भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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खातव्यवहारः। ( १९७ ) अत्र सममितिकरणेन वि- स्तारे हस्ताः ६ दैर्घ्ये ११ वेधे ३ तत्क्षेत्रदर्शनं यथा-

यथोक्तकरणेन लब्धा घनहस्तसंख्या १९८ ॥ फैलाव-यह विषममिति खात है अर्थात् इसकी भुजाओंके तीन स्थानोंमे टेढे होनेसे तीनों स्थानपै माप करनेपर लंबाई चौडाई और गहराई तीन प्रकारकी होती है इस कारण यह विषमखात कहलाता है, अब इसकी सममिति अर्थात् तीनों लंबाई, चौडाई और गहराइयोंको सम करके प्रमाण जाननेके लिये अर्थात् यह तो विषम खात है और यदि हम समखात खोदकर इसीके अनुसार लंबाई और चौडाई और गहराई लाना चाहें तो वह समखात कितना लंबा, कितना चौडा और कितना गहरा खोदना चाहिये- इस प्रश्नका उत्तर जाननेके लिये ऊपर कही हुई रीति के अनुसार तीनों स्थानकी लंबाइयों १० । ११ । १२ को जोडा तो ३३ तैंतीस हुए, यह लंबाई तीन स्थानकी है, इस कारण स्थान संख्या ३ तीनका लंबाईके योग ३३ में भाग दिया तो ११ ग्यारह लब्धि हुए; यही सममिति करनेपर लंबाई होगी, इसी प्रकार तीनों स्थानकी चौडा- इयों ५ । ६ । ७ को जोडा तो १८ हुए, इसमें चौडाइयाँ तीन स्थानोंमें थीं, इस कारण स्थान संख्या ३ तीनका भाग दिया तब ६ छ लब्धि हुए, सममिति करने पर यही चौडाईका प्रमाण होगा, इसी प्रकार तीनों स्थानोंकी गहराइयों २।३।४ को जोड तो ९ नौ हुए इसमें स्थानसंख्या ३ का भाग दिया तो तीन लब्धि हुए यही उपरोक्त विषम मिति खातकी सममिति करनेपर गहराई होगी अर्थात् उपरोक्त विषममिति खातको यदि सममिति किया जाय तो लंबाईका प्रमाण ११ ग्यारह चौडाईका प्रमाण ६ छ