लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षेत्रव्यवहारः। (१९६) फैलाव-पहलें उदाहरणमें साधी हुई जीवाओंसे चापोंका प्रमाण जाननेके लिये ऊपर कही हुई रीति के अनुसार परिधि १८ के वर्ग ३२४ को जीवाके चौथे भाग २१/२ से और पांचसे; अथवा पांचसे गुणा किये हुए जीवाके चौथे भाग १०५/२ से गुणा किया तो १७०१० हुए; इसमें चार ४ से गुणा करे हुए व्यास ९६० से युक्त जीवा १००२ का भाग दिया तब १७ सत्रह लब्धि हुए; भाग देनेपर इसमें २४/१००२ न्यून था तथा गणितमें सुगमता हो इसलिये पूरा १७ ही ले लिया इसको परिधि वर्ग ३२४ के चौथे भाग ८१ में घटाया तो ६४ चौंसठ बचे, इसका मूल लिया तो ८ आठ मिले, इसको परिधि १८ के आधे ९ नौमें घटाया तब १ एक शेष रहा, यही ४२ जीवाके धनुषका प्रमाण है, इसी रीतिसे अन्य जीवाओं ८२ । १२० । १५४ । १८४ । २०८ । २२६ । २३६ । २४० । के भी धनुषोंका प्रमाण मिला, क्रमसे २ । ३ । ४ । ५ । ६ । ७ । ८ । ९। यह अपवर्तित रूप हैं; इस कारण इन्हें परिधिके अठारहवें भागसे गुणा किया तो सब धनुषोंके यथावत् प्रमाण हुए, क्रमसे ४२ । ८४ । १२६ । १६८ । २१० । २५२ । २८४ । ३३६ । ३७८ हुए ॥ इति श्रीभास्कराचार्य्यविरचितलीलावत्याः सान्वयभाषाटीकायां स्वरूपप्रकाशिकायां मुरादाबादवास्तव्यपण्डितरामस्वरूपशर्म्मविरचितायां क्षेत्रव्यवहारः ॥ इति लीलावत्यां द्वितीयः खंडः ॥