माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
भाषाटीकासमेत । (१०१) श्वासरोगकी सम्प्राप्ति । यदा स्रोतांसि संरुध्य मारुतः कफपूर्वकः । विष्वग्व्रजति संरुद्धस्तदा श्वासान् करोति सः ॥ ३ ॥ सर्व देहमें विचरनेवाला पवन जब कफसे मिलकर प्राण अन्न उदक बहनेवाली सब नसोंके मार्गको रोक देवे तब पवन फिरनेसे रुककर श्वासरोगको प्रगट करे ॥ महाश्वासके लक्षण । उद्धूयमानवातो यः शब्दवद् दुःखितो नरः । उच्चैः श्वसिति संरुद्धो मत्तर्षभ इवानिशम् ॥ ४ ॥ प्रनष्टज्ञानविज्ञानस्तथा विभ्रान्तलोचनः । विवृताक्ष्याननो बद्धमूत्रवर्चा विशीर्ण- वाक् ॥ ५ ॥ दीनः प्रश्वसितं चास्य दूराद्विज्ञायते भृशम् । महाश्वासोपसृष्टस्तु क्षिप्रमेव विपद्यते ॥ ६ ॥ जिसका वायु ऊपरको जायके प्राप्त हो ऐसा मनुष्य दुःखित होकर मुखसे शब्द- युक्त श्वासको निकाले, ऊंचे स्वरसे अथवा जैसे मतवाला बैल शब्द करे इस प्रकार रात्रिदिन श्वाससे पीडित हो उसके ज्ञान विज्ञान जाते रहे, नेत्र चंचल हों और जिसका श्वास लेनेमें नेत्र और मुख फटजांय, मल मूत्र बन्द हो जाय, बोला जाय नहीं अथवा बोले तो मन्द बोले, मन खिन्न हो और जिसका श्वास दूरसे सुनाई दे यह महाश्वास जिस पुरुषके हो वह तत्काल मरणको प्राप्त होय ॥ ऊर्ध्वश्वासके लक्षण । ऊर्ध्वं श्वसिति यो दीर्घं न च प्रत्याहरत्यधः । श्लेष्मावृतमुख- स्रोताः क्रुद्धगन्धवहादितः ॥ ७ ॥ ऊर्ध्वदृष्टिर्विपश्यंश्च विभ्रां- ताक्ष इतस्ततः । प्रमुह्यन्वेदनार्तश्च शुष्कास्योऽरतिपीडितः ॥८॥ बहुत देरपर्यंत ऊंचा श्वास ले, नीचे आवे नहीं, कफसे मुख भरजाय तथा और सब नाडियोंके मार्ग कफसे बन्द हो जायँ, कुपित वायुसे पीडित हो, ऊपरको नेत्र कर चंचल दृष्टिसे चारों ओर देखे, मूर्च्छाकी पीडासे अत्यन्त पीडित हो, मुख सूखे तथा बेहोश हो ये ऊर्ध्वश्वासके लक्षण हैं ॥ ऊपरकोही श्वास ले नीचे नहीं आवे यह जो कहा उसमें कारण कहते हैं— ऊर्ध्वश्वासे प्रकुपिते ह्यधश्वासो निरुध्यते । मुह्यतस्ताम्यतश्चोर्ध्वं श्वासस्तस्यैव हन्त्यसून् ॥ ९ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( १०२ ) माधवनिदान ।
( १०२ ) माधवनिदान । ऊपरका श्वास कुपित होनेसे नीचेका बन्द होय अर्थात् हृदयमें रुकजाय अथवा श्वास कहिये वायु सो नीचे नहीं उतरे तब मनुष्यको मोह हो, ग्लानि हो ऐसे पुरु- षके ऊर्ध्वश्वास प्राणको हरण करे ॥ छिन्नश्वासके लक्षण । यस्तु श्वसिति विच्छिन्नं सर्वप्राणेन पीडितः । न वा श्वसिति दुःखार्त्तो मर्मच्छेदैरुगर्दितः ॥ १० ॥ आनाहस्वेदमूर्च्छार्त्तो दह्यमानेन बस्तिना । विप्लुताक्षः परिक्षीणः श्वसन्नैकलोचनः ॥ ११ ॥ विचेताः परिशुष्कास्यो विवर्णः प्रलपन्नरः । छिन्नश्वासेन विच्छिन्नः स शीघ्रं विजहात्यसून् ॥ १२ ॥ जो पुरुष ठहर ठहरकर जितनी शक्ति हो उतनी शक्तिसे श्वास त्याग करे अथवा क्लेशको प्राप्त हो श्वासको नहीं छोडे और मर्म कहिये हृदय बस्ति ( मूत्र- स्थान ) और नाडियोंको मानो कोई छेदन करे ऐसी पीडा हो, पेटका फूलना, पसीना और मूर्च्छा इनसे पीडित हो, वस्ति ( मूत्रस्थान ) में जलन हो, नेत्र चला- यमान हों, अथवा नेत्र आंसुओंसे भरे हों, श्वास लेते २ थक जाय तथा श्वास लेते २ एक नेत्र लाल हो जाय ( यह व्याधिके प्रभावसे होय है दोषके प्रभावसे होय तो दोनों होजायँ ), उद्विग्नचित्त होजाय, मुख सूखे, देहका वर्ण पलट जाय, बकवाद करे, संधिके सब बन्ध शिथिल होजायँ, इस छिन्नश्वास करके मनुष्य शीघ्र प्राणका त्याग करे ॥ तमकश्वासके लक्षण । प्रतिलोमं यदा वायुः स्रोतांसि प्रतिपद्यते । ग्रीवां शिरश्च संगृह्य श्लेष्माणं समुदीर्य च ॥ १३ ॥ करोति पीनसं तेन रुद्धो घुर्घुरकं तथा । अतीव तीव्रवेगेन श्वासं प्राणप्रपीडकम् ॥ १४ ॥ प्रताम्यति स वेगेन त्रस्यते संनिरुद्ध्यते । प्रमोहं कासमानश्च स गच्छति मुहुर्मुहुः ॥ १५ ॥ श्लेष्मणा मुच्यमा- नेन भृशं भवति दुःखितः । तस्यैव च विमोक्षान्ते मुहूर्त्तं लभते सुखम् ॥ १६ ॥ तथाऽस्योध्वंसते कण्ठः कृच्छ्रा- च्छक्नोति भाषितुम् । न चापि निद्रां लभते शयानः श्वास- पीडितः ॥ १७ ॥ पार्श्वे तस्यावगृह्णाति शयानस्य समीरणः । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( १०३ ) आसीनो लभते सौख्यमुष्णं चैवाभिनन्दति ॥ १८ ॥ उच्छ्रि- ताक्षो ललाटेन स्विद्यता भृशमार्त्तिमान् । विशुष्कास्यो मुहुः श्वासो मुहुश्चैवावधम्यते ॥ १९ ॥ मेघाम्बुशीतप्राग्वातैः श्लेष्मलैश्च विवर्द्धते । स याप्यस्तमकश्वासः साध्यो वा स्या- न्नवोत्थितः ॥ २० ॥ जिस कालमें शरीरकी पवन उलटी गतिसे नाडियोंके छिद्रमें प्राप्त होकर मस्तक तथा कण्ठका आश्रय कर कफसंयुक्त होय, तब कफसे रुककर अतिवेगपूर्वक कण्ठमें घुरघुर शब्द करे और मस्तकमें पीनस्रोग करे और अत्यन्त तीव्र वेगसे हृदयको पीडाका करनेवाला ऐसे श्वासको उत्पन्न करे उस श्वासके वेगसे मूर्च्छित होय, त्रासको प्राप्त होय, चेष्टारहित होय और खांसीके उठनेसे बडे मोहको बारंबार प्राप्त होय और जब कफ छूटे तब दुःख होय और कफ छूटनेके बाद दो घटी पर्यन्त सुख पावे, कण्ठमें खुजली चले, बडे कष्टसे बोले, श्वासकी पीडासे