्क विषय मे सरसता पैदा होती है वहा अनुसंधान कार्य को भी बढ़ावा मिलता है। हिन्दी मे ऐसे ग्रन्थ स्वागत योग्य हैं।" (२६.८.७१) “लघु-सिद्धान्त-कौमुदी—भैमीव्याख्या” (तृतीय एव चतुर्थ भाग—प्रेस मे) भैमीव्याख्या के अन्तिम तृतीय तथा चतुर्थ भाग शीघ्र छपने जा रहे हैं। तृतीय भाग मे कृदन्त और कारक एव चतुर्थ भाग मे समास तद्धित और स्त्रीप्रत्यय का विस्तृत वैज्ञानिक तुलनात्मक विवेचन किया गया है। कृदन्तप्रकरण में तव्यत्-अनीयर् प्रत्ययान्तों, क्त्वाप्रत्ययान्तों, ल्यबन्तो और तुमुन्नन्ता की सार्थ विस्तृत तालिका देखते ही बनती है। क्त और क्तवतु प्रत्ययान्ता की तालिका भी बडे यत्न से संग्रहीत की गई है। यह भाग काव्यादि के सुन्दर उदाहरणा से यत्र तत्र ओत प्रोत है। स्थान- स्थान पर अनुसंधानापयोगी विशेष टिप्पण और शङ्का-समाधान दिये गय हैं। कारक- प्रकरण को पर्याप्त लम्बा और स्पष्ट किया गया है। इस के स्पष्टीकरणार्थ मूलाति- रिक्त अन्य अनेक सूत्र भी सार्थ सोदाहरण दिये गय हैं। इस प्रकरण का छात्रोपयोगी शुद्धाशुद्धविवेचन विशेष उपयोगी ह। समास और तद्धितप्रकरण का इतना विस्तृत व्याख्यान पहली बार इस व्याख्या मे उपलब्ध हुआ है। प्रत्येक प्रकरण के अन्त मे अभ्यास दिये गये हैं। स्त्रीप्रत्ययों पर छात्रोपयोगी विस्तृत तालिका इस व्याख्या की अपनी विशेषता ह। ग्रन्थ के अन्त मे अनुसंधानापयोगी नाना प्रकार के परिशिष्ट बड़े काम की वस्तु हैं।

७ "वैयाकरण-भूषण-सार-भैमीभाष्योपेत" (धात्वर्थनिर्णयान्त) वैयाकरण-भूषणसार वैयाकरणनिकाय में लब्धप्रतिष्ठ ग्रन्थ है। व्याकरण के दार्शनिक सिद्धान्तों के ज्ञान के लिये इस का अपना महत्त्वपूर्ण स्थान है। अतएव एम्० ए०, आचार्य, शास्त्री आदि व्याकरण की उच्च परीक्षाओं में यह पाठ्यग्रन्थ के रूप में स्वीकृत किया गया है। परन्तु इस ग्रन्थ पर हिन्दी भाषा में कोई भी सरल व्याख्या आज तक नहीं निकली—हिन्दी तो क्या अन्य भी किसी प्रान्तीय व विदेशी भाषा में इसका अनुवाद तक उपलब्ध नहीं। विश्वविद्यालयों के छात्र तथा उच्च कक्षाओं में व्याकरण विषय को लेने वाले विद्यार्थी प्रायः सब इस ग्रन्थ से त्रस्त थे। परन्तु अब इस के विस्तृत आलोचनात्मक सरल हिन्दीभाष्य के प्रकाशित हो जाने से उनका भय जाता रहा। छात्रों व अध्यापकों के लिये यह ग्रन्थ समानरूपेण उपयोगी है। इस ग्रन्थ के गूढ़ आशयों को जगह-जगह वक्तव्यों व फुटनोटों में भाष्यकार ने भली भांति व्यक्त किया है। भैमीभाष्यकार व्याकरणक्षेत्र में लब्धप्रतिष्ठ विद्वान् हैं, तथा वर्षों से व्याकरण के पठनपाठन का अनुभव रखते हैं। अतः छात्रों व अध्यापकों के मध्य आने वाली प्रत्येक छोटी-से-छोटी समस्या को भी उन्होंने खोलकर रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी। जगह-जगह वैयाकरणों और मीमांसकों के सिद्धान्त को खोलकर तुलनात्मक- रीत्या प्रतिपादित किया गया है। इस भाष्य की महत्ता इसी से व्यक्त है कि अकेली दूसरी कारिका पर ही विद्वान् भाष्यकार ने लगभग साठ पृष्ठों में अपना भाष्य समाप्त किया है। विषय को समझाने के लिये अनेक चार्ट दिये गये हैं जैसे—वैयाकरणों और नैयायिकों का बोधविषयक चार्ट, धातु की साध्यावस्था और सिद्धावस्था का चार्ट, प्रसज्य और पर्युदास प्रतिषेध का चार्ट आदि। पूर्वपीठिका में भाष्यकार ने व्याकरण के दर्शन- शास्त्र का विस्तृत क्रमबद्ध इतिहास देकर मानो सुवर्ण में सुगन्ध का काम किया है। ग्रन्थ के अन्त में