भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 91

७६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् उपो + अधिवे च । ८ अभ्यासो + अत्र । ६ को + अपि । १० अन्यो

  • असौ । ११ वे + अपि । १२ लोवे + अत्र । १३ इको + असवर्णे । १४ एचो + अयवायाव । १५ उपदेशे + अज् । (३) एडः पदान्तादति में 'पदान्त' ग्रहण का क्या प्रयोजन है ? ० [लघु०] विधि-सूत्रम् (४४) सर्वत्र विभाषा गोः । ६।१।११८॥ लोके वेदे चैङन्तस्य गोरति वा प्रकृतिभावः पदान्ते । गोअग्रम् । एङन्तस्य किम् ? चित्रग्वग्रम् । पदान्ते किम् ? गोः ॥ अर्थ—लोक और वेद में एङन्त 'गो' शब्द को पदान्त में विकल्प कर के प्रकृतिभाव हो जाता है । व्याख्या—सर्वत्र इत्यव्ययपदम्¹ । पदान्तस्य । ६।१। (एङः पदान्तादति से 'पदान्तात्' पद आ कर विभक्तिविपरिणाम से षष्ठ्यन्त हो जाता है । इसे यदि सप्तमी- विभक्ति में परिणत करें तो भी कुछ दोष नहीं होता, जैसा कि ग्रन्थकार ने वृत्ति में किया है) । एङः । ६।१। (एङः पदान्तादति में विभक्ति-विपरिणाम द्वारा प्राप्त होता है । यह 'गो' पद का विशेषण है, अतः इम में येन विधिस्र्तदन्तस्य द्वारा तदन्तविधि हो कर एङन्तस्य' बन जाता है) । गोः । ६।१। अति । ७।१। (एङः पदान्तादति से) । विभाषा । १।१। प्रकृत्या । ३।१। (प्रकृत्यान्तःपादमव्यपरे से) । अवस्थानं भवतीति शेषः । अर्थः— (सर्वत्र) चाहे यजुर्वेद हो या अन्य वेद अथवा लोक ही क्यो न हो सब जगह (पदान्तस्य) पदान्त (एङ = एङन्तस्य) जो एङ्—न्त (गोः) गो शब्द का (अति) अत् परे होने पर (विभाषा) विकल्प कर के (प्रकृत्या) स्वभाव से अवस्थान होजाता है । एङन्त गो शब्द में ओदन्त गो शब्द का ग्रहण समझना चाहिये, क्योकि एदन्त गो शब्द तो कभी हो ही नहीं सकता । प्रकृति का अर्थ है स्वभाव । वर्णों का स्वभाव उन का स्वरूप ही हो सकता है । 'प्रकृति में रहते हैं या प्रकृति-भाव को प्राप्त होते हैं' इस का तात्पर्य प्रयोग का मूल अवस्था म रह जाना अर्थात् कोई विकार न होना ही है । अत एव प्रकृति-भाव-स्थल में सहिताकार्य—सन्धि नहीं होती । उदाहरण यथा— 'गो + अग्र' ('गवाम् अग्रम्' ऐसा यहा षष्ठी-तत्पुरुष-समास है) यहा यद्यपि १ पीछे में 'यजुषि = यजुर्वेद में' की अनुवृत्ति आ रही थी; उस की निवृत्ति के लिये यहा 'सर्वत्र' पद का ग्रहण किया गया है । लौकिक और वैदिक के भेद से संस्कृत- भाषा दो प्रकार की होती है । लौकिक-भाषा लोक अर्थात् काव्यादि लौकिक- ग्रन्थों में या बोलचाल में प्रयुक्त होनी है, यहा लौकिक-भाषा के लिये केवल 'भाषा' शब्द का प्रयोग किया जाता है । यथा—प्रत्यये भाषायां नित्यम् (वा० ११) । वैदिक-भाषा वेद में ही प्रयुक्त होनी है, उसके लिये यहा कुछ विशेष नियम हैं । परन्तु यह सूत्र 'सर्वत्र' अर्थात् दोनों भाषाओ मे समानरूप से प्रवृत्त होता है ।
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