नींद न आवे, सोवे तो वायुसे पसवाडोंमें पीडा होय, बैठे ही चैन पडे और गरमीके पदार्थोंसे खुश होय, नेत्रोंमें सूजन होय, ललाटमें पसीना आवे, अत्यन्त पीडा होय, मुख सूखे, बारंबार श्वास और बारंबार हाथीपर बैठनेके सदृश सर्व देह चलायमान होवे । यह श्वास मेघके वर्षनेसे, शीतसे, पूर्वकी पवनसे और कफकारक पदार्थोंके सेवन करनेसे बढे है. यह तमकश्वास याप्य है, यदि नया प्रगट भया होय तो साध्य होय है ॥ पित्तका अनुबन्ध होकर ज्वरादिकोंका योग होनेसे प्रतमक होय है, उसको कहते हैं- ज्वरमूर्च्छापरीतस्य विद्यात्प्रतमकं तु तम् । इस तमकश्वासमें ज्वर और मूर्च्छा ये दोनों लक्षण होनेसे इसको प्रतमकश्वास कहते हैं ॥ प्रतमकके दूसरे लक्षण और कारण कहते हैं- उदावर्त्तरजोजीर्णक्लिन्नकायनिरोधजः ॥ २१ ॥ तमसा वर्धतेऽत्यर्थं शीतैश्चाशु प्रशाम्यति । मज्जतस्तमसीवास्य विद्यात्प्रतमकं तु तम् ॥ २२ ॥ उदावर्त, धूल, आमादि अजीर्ण, विदग्धान्न, मलमूत्रादि वेगके रोकनेसे अथवा क्लिन्नकाय कहिये वृद्ध मनुष्य और निरोध कहिये वेगरोध इन कारणोंसे प्रगट भई जो श्वास सो अन्धकारसे अथवा तमोगुणसे अत्यन्त बढे और शीतल उपचारसे शीघ्र शांति हो जाय, इस श्वासके योगसे रोगीको अन्धकारमें डूबा सदृश मालूम होय, इसको प्रतमकश्वास ऐसे कहते हैं ॥
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( १०४ ) माधवनिदान ।
( १०४ ) माधवनिदान । क्षुद्रश्वासके लक्षण और साध्यासाध्य । रूक्षायासोद्भवः कोष्ठे क्षुद्रो वातमुदीरयेत् । क्षुद्रश्वासो न सोऽत्यर्थं दुःखैनाङ्ग-प्रबाधकः ॥ २३ ॥ हिनस्ति न स गात्राणि न च दुःखी यथेतरे । न च भोजनपानानां निरुणद्ध्युचितां गतिम् ॥ २४ ॥ नेन्द्रियाणां व्यथां चापि काञ्चिदापादयेद्रुजम् । स साध्य उक्तो बलिनः सर्वे चाव्यक्तलक्षणाः ॥ २५ ॥ क्षुद्रः साध्यतमस्तेषां तमकः क्षुद्र उच्यते । त्रयः श्वासा न सिध्यन्ति तमको दुर्बलस्य च ॥ २६ ॥ रूखा पदार्थ खानेसे, श्रमके करनेसे प्रगट भई जो क्षुद्र श्वास सो पवनको ऊपर ले जाय, यह क्षुद्रश्वास अत्यन्त दुःखदायक नहीं है तथा अंगोंको कुछ विकार नहीं करे। जैसे ऊर्ध्वश्वासादिक दुःखदायक हैं ऐसे यह नहीं है और भोजनपानादिकोंकी उचित गतिको बन्द नहीं प्रगट करे और इन्द्रियोंको पीडा नहीं करे और कोई रोगको भी नहीं प्रगट करे । यह क्षुद्रश्वास साध्य कहा है । बलवान् पुरुषके सब महाश्वासादिकोंके लक्षण प्रगट न होयँ तो साध्य हैं, तिनमें भी क्षुद्रश्वास अत्यन्त साध्य है और तमकको क्षुद्र कहते हैं । अथवा-“ तमकः क्षुद्र उच्यते ” इस जगह “ तमकः कृच्छ्र उच्यते ” ऐसा भी पाठ कोई कहते हैं । उसका अर्थ यह है कि, तमक कृच्छ्रसाध्य है, महान्, ऊर्ध्व और छिन्न ये तीन श्वास सम्पूर्ण लक्षणयुक्त साध्य नहीं और निर्बल पुरुषके तमकश्वास भी साध्य नहीं होय ॥ कामं प्राणहरा रोगा बहवो न तु ते तथा । यथा श्वासश्च हिक्का च हरतः प्राणमाशु वै ॥ २७ ॥ प्राणहरण करनेवाले ऐसे सन्निपात ज्वरादिक रोग बहुतसे हैं सो ठीक है । परन्तु श्वास और हिचकी ये जैसे जल्दी प्राण हरण करते हैं ऐसे और ज्वरादिक नहीं करे॥ इति श्रीपंडितदत्ताराममाथुरप्रणीतमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषाटीकायां श्वासनिदानं समाप्तम् ॥
अथ स्वरभेदनिदानम् ।
भाषाटीकासमेत । (१०५) अथ स्वरभेदनिदानम् । अत्युच्चभाषणविषाध्ययनाभिघातसंदूषणैः प्रकुपिताः पवना- दयस्तु । स्रोतःसु ते स्वरवहेषु गताः प्रतिष्ठां हन्युः स्वरं भवति चापि हि षड्विधः सः ॥ वातादिभिः पृथक् सर्वैर्मेदसा च क्षयेण च ॥ १ ॥ बहुत जोरसे बोलनेसे, विषके खानेसे, ऊंचे स्वरसे पाठ करनेसे अर्थात् वेदादि पाठ करनेसे कण्ठमें लकडी काष्ठ आदिकी चोट लगनेसे कोपको प्राप्त हुए जो वात, कफ, पित्त सो कण्ठमें स्वरके बहनेवाली चार नसें हैं उनमें प्राप्त हो अथवा उनमें वृद्धिको प्राप्त स्वरको नाश करे । यह स्वरभेद वात, पित्त, कफ, सन्निपात, क्षय और मेद इन भेदोंसे छः प्रकारका है ॥ वातस्वरभेदके लक्षण । वातेन कृष्णनयनाननमूत्रवर्चा भिन्नं स्वरं वदति गर्दभवत्स्वरं च । वायुसे स्वरभंग होय तो रोगीके नेत्र, मुख, मूत्र और विष्ठा यह काले होयँ वह पुरुष टूटाहुआ शब्द बोले अथवा गधेके स्वरप्रमाण कर्कश बोले ॥ पित्तज स्वरभेदके लक्षण । पित्तेन पीतनयनाननमूत्रवर्चा ब्रूयाद्गलेन स च दाहसमन्वितेन ॥ २॥ पित्तस्वरभेदवाले मनुष्यके नेत्र, मुख, मूत्र और विष्ठा ये पीले होते हैं और बोलते समय गलेमें दाह होता है ॥ कफके स्वरभेदके लक्षण । ब्रूयात्कफेनससतंकफरुद्धकण्ठः स्वल्पंशनैर्वदतिचापि दिवाविशेषात्। कफके स्वरभेदमें, कण्ठ कफसे रुका रहे और मन्द मन्द तथा थोडा बोले दिनमें बहुत बोले ॥ सन्निपातके स्वरभेदका लक्षण । सर्वात्मके भवति सर्वविकारसंपत्तं चाप्यसाध्यमृषयः स्वरभेदंमाहुः ३ सन्निपातके स्वरभेदमें तीनों दोषोंके लक्षण होते हैं यह स्वरभेद असाध्य है ऐसे ऋषि लोग कहते हैं ॥ १ यदुक्तं सुश्रुते-द्वाभ्यां भाषते द्वाभ्यां घोषं करोति, भाषणघोषणयोरल्पमहत्त्वाभ्यां भेदः ।
( १०६ ) माधवनिदान ।