अनुसन्धानप्रेमी छात्रों के लिये सात परिशिष्ट तथा आदि में विस्तृत विषयानुक्रमणिका दी गई है जो अनुसन्धान-क्षेत्र में अत्यन्त काम की वस्तु हैं। वस्तुतः व्याकरण में एक अभाव की पूर्ति भाष्यकार ने की है। इस भाष्य की प्रशंसा में देश- विदेश के विद्वानों के प्रशंसा-पत्र धड़ाधड़ आ रहे हैं। भारत सरकार द्वारा यह ग्रन्थ सम्मानित हो चुका है। ग्रन्थ का मुद्रण बढ़िया मैपलीथो कागज़ पर अत्यन्त शुद्ध व सुन्दर ढंग से छः प्रकार के टाइपों में किया गया है। सुन्दर बढ़िया सम्पूर्ण कपड़े की जिल्द तथा पक्की अंग्रेजी सिलाई ने ग्रन्थ को और अधिक चमत्कृत कर दिया है। मूल्य २५ रुपये। "नवभारत टाइम्स" इस ग्रन्थ की आलोचना करता हुआ लिखता है— "ग्रन्थ के भावों और गूढ़ आशयों को व्यक्त करने वाले पदे-पदे वक्तव्यों और पादटिप्पणों से लेखक का गम्भीर अध्ययन व श्रम स्पष्ट झलकता है। पञ्चमी और त्रयोदशी कारिकाओं पर अकर्मक और सकर्मक धातुओं के लक्षण का आशय जैसा इस भाष्य में स्पष्ट किया गया है अन्यत्र देखने को नहीं मिलता। इस तरह के अन्य भी

८ शतशः स्थल उदाहरण रूप में प्रस्तुत किये जा सकते हैं। शास्त्रीजी की शैली अध्येताओं व पाठकों के मन में उत्पन्न होने वाली सम्भावित शंकाओं को बटोर-बटोर कर ध्वस्त करने की क्षमता रखती है। द्वितीय कारिका की व्याख्या का लगभग सत्तर पृष्ठों में समाप्त होना ज्वलन्त प्रमाण है। हिन्दी में इस प्रकार के यत्न स्तुत्य हैं।' (६ मार्च, १९६६) बम्बई विश्वविद्यालय के संस्कृतविभाग के अध्यक्ष डाक्टर त्र्यम्बक गोविन्द माईणकर लिखते हैं— 'Students of Grammar will always remain indebted to Bhim Sen Shastriji for his very valuable help available in his commentary I wish Bhim Sen Shastriji writes similar commentaries on other works in the field of Grammar and renders service both to the sub- ject of his love and to the world of students and scholars I once again congratulate him ' अर्थात् श्रीभीमसेन शास्त्री के इस बहुमूल्य व्याख्यान को पाकर व्याकरण के विद्यार्थी उन के सदा ऋणी रहेंगे। मैं चाहता हूँ कि शास्त्री जी इस प्रकार की व्याख्यायें व्याकरण के अन्य ग्रन्थों पर भी प्रकाशित करते हुए विद्यार्थियो तथा अनुसन्धानप्रेमियों का उपकार करेंगे। मैं शास्त्री जी को उनके इस कार्य के लिए पुनः बधाई देता हू। डा० सत्यव्रत जी शास्त्री व्याकरणाचार्य, प्रोफेसर एव संस्कृतविभागाध्यक्ष, दिल्ली विश्वविद्यालय लिखते हैं— “वैयाकरणभूषणसार ग्रन्थ के क्लिष्ट शब्दावली में लिखा होने के कारण विद्यार्थियों को इसे समझने में बहुत कठिनाई हो रही थी। इसी कठिनाई को दूर करने की सदिच्छा से प्रेरित हो सुप्रसिद्ध वैयाकरण पं० भीमसेन शास्त्री ने हिन्दी में इसकी सरल और सुबोध व्याख्या लिखी है। शास्त्री जी का व्याकरणशास्त्र का अध्ययन अति गहन है। विषय स्पष्टातिस्पष्ट हो, इस विषय में सतत उद्योगशील रहे हैं। इसका यह परिणाम है कि उन की व्याख्या में गहराई भी है और विशदता भी। यह व्याख्या विद्वानों के लिए एव विद्यार्थियों के लिए एक समान उपयोगी है।” स्व० श्री पण्डित कुवेरदत्तजी शास्त्री व्याकरणाचार्य प्रिंसिपल श्री राधाकृष्ण संस्कृतमहाविद्यालय, खुर्जा लिखते हैं— “वैयाकरणभूषणसार पर विशद भैमीभाष्य को पाकर मुझे बडी प्रसन्नता हुई। ऐसा परिश्रम हिन्दी में प्रथम बार हुआ है। यह भाष्य न केवल विद्यार्थियों व परीक्षार्थियों के लिए अपितु अध्यापकों के लिए भी अत्यन्त उपयोगी है। व्याख्यान की शैली नितान्त हृदयहारिणी तथा स्तुत्य है। व्याकरण के अन्य दार्शनिक ग्रन्थों की भी इसी शैली में उन्हें व्याख्या करनी चाहिये। मैं शास्त्री जी को उनकी सरल कृति पर बधाई देता हू।” डा० रामचन्द्र जी द्विवेदी प्रोफेसर एव संस्कृतविभागाध्यक्ष, जयपुर यूनिवर्सिटी अपने एक पत्र में लिखते हैं—

