लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
पृष्ठ 614, कुल 633 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्टानि ६०१ ५८८ परिव्राज् (४१४) यद् (पुं०) (४१८) श्री (३११) पर्णध्वस् (३६२) यद् (नपुं) (५०१) श्रीपा (३३१) पितृ (२७६) यवक्री (२५५) श्रेयस् (पुं०) (४६८) पिपठिष् (४६३) यशस्विन् (३६०) श्वन् (३६४) पुनर्भु (२७३) युज् (४०६) षष् (४६२) पुर् (४८३) युवन् (३६५) सखि (२२७) पुंस् (४६६) युष्मद् (४१६) सजुष् (४६०) पूर्व (२०७) रत्नमुष् (४६२) सध्रयच् (४४५) पूषन् (३८६) रमा (२८५) सध्रयञ्च् (४४८) प्रत्यच् (४४२) राजन् (३७६) सर्व (१६४) प्रत्यञ्च् (४४७) राज् (४११) सर्वा (२६२) प्रथम (२०६) राम (१६७) सिम (२०१) प्रद्यो (३४६) रै (पुं०) (२८३) सुखी (२५८) प्रधी (२४६) रै (स्त्री०) (३१६) सुती (२५८) प्ररै (३४७) लक्ष्मी (३०६) सुदिव् (३६३) प्रशाम् (३६६) लिहू (३४६) सुधी (पुं०) (२५७) प्राच् (४४१) वधू (३१७) सुधी (नपुं०) (३४०) प्राञ्च् (४४७) वर्षाभू (२७२) सुनां (३४८) प्रियत्रि (२४१) वाच् (४८७) सुपथिन् (४६६) बहुश्रेयसी (२४४) वारि (३३३) सुपाद् (४३८) ब्रह्मन् (३८४) वार् (४६५) सुपुंस् (५१३) भवत् (४५२) विद्वस् (४६६) सुयुज् (४१०) भवत् (४५२) विभ्राज् (४१२) सुलू (पुं०) (२७१) भूपति (२३५) विश् (४५६) सुलू (नपुं०) (३४३) भृज्ज (४१५) विश्व (१६७) सुश्री (२५४) भ्रातृ (२८०) विश्वपा (२१५) स्त्री (३१०) भ्रू (३१६) विश्वराट् (४१४) स्नुह् (३५५) मघवन् (३६१) विश्ववाह् (३५६) स्व (२०८) मति (२६६) विश्वसृज् (४१३) स्वनडुह् (४६४) मथिन् (३६७) वृत्रहन् (३८५) स्वभू (२७१) मधु (३४३) वेधस् (४७२) स्वयम्भू (३१७) महत् (४५०) शकृत् (५०५) स्वसृ (३१७) मातृ (३१८) शम्भु (२६०) हरि (२२१) मुहू (३५५) शार्ङ्गिन् (३८७) हाहा (२२०) यज्वन् (३८३) शुद्धधी (२५६) हूहू (२६६)