( १०६ ) माधवनिदान । क्षयजन्यस्वरभेदके लक्षण । धूम्येत वाक्क्षयकृते क्षयमाप्नुयाच्च वागेश चापि हतवाक्परिवर्जनीयः। क्षयीके स्वरभेदवाले पुरुषके बोलते समय मुखसे धुआँसा निकले और वाणी क्षय हो जाय अर्थात् स्वर नहीं निकले । इस स्वरभेदमें जिस समय वाणी हत हो जाय अर्थात् ओजका क्षय होनेसे बोलनेकी सामर्थ्य नहीं हो तब यह असाध्य होता है और ओजका क्षय ( नाश ) नहीं हो तो साध्य है ॥ मेदके स्वरभेदका लक्षण । अन्तर्गतस्वरमलक्ष्यपदं चिरेण मेदोन्वयाद्वदति दिग्धगलस्तृषार्त्तः४ मेदके सम्बन्धसे कफ अथवा मेदसे गला लिप्त होय अथवा मेदसे स्वरके मार्ग रुक जानेसे प्यास बहुत लगे, गलेके भीतर बोले और मन्द बोले ॥ असाध्य लक्षण । क्षीणस्य वृद्धस्य कृशस्य चापि चिरोत्थितो यस्य सहोपजातः । मेदस्विनः सर्वसमुद्भवश्च स्वरामयो यो न स सिद्धिमेति ॥ ५ ॥ क्षीण पुरुषके, वृद्धके, कृशके, बहुत दिनका, जन्मके संग ही प्रगट भया, मोटें पुरुषके और सन्निपातोद्भव ऐसा स्वरभेदरोग साध्य नहीं होता ॥ इति श्रीपंडितदत्ताराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां स्वरभेदनिदानं समाप्तम् ॥ अथारोचकनिदानम् । ───◇◆◇─── वातजादि अरुचियोंके लक्षण । वातादिभिः शोकभयातिलोभक्रोधैर्मनोग्राशनरूपगन्धैः । अरोचकाः स्युः परिहृष्टदन्तकषायवक्त्रश्च मतोऽनिलेन ॥ १ ॥ पृथक् वातादिक दोषों करके ३, सन्निपातसे १, आगन्तुकसे १ जैसे भयसे अतिलोभसे तथा अतिक्रोधसे ऐसे पांच प्रकारका अरोचक ( अरुचि ) रोग है । वह मनको क्लेश देनेवाला अन्न, रूप और गन्ध इन कारणोंसे प्रगट होता है । सुश्रुत और अन्य ग्रन्थोंके मतसे भी पांच ही प्रकार मुख्य माने हैं, भय, लोभ, क्रोधकी अरुचिको शोककी ही अरुचिके अन्तर्गत मानते हैं । बादीकी अरुचिसे दांत खट्टे हो और मुख कसेला होय ॥ १ अरोचको भवेद्दोषैरेको हृदयसंश्रयैः । सन्निपातेन मनसः सन्तापेन च पञ्चमः ॥ इति ॥
भाषाटीकासमेत । ( १०७ ) कट्वम्लमुष्णं विरसं च पूति पित्तेन विद्याल्लवणं च वक्त्रम् । माधुर्यपैच्छिल्यगुरुत्वशैत्यविबद्धसंबद्धयुतं कफेन ॥ २ ॥ पित्तकी अरुचिसे कडुआ, खट्टा, गरम, विरस, दुर्गंधयुक्त, लुनखरा ऐसा मुख होय है, कफकी अरुचिसे खारा, मीठा, पिच्छिल, भारी, शीतल मुख होय है और मुख बँधा सरीखा अर्थात् खाय नहीं और भीतर कफसे लिप्त होय ॥ शोकादि अरुचिके लक्षण । अरोचके शोकभयातिलोभक्रोधाद्यहृद्याशुचिगन्धजे स्यात् । स्वाभाविकं चास्यमथारुचिश्च त्रिदोषजे नैकरसं भवेत्तु ॥ ३ ॥ शोक, भय, अतिलोभ, क्रोध, अहृद्य (मनको बुरी लगे ऐसी वस्तु) अपवित्र बास इनमें प्रगट हुई अरुचिमें मुख स्वाभाविक रहे अर्थात् वातजादिकोंके सदृश कसेला, खट्टा आदि नहीं होय । सन्निपातकी अरुचिमें अन्नसे अरुचि तथा मुखसे अनेक रस मालूम हों ॥ वातजादि भेदकरके मुखकी विकृतिको कहकर अन्य ठिकानेपर जो विकृति होय है उसे कहते हैं— हृच्छूलपीडानयुतं पवनेनपित्तात्तृड्दाहचोषबहुलं सकफप्रसेकम् । श्लेष्मात्मकं बहुरुजं बहुभिश्चविद्याद्वैगुण्यमोहजडताभिरथापरंच ॥ ४॥ वातकी अरुचिसे हृदयमें शूल और वेदना होती है । पित्तसे प्यास, दाह और चूसनेके सदृश पीडा ये लक्षण होते हैं । कफकी अरुचिमें मुखसे कफ गिरे, सन्निपातकी अरुचिमें पीडा अत्यन्त होय । वैगुण्य कहिये मनकी व्याकुलता, मोह, जडत्व इन लक्षणोंसे अपर कहिये आगंतुक अरोचक जाने । भूख होय परन्तु खानेकी सामर्थ्य न होना इसको अरुचि कहते हैं । आपको प्रिय भी अन्न किसीने दिया हो परन्तु खाय नहीं उसको अन्नाभिनन्दन कहते हैं । अन्नके स्मरण, श्रवण, दर्शन और वास इनसे जिसको त्रास होय उसको भक्तद्वेष कहते हैं । इस प्रकार यह रोग तीन प्रकारका है । इसी वास्ते चरक सुश्रुतने अरोचके शब्द करके संग्रह करा है ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकाया- मरुचिरोगनिदानं समाप्तम् ॥ १ उक्तं हि वृद्धभोजेन–प्रक्षिप्तं यन्मुखे चान्नं जन्तोस्तत्स्वदते मुहुः । अरोचकः स विज्ञेयो भक्तद्वेषमतः शृणु । चिन्तयित्वा तु मनसा दृष्ट्वा श्रुत्वा च भोजनम् । द्वेषमायाति यो जन्तु- र्भक्तद्वेषः स उच्यते ॥ कुपितस्य भयार्त्तस्य अभिचाराभिभूतये । यस्यान्रे न भवेच्छ्रद्धा स भक्तद्वेष उच्यते ॥ इति । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
१०८ ) माधवनिदान ।
१०८ ) माधवनिदान । अथ छर्द्दिनिदानम् । छर्दिके कारण और निरुक्ति । दुष्टैर्दोषैःपृथक्सर्वैर्बीभत्सालोकनादिभिः। छर्दयःपञ्च विज्ञेया- स्तासां लक्षणमुच्यते ॥ १ ॥ अतिद्रवैरतिस्निग्धैरहृद्यैर्लवणै- रपि । अकाले चातिमात्रैश्च तथाऽसात्म्यैश्च भोजनैः ॥ २ ॥ श्रमाद्भयात्तथोद्वेगादजीर्णात्कृमिदोषतः । नार्याश्चापन्नसत्त्वाया स्तथातिद्रुतमश्नतः॥३॥ बीभत्सैर्हेतुभिश्चान्यैर्द्रुतमुत्क्लेशितो बलात् । छादयन्नाननं वेगैरर्दयन्नङ्गभञ्जनैः ॥ निरुच्यते छर्दिरिति दोषो वक्त्रं प्रधावति ॥ ४ ॥ दुष्ट हुए पृथक् और सब दोषों करके तथा दुष्ट वस्तुके देखनेसे आदिशब्द करके दुष्ट गन्धके सूंघनेसे पांच प्रकारकी छर्दि जाननी अर्थात् जिसको रद्द वमन उलटी कहते हैं उसके लक्षण आगे कहते हैं । अत्यन्त पतले अथवा चिकने अहृद्य ( अप्रिय ) वस्तु, खारके पदार्थ इनके सेवन करनेने, कुसमय भोजन करनेसे अथवा अत्यन्त भोजन करनेसे अथवा जो न पचे ऐसे भोजन करनेसे, श्रम, भय, उद्वेग, अजीर्ण, कृमिदोष इन कारणोंसे, गर्भिणी स्त्रीके गर्भकी पीडासे तथा जल्दी२ भोजन करनेसे और बीभत्स ( खोटे ) कारणोंसे जैसे विष्ठा, राध आदिका देखना इनसे तीनों दोष कुपित हो बलसे मुखको आच्छादन करें और अंगोंको पीडा कर मुखद्वारा भोजन किया हुआ सब निकाल देयँ इसको ( छर्दि ) उलटी ऐसे मनुष्य कहते हैं । इस जगह उदानवायु वमन कराती है ॥ छर्दिके पूर्वरूप । हृल्लासोद्गारसंरोधौ प्रसेको लवणास्यता । द्वेषोऽन्नपाने च भृशं वमीनां पूर्वरक्षणम् ॥ ५ ॥ हृदयमें खारा, खट्टा प्रथमही निकले अथवा सूखी रद्द होय, डकार आवे नहीं, लार गिरे, खारी मुख हो जाय, अन्न और पानीसे अत्यन्त अरुचि होय ये छर्दी ( छाट ) के पूर्वरूप हैं ॥ वातकी छर्दिके लक्षण । हृत्पार्श्वपीडा मुखशोषशीर्षनाभ्यर्त्तिकासस्वरभेदतोदैः । १ छादयति मुखम् अर्दयति चाङ्गानि इति छर्दिः ।
भाषाटीकासमेत । ( १०९ ) उद्गारशब्दं प्रबलं सफेनं विच्छिन्नकृष्णं तनुकं कषायम् । कृच्छ्रेण चाल्पं महता च वेगेनातॉऽनिलाच्छर्दयतीह दुःखम्॥६॥ हृदय और पसवाडा इनमें पीडा होय, मुखशोष मस्तक और नाभि इनमें शूल होय, खांसी, स्वरभेद, सूई चुभनेकीसी पीडा हो, डकारका शब्द प्रबल होय, वमनमें झाग आवे, ठहर ठहरकर वमन होय तथा थोडी होय, वमनका रंग काला होय, पतली और कसैली होय, वमनका वेग बहुत होय परन्तु वमन थोडा होय और वेगके प्रभावसे दुःख बहुत होय ये लक्षण वायुकी छर्दिके हैं ॥ पित्तकी छर्दिके लक्षण । मूर्च्छा पिपासा मुखशोषशीर्षताल्वाक्षिसन्तापतमोभ्रमार्तः । पीतं भृशोष्णं हरितं सतिक्तं धूम्रं च पित्तेन वमेत्सदाहम् ॥७॥ मूर्च्छा, प्यास, मुखशोष, मस्तक, तलुआ, नेत्र इनमें सन्ताप अर्थात् तपायमान रहे, अन्धेरा आवे, चक्कर आवे, रोगी पीला गरम हरा कडुआ धूओंके रंगका और दाह युक्त ऐसे पित्तको वमन करे, यह पित्तकी छर्दिका लक्षण है ॥ कफकी छर्दिके लक्षण । तन्द्रास्यमाधुर्यकफप्रसेकं सन्तोषनिद्रारुचिगौरवार्त्तः । स्निग्धं घनं स्वादु कफाद्विशुद्धं सरोमहर्षोऽल्परुजं वमेत्तु ॥ ८ ॥ तन्द्रा, मुखमें मिठास, कफका पडना, सन्तोष (खाये बिनाही तृप्ति), निद्रा, अरुचि, भारीपना इनसे पीडित हो, चिकना, गाढा, मीठा, सफेद ऐसे कफको वमन करे । जब रद् करे तब पीडा थोडी होय, रोमांच हो ये कफकी छर्दिके लक्षण हैं ॥ त्रिदोषकी छर्दिके लक्षण । शूलाविपाकारुचिदाहतृष्णाश्वासप्रमोहप्रबला प्रसक्तम् । छर्दिस्त्रिदोषाल्लवणाम्लनीलसांद्रोष्णरक्तं वमतां नृणां स्यात् ॥