भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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( १९६ ) लीलावती । अथ खातव्यवहारे करणसूत्रं सार्द्धार्या- अब खातव्यवहार ( गढेकी लम्बाई चौडाई घनफल आदि ) की रीति लिखते हैं, डेढ़ श्लोक आर्याछन्दमें- गणयित्वा विस्तारं बहुषु स्थानेषु तद्युतिर्भाज्या ॥ स्थानकमित्या सममितिरेवं दैर्घ्ये च वेधे च ॥ ५१ ॥ क्षेत्रफल वेधगुणं खाते घनहस्तसंख्या स्यात् ॥ SS ॥ अन्वयः-विस्तारम् बहुषु स्थानेषु गणयित्वा तद्युतिः स्थानकमित्या भाज्या एवं दैर्घ्ये वेधे च सममितिः स्यात् । वेधगुणं क्षेत्रफल खाते घनहस्तसंख्या स्यात् ॥ ५१ ॥ SS अर्थः-जिस खातमें अनेक लम्बाई अनेक चौडाई तथा अनेक नीचाई हो, तहाँ सब चौडाईके प्रमाणोंको एक स्थानमें लिखकर जोड ले, उसमें जितने स्थानोंमें चौडाईका प्रमाण लिखा हो उस संख्याका भाग दे तब जो लब्धि हो वही चौडा- ईका प्रमाण है, इसी प्रकार लंबाई नीचाईमें भी जितने स्थान हों उनको एक स्थानमें लिखकर जोडे जो अङ्क हों उनमें जितने स्थानोंमें प्रमाण लिखे हैं, उस स्थानसंख्याका भाग दे जो लब्धि हो उसको प्रमाण जाने, क्षेत्रफल अर्थात् लम्बाई चौडाईके घातको नीचाईके प्रमाणसे गुणा करे तब खातमें घनहस्तका प्रमाण मालूम होता है ॥ ५१ ॥ SS उदाहरणम्- भुजवक्रतया दैर्ध्यं दशेशार्ककरैर्मितम् ॥ त्रिषु स्थानेषु षट्पञ्चसप्तहस्ता च विस्तृतिः ॥३०॥ यस्य खातस्य वेधोऽपि द्विचतुस्त्रिकरः सखे ॥ तत्र खाते कियन्तः स्यु- र्घनहस्ताः प्रचक्ष्व मे ॥ ३१ ॥ अन्वयः-हे सखे ! यस्य खातस्य त्रिषु स्थानेषु भुजवक्रतया दैर्ध्य दशेशार्ककरैः मितम् विस्तृतिः च षट्पंचसप्तहस्ता वेधः अपि द्विचतुस्त्रिकरः तत्र खाते कियन्तः घनहस्ताः स्युः इति मे प्रचक्ष्व ॥ ३० ॥ ३१ ॥ अर्थः-हे मित्र ! जिस खातके तीन स्थानोंमें भुजांके टेढा होनेसे लम्बाई दश, ग्यारह और बारह के मापकी है और चौडाई छ पाँच सातके मापकी है और नाचाई भी दो चार तीन है; उस खातमें घनहस्त कितने होंगे ? यह मुझको कहो ॥ ३० ॥ ३१ ॥