भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 613

५६८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् उत्तरपूर्वा (२६४) | गोपा (२६८) | दशन् (४०४) उदच् (४४३) | गौरी (३०५) | दिव् (४८२) उदञ्च् (४४८) | ग्रामणी (२५३) | दिश् (४८६) उपानह् (४८१) | ग्लौ (२८४) | दीव्यत् (५०८) उभ (१६८) | घृतस्पृश् (४६१) | दुह् (३५१) उभय (१६६) | चतुर् (पु०) (३६६) | दृन्भू (२७२) उल्लू (२७१) | चतुर् (स्त्री०) (४८३) | दृश् (४८६) उशनस् (४७०) | चतुर् (नपु०) (४१५) | देवेज (४१३) उष्णिक् (४८१) | चरम (२०६) | द्यो (३१६) ऊर्ज् (५००) | चिकीर्षू (२६५) | द्रुह् (३५४) ऋत्विज् (४०६) | जक्षत् (४५५) | द्वि (पु०) (२४१) ऋभुक्षिन् (३६७) | जरा (२६७) | द्वि (स्त्री०) (३०५) एक (२०२) | ज्ञान (३२१) | द्वि (नपु०) (३३२) एकतर (३३१) | तद् (पु०) (४१८) | द्वितय (२०६) एतद् (पु०) (४१६) | तद् (स्त्री०) (४८६) | द्वितीय (२११) एतद् (स्त्री०) (४८७) | तद् (नपु०) (५००) | द्वितीया (२६६) एतद् (नपु०) (५०१) | तादृश (४१८) | धनुष् (५१०) कतर (पु०) (२००) | तादृश् (४५८) | धातृ (पु०) (२७४) कतर (नपु०) (३२८) | तिर्यञ्च् (४४६) | धातृ (नपु०) (३४१) कति (२३६) | तिर्य्यञ्च् (४४८) | धीमत् (४५१) कतिपय (२१०) | तुदत् (५०६) | धेनु (३१४) करभू (२७३) | तुरासाह् (३६२) | नवन् (४०४) किम् (पु०) (३६६) | त्यद् (पु०) (४१७) | नश् (४६०) किम् (स्त्री०) (४८४) | त्यद् (स्त्री०) (४८६) | निर्जर (२१२) किम् (नपु०) (४६६) | त्रि (पु०) (२४०) | नी (२५३) क्रुञ्च् (४४८) | त्रि (स्त्री०) (३०३) | नृ (२८०) क्रोष्टु (पु०) (२६२) | त्रि (नपु०) (३३३) | नेम (२१०) क्रोष्टु (स्त्री०) (३१५) | त्व (२०१) | नौ (३१६) गञ्ज् (४११) | दिग्पू (४६०) | पचत् (५०७) खलपू (२७०) | दक्षिण (२०७) | पञ्चन् (३६६) गिर् (४८२) | दण्डिन् (४६८) | पति (२३४) गुप् (४५७) | ददत् (पु०) (४५४) | पथिन् (३६७) गो (२८१) | ददत् (नपु०) (५०५) | पपी (२४३) गोअञ्च् (गतौ) (५०१) | दधि (३३८) | पयस् (५१२) गोअञ्च् (पूजा) (५०२) | दधृष् (४६१) | पयोमुच् (४४६) | | पर (२०७)