लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
DevanagariHindipublished633 पृष्ठ
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६०० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
(७) परिशिष्ट-परिभाषा-न्यायादि-तालिका
[व्याख्या वा मूलगत परिभाषाओं, न्यायों, पक्तिकाओं तथा विशेष स्मरणीय वचनों की यहां तालिका दी जा रही है। ध्यान रहे कि इन को हृदयंगम कर लेने पर ही संस्कृत-व्याकरण में निष्णातता प्राप्त की जा सकती है।]
| अकृतव्यूहाः पाणिनीया | (४६७) | इदमस्तु सन्निकृष्टे समीपतर० | (३७०) |
| अक्षौहिणी-प्रमाणम् | (६१) | इह इङ्गितेन चेष्टितेन० | (११६) |
| अङ्गवृत्ते पुनर्वृत्तौ अविधिर्० | (४२८) | ईषदर्थे क्रियायोगे मर्यादा० | (६०) |
| अच परस्यैव झलो नुम्विधानम् | (३२४) | उणादिनिष्पन्नाना तृन्प्रत्ययान्ताना० | (२७८) |
| अज्भीन परेण संयोज्यम् | (४४) | उत्तरोत्तर मुनीना प्रामाण्यम् | (२१) |
| अत्र एव ज्ञापकादन्त्यस्य यण् ० | (३६५) | उद्भूतावयव-अनुद्भूतावयवसमु० | (१६४) |
| अनिदेशः (मिहो मानवके ) | (२३२) | उपदेश आद्योच्चारणम् | (७) |
| 'अथेवाणपरेण णकारेण' विवेचन | (२६) | उपसर्गविभक्तिस्वरप्रतिरूपकाश्च | (५४५) |
| अनन्तरस्य विधिर्वा भवति प्रति० | (४५३) | उभयनिर्देशे पञ्चमीनिर्देशो० | (१२६) |
| अनिन्सम्रग्रहणाम्यर्थवता चान० | (३६०) | एकतिङ् वाक्यम् | (४३६) |
| अनुस्वार्यमाना च नासिका० | (२१) | एकदेशविकृतमनन्यवत् | (२१४) |
| अनेकाल्पपरिभाषाविवेचन | (७८) | एकवचनमुत्सर्गंतः क्रियते | (१६०) |
| अन्तरतमपरिभाषाविवेचन | (३७) | एका च सिकता तैलदाने० | (४८८) |
| अन्तादिवद्भाव (अन्तादिवच्च) | (७१) | एकादेशः (एक पूर्वपरयो) | (५१) |
| अन्यत्रान्यत्रलब्धावकाशयोर् | (१५२) | एतैर्व्यस्तैंर्यथासम्भव मिलितैश्च० | (१७८) |
| 'अन्वादेश' सोदाहरणविवेचन | (३७७) | कर्तव्योऽत्र यत्नः | (६) |
| अपवादो वचनप्रामाण्यात् | (१००) | काच मणि वारुचनमेकसूत्रे० | (३६३) |
| अप्प्रत्यये द्वयक्षर यदि | (२६७) | किञ्चित्कार्य विधातुमुपात्तस्य० | (३७७) |
| अयोगवाहा विज्ञेया आश्रय० | (२१) | कृताकृतप्रसङ्गी यो विधि सः | (३६४) |
| अर्धमात्रालाघवेन पुत्रोत्सव० | (१३०) | ङिब्वन्ता धातुत्व न जहति | (२७०) |
| अलोऽन्त्यपरिभाषाविवेचन | (४३) | ङिब्वन्ता णिजन्ता षिङन्ता धातु० | (३५२) |
| अवी-तन्त्र्यो स्त्री-लक्ष्मी० | (३०६) | गुणो दीर्घोत्त्वानापवादः | (३०४) |
| अष्टम्य इति वक्तव्ये कृतात्व० | (४०२) | द्विस्परिभाषाविवेचन | (७६) |
| असति माद्ग्रहणे एकारोऽप्यनु० | (८७) | चादिगणः | (५३६) |
| असंयुक्ता ये ऽल्कास्तद्० | (२६७) | छन्दोवत्कवय कुर्वन्ति | (२३६) |
| असिद्ध बहिरङ्गमन्तरङ्गे | (१६८) | छन्दोवत्सूत्राणि भवन्ति | (७) |
| असिद्धाधिकारः (पूर्वत्रासिद्धम्) | (५६) | जजोर्मं | (३८१) |
| 'आकृतिगण' विवेचन | (७०) | जलबुम्बिकान्यायेन रेफस्यो० | (५४) |
| आदे परस्य | (११२) | जश्त्वचर्वे (जश् तु अचर्वे) | (१८४) |
| इतरेतराश्रयाणि कार्याणि न० | (३५७) | डित्वाभावेऽपि सिद्धेऽपि० | (३३०) |