लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् (वृद्धि) वृद्धि आदेश हो जाता है। यह सूत्र आद् गुण (२७) सूत्र का अपवाद है। बहुत विषय वाला उत्सर्ग और थोड़े विषय वाला अपवाद हुआ करता है। आद् गुण (२७) सूत्र बहुत विषय वाला है, क्योंकि इस का अवर्ण से परे अच्-मात्र विषय है। वृद्धि- रेचि (३३) सूत्र थोड़े विषय वाला है, क्योंकि इस का अवर्ण से परे अच्-प्रत्याहार के अन्तर्गत केवल एच् ही विषय है। उत्सर्ग और अपवाद दोनों प्रकार के सूत्र महा- मुनि पाणिनि ने बनाये हैं, अत हमें कोई ऐसा हल ढूंढना है जिस से दोनो प्रकार के सूत्र सार्थक हो जायें, कोई अनर्थक न हो। अब यदि अपवाद के विषय में भी उत्सर्ग प्रवृत्त करते हैं तो अपवाद-सूत्र निरर्थक हो जाते हैं, क्योंकि तब इन्हें प्रवृत्त होने के लिये कोई स्थान ही नहीं मिल सकता। और उत्सर्ग के विषय में अपवाद प्रवृत्त करते हैं तो उतने मात्र में प्रवृत्त होकर अपवाद सार्थक हो जाता है और शेष बचे हुए में उत्सर्ग भी प्रवृत्त हो सकता है, इस प्रकार दोनो सार्थक हो जाते हैं। इस से यह सिद्ध हुआ कि उत्सर्ग के विषय में ही अपवाद प्रवृत्त करना युक्त है। तो अब आद् गुण (२७) के विषय में वृद्धिरेचि (३३) सूत्र प्रवृत्त होकर एच् के स्थानों को उस से छीन लेगा, शेष बचे हुए स्थानों में ही वह प्रवृत्त होगा। उदाहरण यथा- कृष्णैकत्वम् (कृष्ण की एकता)। कृष्ण+एकत्व' यहां णकारोत्तर अवर्ण से परे 'एकत्व' शब्द का आदि एकार = एच् वर्त्तमान है। अतः वृद्धिरेचि (३३) सूत्र द्वारा पूर्व-अ और पर = ए के स्थान पर एक वृद्धि आदेश प्राप्त होता है। 'अ+ए' का स्थान 'कण्ठ+तालु' है, इधर वृद्धि-सञ्ज्ञकों में ऐ' का स्थान 'कण्ठ+तालु है अतः स्थानेऽन्तरतम (१७) के अनुसार 'अ+ए' के स्थान पर ऐ' यह एक वृद्धि आदेश हो कर - कृष्ण् 'ऐ' कत्व = 'कृष्णैकत्वम्' प्रयोग सिद्ध होता है। गङ्गौघ (गङ्गा का प्रवाह)। 'गङ्गा+ओघ' यहां पूर्व = आ और पर = ओ का 'कण्ठ+ओष्ठ' स्थान है, अतः वृद्धिरेचि (३३) सूत्र द्वारा पूर्व+पर के स्थान पर 'कण्ठ+ओष्ठ' स्थान वाला 'औ' यह एक वृद्धि आदेश हो कर-गङ्ग 'औ' घ= 'गङ्गौघ' प्रयोग सिद्ध होता है। देवैश्वर्यम् (देवताओं का ऐश्वर्य)। 'देव+ऐश्वर्य' यहां पूर्व = अ और पर = ऐ का 'कण्ठ+तालु' स्थान है, अतः वृद्धिरेचि (३३) सूत्र द्वारा पूर्व+पर के स्थान पर 'कण्ठ+तालु' स्थान वाला ऐ' यह एक वृद्धि आदेश होकर-देव् 'ऐ' श्वर्य = 'देवैश्वर्यम्' प्रयोग सिद्ध होता है। कृष्णौत्कण्ठ्यम् (कृष्ण की उत्कण्ठा)। 'कृष्ण+औत्कण्ठ्य' यहां पूर्व = अ और पर = औ का 'कण्ठ+ओष्ठ' स्थान है, अतः वृद्धिरेचि (३३) सूत्र द्वारा पूर्व+पर के स्थान पर 'कण्ठ+ओष्ठ' स्थान वाला औ' यह एक वृद्धि आदेश होकर - कृष्ण् 'औ' त्कण्ठ्य = 'कृष्णौत्कण्ठ्यम्' प्रयोग सिद्ध होता है। अभ्यास (६) (१) निम्नलिखित रूपों में सूत्रार्थ-समन्वय-पूर्वक सन्धि करें-