माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । (१०१) श्वासरोगकी सम्प्राप्ति । यदा स्रोतांसि संरुध्य मारुतः कफपूर्वकः । विष्वग्व्रजति संरुद्धस्तदा श्वासान् करोति सः ॥ ३ ॥ सर्व देहमें विचरनेवाला पवन जब कफसे मिलकर प्राण अन्न उदक बहनेवाली सब नसोंके मार्गको रोक देवे तब पवन फिरनेसे रुककर श्वासरोगको प्रगट करे ॥ महाश्वासके लक्षण । उद्धूयमानवातो यः शब्दवद् दुःखितो नरः । उच्चैः श्वसिति संरुद्धो मत्तर्षभ इवानिशम् ॥ ४ ॥ प्रनष्टज्ञानविज्ञानस्तथा विभ्रान्तलोचनः । विवृताक्ष्याननो बद्धमूत्रवर्चा विशीर्ण- वाक् ॥ ५ ॥ दीनः प्रश्वसितं चास्य दूराद्विज्ञायते भृशम् । महाश्वासोपसृष्टस्तु क्षिप्रमेव विपद्यते ॥ ६ ॥ जिसका वायु ऊपरको जायके प्राप्त हो ऐसा मनुष्य दुःखित होकर मुखसे शब्द- युक्त श्वासको निकाले, ऊंचे स्वरसे अथवा जैसे मतवाला बैल शब्द करे इस प्रकार रात्रिदिन श्वाससे पीडित हो उसके ज्ञान विज्ञान जाते रहे, नेत्र चंचल हों और जिसका श्वास लेनेमें नेत्र और मुख फटजांय, मल मूत्र बन्द हो जाय, बोला जाय नहीं अथवा बोले तो मन्द बोले, मन खिन्न हो और जिसका श्वास दूरसे सुनाई दे यह महाश्वास जिस पुरुषके हो वह तत्काल मरणको प्राप्त होय ॥ ऊर्ध्वश्वासके लक्षण । ऊर्ध्वं श्वसिति यो दीर्घं न च प्रत्याहरत्यधः । श्लेष्मावृतमुख- स्रोताः क्रुद्धगन्धवहादितः ॥ ७ ॥ ऊर्ध्वदृष्टिर्विपश्यंश्च विभ्रां- ताक्ष इतस्ततः । प्रमुह्यन्वेदनार्तश्च शुष्कास्योऽरतिपीडितः ॥८॥ बहुत देरपर्यंत ऊंचा श्वास ले, नीचे आवे नहीं, कफसे मुख भरजाय तथा और सब नाडियोंके मार्ग कफसे बन्द हो जायँ, कुपित वायुसे पीडित हो, ऊपरको नेत्र कर चंचल दृष्टिसे चारों ओर देखे, मूर्च्छाकी पीडासे अत्यन्त पीडित हो, मुख सूखे तथा बेहोश हो ये ऊर्ध्वश्वासके लक्षण हैं ॥ ऊपरकोही श्वास ले नीचे नहीं आवे यह जो कहा उसमें कारण कहते हैं— ऊर्ध्वश्वासे प्रकुपिते ह्यधश्वासो निरुध्यते । मुह्यतस्ताम्यतश्चोर्ध्वं श्वासस्तस्यैव हन्त्यसून् ॥ ९ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA