भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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८ शतशः स्थल उदाहरण रूप में प्रस्तुत किये जा सकते हैं। शास्त्रीजी की शैली अध्येताओं व पाठकों के मन में उत्पन्न होने वाली सम्भावित शंकाओं को बटोर-बटोर कर ध्वस्त करने की क्षमता रखती है। द्वितीय कारिका की व्याख्या का लगभग सत्तर पृष्ठों में समाप्त होना ज्वलन्त प्रमाण है। हिन्दी में इस प्रकार के यत्न स्तुत्य हैं।' (६ मार्च, १९६६) बम्बई विश्वविद्यालय के संस्कृतविभाग के अध्यक्ष डाक्टर त्र्यम्बक गोविन्द माईणकर लिखते हैं— 'Students of Grammar will always remain indebted to Bhim Sen Shastriji for his very valuable help available in his commentary I wish Bhim Sen Shastriji writes similar commentaries on other works in the field of Grammar and renders service both to the sub- ject of his love and to the world of students and scholars I once again congratulate him ' अर्थात् श्रीभीमसेन शास्त्री के इस बहुमूल्य व्याख्यान को पाकर व्याकरण के विद्यार्थी उन के सदा ऋणी रहेंगे। मैं चाहता हूँ कि शास्त्री जी इस प्रकार की व्याख्यायें व्याकरण के अन्य ग्रन्थों पर भी प्रकाशित करते हुए विद्यार्थियो तथा अनुसन्धानप्रेमियों का उपकार करेंगे। मैं शास्त्री जी को उनके इस कार्य के लिए पुनः बधाई देता हू। डा० सत्यव्रत जी शास्त्री व्याकरणाचार्य, प्रोफेसर एव संस्कृतविभागाध्यक्ष, दिल्ली विश्वविद्यालय लिखते हैं— “वैयाकरणभूषणसार ग्रन्थ के क्लिष्ट शब्दावली में लिखा होने के कारण विद्यार्थियों को इसे समझने में बहुत कठिनाई हो रही थी। इसी कठिनाई को दूर करने की सदिच्छा से प्रेरित हो सुप्रसिद्ध वैयाकरण पं० भीमसेन शास्त्री ने हिन्दी में इसकी सरल और सुबोध व्याख्या लिखी है। शास्त्री जी का व्याकरणशास्त्र का अध्ययन अति गहन है। विषय स्पष्टातिस्पष्ट हो, इस विषय में सतत उद्योगशील रहे हैं। इसका यह परिणाम है कि उन की व्याख्या में गहराई भी है और विशदता भी। यह व्याख्या विद्वानों के लिए एव विद्यार्थियों के लिए एक समान उपयोगी है।” स्व० श्री पण्डित कुवेरदत्तजी शास्त्री व्याकरणाचार्य प्रिंसिपल श्री राधाकृष्ण संस्कृतमहाविद्यालय, खुर्जा लिखते हैं— “वैयाकरणभूषणसार पर विशद भैमीभाष्य को पाकर मुझे बडी प्रसन्नता हुई। ऐसा परिश्रम हिन्दी में प्रथम बार हुआ है। यह भाष्य न केवल विद्यार्थियों व परीक्षार्थियों के लिए अपितु अध्यापकों के लिए भी अत्यन्त उपयोगी है। व्याख्यान की शैली नितान्त हृदयहारिणी तथा स्तुत्य है। व्याकरण के अन्य दार्शनिक ग्रन्थों की भी इसी शैली में उन्हें व्याख्या करनी चाहिये। मैं शास्त्री जी को उनकी सरल कृति पर बधाई देता हू।” डा० रामचन्द्र जी द्विवेदी प्रोफेसर एव संस्कृतविभागाध्यक्ष, जयपुर यूनिवर्सिटी अपने एक पत्र में लिखते हैं—