लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअच्-सन्धि-प्रकरणम् ७५ (पदान्तात्) पदान्त (एङः) एङ् से (अति) अत् परे होने पर (पूर्व-परयोः) पूर्व+ पर के स्थान पर (एकः) एक (पूर्वः) पूर्वरूप आदेश हो जाता है। 'एङ्' प्रत्याहार में 'ए, ओ' ये दो वर्ण आते हैं; यदि ये वर्ण पद के अन्त में स्थित हों और इन से परे अत् अर्थात् ह्रस्व अकार हो तो पूर्व+पर के स्थान पर पूर्वरूप एकादेश हो जाता है। यह सूत्र एचोऽयवायावः (२२) सूत्र का अपवाद है। उदाहरण यथा— (१) हरेऽव (हे हरे ! रक्षा करो)। 'हरे+अव' यहां 'हरे' यह सम्बोधन का एकवचनान्त होने से पद है; इस पद के अन्त वाले एकार=एङ् से 'अव' शब्द का आदि अत् परे है; अतः इन दोनों के स्थान पर प्रकृत सूत्र से एक पूर्वरूप 'ए' हो कर— हर् 'ए' व='हरेऽव' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। (२) विष्णोऽव (हे विष्णो ! रक्षा करो)। 'विष्णो+अव' यहां भी पूर्ववत् पूर्व=ओकार और पर=अकार के स्थान पर प्रकृत सूत्र से एक पूर्वरूप 'ओ' आदेश हो कर—विष्ण् 'ओ' व='विष्णोऽव' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। नोट—'ऽ' यह चिह्न करें या न करें अपनी इच्छा पर निर्भर है। यह केवल इस बात को प्रकट करता है कि यहां पहले अकार था¹। कई लोग इस चिह्न को अकार समझ कर वैसा उच्चारण करते हैं, यह उन की भूल है; क्योंकि जब एकादेश हो गया तो पुनः अवर्ण कहां से आया ? सूत्र में पदान्त कहने का अभिप्राय यह है कि 'जे+अ=जयः, ने+अ=नयः, भो+अ=भवः' इत्यादि में अपदान्त एङ् से अत् परे होने पर पूर्वरूप एकादेश न हो। अभ्यास (११) (१) निम्न-लिखित प्रयोगों में सन्धिच्छेद कर उसे सूत्रों द्वारा प्रमाणित करें— १. अग्नेऽत्र । २. वायोऽत्र । ३. गुरवेऽदात् । ४. रामोऽस्ति । ५. पचते- ऽसौ । ६. नमोऽस्तु । ७. संसारेऽधुना । ८. सर्पोऽहम् । ९. तेऽमी । १०. ब्राह्मणोऽब्रवीत् । ११. वटोऽयम् । १२. ब्रह्मणेऽस्तु । १३. वचनो- ऽनुनासिकः । १४. स्थानेऽन्तरतमः । १५. पण्डितोऽपि । (२) सूत्रार्थ-समन्वय पूर्वक सन्धि करें— १. ते+अकर्मकाः । २. पुरुषो+अत्र । ३. वने+अस्मिन् । ४. ततो+ अन्यत्र । ५. आधारो+अधिकरणम् । ६. सहयुक्ते+अप्रधाने । ७. १. यह चिह्न अत्यन्त आधुनिक है, तभी तो भ्यसो भ्यम् (३२३) सूत्र के महाभाष्य में लिखा है—किमयं 'भ्यम्'शब्द आहोस्विद् 'अभ्यम्'शब्दः ? कुतः सन्देहः ? समानो निर्देशः । यहां समानो निर्देशः से सिद्ध होता है कि पहले उक्त चिह्न नहीं था; प्रत्युत भट्टोजिदीक्षित के समय में भी नहीं था । अत एव समुदाङ्भ्यो यमो- ऽग्रन्थे (१.३.७५) सूत्र पर दीक्षित ने वृत्ति में ('अग्रन्थे' इतिच्छेदः) ऐसा लिखा है : यदि तब यह चिह्न होता तो 'यमोऽग्रन्थे' होने से छेद लिखना व्यर्थ था।