भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

पृष्ठ 214, कुल 268 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 214

(१९८) लीलावती । और गहराईका प्रमाण ३ तीन होगा, वही आकार क्षेत्रमें देख लो, अब पहले कही हुई समचतुर्भुजक्षेत्रका फल लानेकी रीतिके अनुसार लम्बाई ११ और चौडाई ६ का घात किया तो ६६ छियासठ हुए, इसका गहराई ३ से गुणा किया तो १९८ एकसौ अठानवे हुए; यही ऊपरके खातमें घनहस्तका प्रमाण है ॥ खातान्तरे करणसूत्रं सार्द्धं वृत्तम्- अब अन्य खातकी रीति लिखते हैं डेढ श्लोकमें- मुखजतलजतद्युतिक्षेत्रफलैक्यं हृतं षड्भिः ॥ ५२ ॥ क्षेत्रफलं सममेतद्वेधगुणं घनफलं स्पष्टम् ॥ समखातफलय्र्यंशः सूचीखाते फलं भवति ॥ ५३ ॥ अन्वयः-मुखजतलजतद्युतिक्षेत्रफलैक्यं षड्भिः हृतं समं क्षेत्रफल भवति।एतत् वेधगुणं स्पष्टं घनफलं भवति । सूचीखाते समखातफलय्र्यंशः फलं भवति॥५२॥५३॥ अर्थः-मुखके लंबान, चौडानसे जो क्षेत्रफल आवे तथा तलके लंबान, चौडानसे जो क्षेत्रफल आवे और मुखतलके योग तथा चौडानके योगसे जो क्षेत्रफल आवे इन तीनों क्षेत्रफलोंको जोड ले तब जो अङ्क हो उसमें छका भाग दे तब जो लब्धि हो उसको सम क्षेत्रफल कहते हैं और यदि इसको गहराईसे गुणा किया जाय तो स्पष्ट घनफल होता है, ( जहां मुखके लंबाईसे चौडाईको गुणाकर जो गुणित अङ्क हो उनको गहराईसे गुणा करनेसे जो अङ्क हो उसको खातफल कहते हैं और यही समखात है ) समखातके फलका तीसरा भाग सूचीखातमें फल होता है ॥ ५२ ॥ ५३ ॥ उदाहरणम्- मुखे दशद्वादशहस्ततुल्यं विस्तारदैर्घ्यं तु तले तदर्द्धम् ॥ यस्याः सखे सप्तकरश्च वेधः का खातसंख्या वद तत्र वाप्याम् ॥ ३२ ॥ अन्वयः-हे सखे ! यस्याः मुखे विस्तारदैर्घ्यं दशद्वादशहस्ततुल्यं तले तु तदर्द्धम् वेधः च सप्तकरः तत्र वाप्यां खातसंख्या का स्यात् इति त्वं वद ॥ ३२ ॥ अर्थः-हे मित्र ! जिस बावडीके मुखपर चौडाई १० है और लम्बाई १२ है, उसी बावडीके तलमें चौडाई ५ और लंबाई ६ छ तथा गहराई सात है तो उस बावडीमें खातसंख्या अर्थात् घनहस्तफल क्या होगा ? यह तुम कहो ॥ ३२ ॥