६ “I gratefully acknowledge receipt of a copy of the Vaiya- karana-Bhusana-Sara Your knowledge of the grammar is pro- found and subtle and the world of scholars expect many such good works from your pen.” अर्थात् “आप का व्याकरणविषयक ज्ञान गम्भीर एवं व्यापक है। विद्वत्समाज आप की लेखनी से इस प्रकार की अनेक सुन्दर कृतियों की आशा करता है।” गुरुकुल झज्झर के आचार्य तपोमूर्ति श्रीभगवान्देवजी आर्य लिखते हैं— “आप का परिश्रम स्तुत्य है। छात्रों के लिए इस ग्रन्थ का आर्यभाषानुवाद कर के आपने महान् उपकार किया है। आप को अनेकशः बधाइयां।” बालमनोरमा-भ्रान्ति-दिग्दर्शन [ लेखक - वैद्य भीमसेन शास्त्री M. A. Ph. D. साहित्यरत्न ] श्री भट्टोजिदीक्षित की सिद्धान्तकौमुदी पर श्री वासुदेव दीक्षित की बनाई हुई बालमनोरमा टीका सुप्रसिद्ध छात्रोपयोगी ग्रन्थ है। पिछली अर्धशताब्दी मे इसके कई संस्करण मद्रास, लाहौर, बनारस और दिल्ली आदि महानगरों मे अनेक दिग्गज विद्वानों के तत्त्वाधान में प्रकाशित हो चुके है। परन्तु शोक से कहना पडता है कि इन स्वनामधन्य विद्वान् सम्पादको ने इस ग्रन्थ के साथ जरा भी न्याय नही किया, इसे पढने तक का भी कष्ट नही किया। यही कारण हे कि इस मे अनेक हास्यास्पद और घिनौनी अशुद्धिया दृष्टिगोचर होती है। इस से पठन-पाठन मे बहुत विघ्न उप- स्थित होता है। इस शोधपूर्ण लघु निबन्ध मे बालमनोरमाकार की कुछ सुप्रसिद्ध भ्रान्तियों की सयुक्तिक समीक्षा प्रस्तुत की गई है। आप इस शोधपत्र को पढ़ कर मनोरंजन के साथ-साथ प्रक्रियामार्ग मे अन्धानुकरण न करने तथा सदैव सजग रहने की भी प्रेरणा प्राप्त कर सकते है। इसमे स्थान-स्थान पर विद्वानो की प्रमादपूर्ण सम्पादन कला पर भी अनेक चुभती चुटकियां ली गई हैं। यह निबन्ध प्रकाशको, सम्पादकों, अध्यापकों एवं विद्यार्थियो सब की आंखो को खोलने वाला एक समान उपयोगी हे। हिन्दी मे इस प्रकार का साहसपूर्वक प्रयत्न पहली वार किया गया है। अनेक प्रकार के टाइपों मे मैप्सलीथो कागज पर छपे सुन्दर शोधपत्र का मूल्य—पाच रुपये केवल । प्रत्याहारसूत्रों का निर्माता कौन ? [ लेखक – वैद्य भीमसेन शास्त्री M.A. Ph. D. साहित्यरत्न ] इस शोधपूर्ण लघु निबन्ध मे प्रत्याहार सूत्रों (अइउण् आदि) के निर्माता के विषय में खूब ऊहापोहपूर्वक पूर्ण विचार किया गया है। दर्जनों नये प्रमाणों का युक्ति- युक्त विवेचन पहली बार इस विषय पर प्रस्तुत किया गया है। एक बार इसे पढ़ जाइये आप अन्धविश्वास के घेरे से अपने आपको अवश्य मुक्त पाएंगे। अनेक प्रकार के टाइपों में मैप्सलीथो कागज पर छपे सुन्दर शोधपत्र का मूल्य—पाच रुपये केवल ।

