भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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अच्-सन्धि-प्रकरणम् । ५७ (३) हरये, विष्णवे रूपों में लोपः शाकल्यस्य की प्रवृत्ति क्यों न हो ? (४) 'हरय् + इह', 'विष्णव् + इह' यहां लोपः शाकल्यस्य से प्राप्त यकार वकार के लोप का यणः प्रतिषेधो वाच्यः से निषेध क्यों नहीं होता ? (५) निम्न-लिखित रूपों में सन्धिच्छेद कर सूत्र-समन्वय-पूर्वक सिद्धि करें— १. गुरा आयाते । २. प्रभ इदानीम् । ३. शौर आगच्छ । ४. भानो अपि । ५. रथा उदिते । ६. न धातु-लोप आर्धधातुके । ७. श्रिया उत्कण्ठितः । ८. तयागच्छन्ति । ६. विधा उदिते । १०. वन ऋषयः । ६) अधो-लिखित रूपों में सूत्र-समन्वय-पूर्वक सन्धि करें— वनऋषयः १. पुत्रौ + आगच्छतः । २. तस्मै + अदात् । ३. ते + इच्छन्ति । ४. गृहे + आसीत् । ५. एते + आगताः । ६. विश्वे + उपासते । ७. दूती + अनार्ये । ८. स्थले + इदानीम् । ६. वाली + आयाती । १०. कस्मै + अयच्छत् । ११. आसने + आस्ते । १२. द्वौ + अपि । —:: o ::— [लघु०] संज्ञा-सूत्रम् — (३२) वृद्धिरादैच् ।१।१।१॥ आदैच्च वृद्धि-सञ्ज्ञः स्यात् ॥ अर्थः—'आ, ऐ, औ—ये तीन वर्ण वृद्धि-सञ्ज्ञक होते हैं। व्याख्या - वृद्धिः ।१।१। आत् ।१।१। ऐच् ।१।१। अर्थः — (आत्, ऐच्) दीर्घ आकार, दीर्घ ऐकार तथा दीर्घ औकार (वृद्धिः) वृद्धि-सञ्ज्ञक होते हैं । 'आदैच्' यहां पर तपर किया गया है । यह तपर 'आ' के लिये नहीं किन्तु 'ऐच्' के लिये किया गया है; क्योंकि 'आ' तो अण्-प्रत्याहार के अन्तर्गत न होने से अणुदित्सवर्णस्य चाप्रत्ययः (११) सूत्र द्वारा स्वतः ही सवर्णों का ग्रहण नहीं कराता, पुनः उसके लिए निषेध कैसा ? अतः यहां ऐच् के ग्रहण से प्लुत-सवर्णों का ग्रहण न हो अथवा 'देव + ऐश्वर्यं' में त्रिमात्रस्थानी तथा 'गङ्गा + ओघ' में चतुर्मात्र स्थानी होने से ऐ-औ भी कहीं त्रिमात्र चतुर्मात्र न हों, किन्तु द्विमात्र ही हों; इसलिये तपर किया गया है। इस से—दीर्घ आकार, दीर्घ ऐकार, तथा दीर्घ औकार इन तीन वर्णों की 'वृद्धि' सञ्ज्ञा होती है । अब अग्रिम-सूत्र में इस सञ्ज्ञा का फल दिखाते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम् — (३३) वृद्धिरेचि ।६।१।८८॥ आदेचि परे वृद्धिरेकादेशः स्यात् । गुणापवादः । कृष्णैकत्वम् । गङ्गौघः । देवैश्वर्यम् । कृष्णोत्कण्ठ्यम् ॥ अर्थः—अवर्ण से एच् परे होने पर पूर्व + पर के स्थान पर एक वृद्धि आदेश हो जाता है । गुणेति—यह सूत्र आद् गुणः (२७) सूत्र का अपवाद है । व्याख्या—आत् ।५।१। (आद् गुणः से) । एचि ।७।१। पूर्व-परयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्व-परयोः यह अधिकृत है) । वृद्धिः ।१।१। अर्थः—(आत्) अवर्ण से (एचि) एच् परे होने पर (पूर्व-परयोः) पूर्व + पर के स्थान पर (एकः) एक