लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
DevanagariHindipublished633 पृष्ठ
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१. पञ्च + एते । २. जन + एकता । ३. तण्डुल + ओदन । ४. राम
- औत्सुक्य । ५. नृप + ऐश्वर्य । ६. महा + औषध । ७. एक + एक । ८. राजा + एषः । ९. महा + औदार्य । १०. वीर + एक । ११. महा
- एनः । १२. दर्शन + औत्सुक्य । १३. अस्य + औचिती । १४. सुख
- औपयिक । १५. दीर्घ + एरण्ड । (२) निम्न-लिखित प्रयोगों में सूत्रार्थ-समन्वय-पूर्वक सन्धिविच्छेद करें - १. अत्रैकमत्यम् । २. पूर्वैः । ३. मृत्योद्धत्यम् । ४. पण्डितौकः । ५. बालैषा । ६. चित्तैकाग्र्यम् । ७. तथैव । ८. महौजमः । ६. नवैवम् । १०. नत्यैतिह्यम् । ११. ममोदासीन्यम् । १२. कर्म्मोर्ध्वदेहिकम् । १३. दीर्घैकारः । १४. ज्ञानौषधिः । १५. महौष्ण्यम् । १६. प्लुतैकारः । १७. स्थूलैणः । १८. मैवम् । १६. बिम्बौष्ठी । २०. स्थूलौतुः¹ । (३) उत्सर्ग और अपवाद किसे कहते हैं ? अपवाद के विषय में उत्सर्ग की प्रवृत्ति क्यों नहीं हुआ करती ? (४) वृद्धिरेचि सूत्र गुण का अपवाद है; इस वचन की व्याख्या करो । (५) वृद्धिरादैच् सूत्र में तपर करने का क्या प्रयोजन है ? ————: ० :———— [लघु०] विधि-सूत्रम् — (३४) एत्येधत्यूठ्सु ।६।१।८६॥ अवर्णादेजाद्योरेत्येधत्योरूठि च परे वृद्धिरेकादेशः स्यात् । पररूप- गुणापवादः । उपैति । उपैधते । प्रष्ठौहः । एजाद्योः किम् ? उपेतः । मा भवान् प्रेदिधत् ॥ अर्थः—अवर्ण से परे यदि एच्-प्रत्याहार आदि वाली 'इण्' तथा 'एध्' धातु हो अथवा ऊठ् हो तो पूर्व + पर के स्थान पर एक वृद्धि आदेश हो जाता है । पर- रूपेति — यह सूत्र एङि पररूपम् (३८) तथा आद् गुणः (२७) सूत्रों का अपवाद है । व्याख्या—आत् ।५।१। (आद् गुणः से) । एजाद्योः ।७।२। (वृद्धिरेचि सूत्र से 'एचि' पद की अनुवृत्ति आती है । यह पद 'एति' और 'एधति' का ही विशेषण बन सकता है, असम्भव होने से 'ऊठ्' का नहीं; अतः वचन-विपरिणाम से द्विवचन और यस्मिन्विधिस्तदादावल्ग्रहणे से तदादि-विधि होकर 'एजाद्योः' ऐसा बन जाता है) । एत्येधत्यूठ्सु ।७।३। (एति + एधति + ऊठ्सु) । पूर्व-परयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्व-परयोः यह अधिकृत हैं) । वृद्धिः ।१।१। (वृद्धिरेचि से) । अर्थः---(आत्) अवर्ण से (एजाद्योः) एजादि (एत्येधत्यूठ्सु) इण् और एध् धातु परे होने पर अथवा ऊठ् परे होने पर (पूर्व-परयोः) पूर्व + पर के स्थान पर (एकः) एक (वृद्धिः) वृद्धि आदेश होता है । उदाहरण यथा— उपैति (पास जाता है) । 'उप + एति' ['एति' यह पद इण् गतौ (अदा०) १. 'बिम्बोष्ठी' और 'स्थूलोतुः' भी होता है । ओत्वोष्ठयोः समासे वा वार्त्तिक से वैकल्पिक पररूप हो जाता है । पररूप के अभाव में वृद्धि समझनी चाहिये ।