१० न्यास—पर्यालोचन [A CRITICAL STUDY OF JINENDRA BUDDHI'S NYASA] यह ग्रन्थ काशिका की प्राचीन सर्वप्रथम व्याख्या काशिकाविवरणपञ्चिका अपरनाम न्यास पर लिखा गया बृहत्काय शोधप्रबन्ध है जिसे दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा पी० एच्० डी० की उपाधि के लिये स्वीकृत किया गया है। यह शोधप्रबन्ध वैद्य भीमसेन शास्त्री द्वारा कई वर्षों के निरन्तर अध्ययन स्वरूप बड़े परिश्रम से लिखा गया है। इसमें कई प्रचलित धारणाओं का खुल कर विरोध किया गया है। जैसे न्यासकार को अब तक बौद्ध समझा जाता है परन्तु इसमे उसे पूर्णतया वैदिकधर्मी सिद्ध किया गया है। यह शोधप्रबन्ध छ अध्यायो मे विभक्त है। प्रथम अध्याय मे न्यास और न्यासकार का सामान्य परिचय देते हुए न्यासकार का काल, निवास-स्थान, न्यास का वैशिष्ट्य, न्यास की प्रसन्नपदा प्रवाहपूर्णा शैली तथा न्यास और पदमञ्जरी का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। द्वितीय अध्याय मे 'न्यास के ऋणी उत्तर- वर्त्ती वैयाकरण' नामक अत्यन्त शोधपूर्ण नवीन विषय प्रस्तुत किया गया है। इस में केवल पाणिनीय वैयाकरणो को ही नही लिया गया अपितु पाणिनीतर चान्द्र, जैनेन्द्र, कातन्त्र, शाकटायन, भोजकृत सरस्वतीकण्ठाभरण, हैमशब्दानुशासन, मलयगिरिशब्दा- नुशासन, संक्षिप्तसार, मुग्धबोध तथा सारस्वत इन दस प्रमुख व्याकरणो को भी सम्मिलित किया गया है। तृतीयाध्याय में 'उत्तरवर्ती वैयाकरणो द्वारा न्यास का खण्डन' नामक अपूर्व विषय प्रतिपादित है। इस में उत्तरवर्ती वैयाकरणो द्वारा की गई न्यासकार की आलोचनाओ पर कारणनिर्देशपूर्वक युक्तायुक्तरीत्या खुल कर विचार उपस्थित किये गये है। चतुर्थ अध्याय में 'न्यास की सहायता से काशिका का पाठसंशोधन' नामक महत्वपूर्ण विषय का वर्णन है। इसमे काशिका ग्रन्थ की अद्यत्वे मान्य सम्पादको (?) द्वारा हो रही दुर्दशा का विशद प्रतिपादन करते हुए उसके अनेक अशुद्ध पाठो का न्यास के आलोक मे सहेतुक शुद्धीकरण प्रस्तुत किया गया है। पञ्चम अध्याय में न्यासकार की भ्रान्तियो तथा न्यास के एक सौ भ्रष्ट-पाठो का विस्तृत लेखा-जोखा उपस्थित किया गया है। छठा अध्याय अनेक नवीन बातो से उपबृंहित उपसंहारात्मक है। व्याकरण का यह ग्रन्थ पाणिनीय व पाणिनीतर व्याकरण के क्षेत्र मे अपने ढंग का सर्वप्रथम किया गया अनूठा ज्ञानवर्धक प्रयास है। यह ग्रन्थ प्रत्येक पुस्तकालय के लिए संग्राह्य है तथा व्याकरणशास्त्र मे शोधकार्य करने वाले शोधच्छात्रों के लिए नितान्त उपयोगी है। सुन्दर मैप्सीथो कागज, पक्की अग्रेजी सिलाई, स्क्रीनप्रिण्टिग, आकर्षक मजबूत जिल्द से सुशोभित ग्रन्थ का मूल्य—केवल एक सौ रुपये। प्राप्तिस्थान— भैमी प्रकाशन ५३७ लाजपतराय मार्केट, (दीवान हाल के सामने) दिल्ली—११०००६

BHAIMI PRAKASHAN (1) LAGHU SIDDHANT KAUMUDI—BHAIMI VYAKHYA PART-I Bhaimi Vyakhya of Shri Bhim Sen Shastri is unique and first of its kind published in Hindi, in its detailed and scientific exposi- tion of the Laghu Siddhant Kaumudi. The fact that part-I (पूर्वार्ध) runs into more than 600 pages (large size), speaks for the pains- taking nature, depth of learning and experience of the author. He has left no stone unturned to make the subject as simple and easy to grasp as possible for the students and to achieve this aim, he has combined traditional method with the modern and scientific method of teaching and analysis. The author has taken great pains to bring home to students the meaning of the Sutras without the help of Vrittis. At the end of each section have been appended excercises, prepared with great care and caution to remove the doubts of studens. Declensions of all the words mentioned in the L. S. K. have been given in the Bhaimi Vyakhya. This does away with the need to have a separate Roopmala. The author has also given a list of about 2000 words with meanings. These include many rare and uncommon words. This is a real help in translation. The unique feature of the publi- cation is the section on Avyaya (अव्यय), which has been acclaimed by eminent scholars and erudite pandits as an original contribution to the subject. The several indexes at the end are very useful. The language of the work is very simple and lucid. The difficult and knotty points have been handled deftly. On contro- versial subjects, the views of all the well-known authorities have been quoted. The author is not a blind follower of tradition in matter of interpretation and meaning of Sutras. Wherever he

१२ differs, he gives convincing arguments in support of his own view, which gives a stamp of his deep study, research and vast teaching experience. Bhaimi Vyakhya in short is a self tutor and is of immense help to teachers and research scholars. For a book of about 650 pages of large size the price of Rs 30/- is extremely low. (2) LAGHU SIDDHANT KAUMUDI—BHAIMI VYAKHYA PART-II Part II of Bhaimi Vyakhya on Laghu Siddhant Kaumudi deals with the तिङन्त section which is known as the backbone of Sanskrit grammar. The work is an original commentary in the traditional style which combines the modern scientific technique of exposition and comparative analysis. The work is unique in the प्रक्रिया portion. The author has given detailed प्रक्रिया of about 1500 verbal forms besides conjugations of more than 300 verbs in all the ten tenses and moods. The use and meaning of different उपसर्गs in combination with verbs has been illustrated in about 1000 quotations taken from the famous Sanskrit works. For the benefit of students, exercises have been given at the end of each sub section. The causal, desiderative, intensive and denominative verbal forms have been ably explained. One hundred illustrations of each of these forms have been given with meaning. The inclusion of well-known con- troversies, with the view point of each side and author's own, is a special feature of the work. In many places, the author has offered new solutions to difficult problems left un-attended even by Varadaraja himself. At the end of the publication have been appended six indexes, of which special mention may be made of no. 5. This voluminous work running into 750 pages has been priced Rs 30/- only which is very low, keeping in view its technical exce- llence and the labour involved in bringing out in such a publication. (3) LAGHU SIDDHANT KAUMUDI—BHAIMI VYAKHYA PART-III-IV The last two parts of the Bhaimi Vyakhya on L.S.K are be- ing readied for the press. Like the first two parts these parts too