९॥ शूल, अजीर्ण, अरुचि, दाह, प्यास, श्वास, मोह इन लक्षणोंसे प्रबल भई जो वमन सो सन्निपातसे होती है । रद् करनेवालेकी वमन खारी, खट्टी, नीली, संघट्ट (जिसको देशवारी मनुष्य जाडी कहे हैं ) गरम लाल ऐसी होय है ॥ असाध्य छर्दिके लक्षण । विट्सवेदमूत्राम्बुवहानि वायुः स्रोतांसि संरुद्ध्य यदोर्ध्वमेति । उत्सन्नदोषस्य समाचितं तं दोषं समुद्धूय नरस्य कोष्ठात् ॥१०॥ १ यदुक्तं सुश्रुते—शुक्लं हिमं सान्द्रकफं कफेन । इति । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( ११० ) माधवनिदान ।
( ११० ) माधवनिदान । विण्मूत्रयोस्तत्समगन्धवर्णं तृट्श्वासकासार्तियुतं प्रसक्तम् । प्रच्छर्दयेद्दुष्टमिहातिवेगात्तथार्दितश्चाशु विनाशमेति ॥ ११ ॥ जिस समय वह वायु पुरीष, पसीना मूत्र और जल इनके बहनेवाली नाड़ि- योंके मार्गको रोककर ऊपर आवे तब ऊपर आनेवाला दोष (मलमूत्रादि) कोठेसे बाहर निकाल वमन करावे उस वमनसे मलमूत्रकीसी दुर्गन्ध आवे, तथा वर्ण भी मल मूत्रके सदृश हो, प्यास, श्वास, खांसी और शूल ये होयँ और यह वमन बारं- बार बडे वेगसे होय है । इस वमनसे पीडित मनुष्य थोडे कालमें नाशको प्राप्त होते हैं । कहते हैं कि, सब छर्दि प्रबल है परन्तु ऐसी छर्दि असाध्य है ॥ आगन्तुकछर्दिके लक्षण । बीभत्सजा दोहृदजाऽऽमजा च याऽसात्म्यजा वा कृमिजा च या हि । सा पञ्चमी तां च विभावयेत्तु दोषोच्छ्रयेणैव यथोक्तमादौ ॥१२ ॥ बीभत्स पदार्थ कहिये मल, राध, रुधिर आदि अपवित्र वस्तुओंके देखनेसे, गन्धसे, स्वादसे, स्त्रीके गर्भ रहनेसे, आमसे, असात्म्य भोजनसे अथवा कृमिरोगसे इन कारणोंसे प्रगट भई आगंतुक पांचवीं छर्दि होती है । उससे पूर्वोक्त लक्षणों- मेंसे जिस दोषके अधिक लक्षण मिले उसी दोषको प्रबल जाने ॥ कृमिकी छर्दिके लक्षण । शूलहृल्लासबहुला कृमिजा च विशेषतः । कृमिहृद्रोगतुल्येन लक्षणेन च लक्षिता ॥ १३ ॥ कृमिकी छर्दिमें शूल, खाली रह ये विशेष होते हैं और बहुधा कृमि और हृदय- रोग इनके लक्षणसदृश लक्षण जानना । जैसे पिछाडी कह आये हैं—“उत्क्लेशः ष्ठीवनं तोदः शूलं हल्लासकस्तमः । अरुचिः श्यावनेत्रत्वं शोषश्च कृमिजे भवेत् ॥ ” कृमिके साध्यासाध्य लक्षण । क्षीणस्य या छर्दिरतिप्रसक्ता सोपद्रवा शोणितपूययुक्ता । सचन्द्रिकां तां प्रवदेदसाध्यां साध्यां चिकित्सेन्निरुपद्रवां च ॥ १४ ॥ क्षीण पुरुषकी अथवा बारम्बार एकसी होनेवाली और कासादि उपद्रवयुक्त और रुधिर राध मिली मोरचंद्रिकाके समान ऐसी छर्दि असाध्य है और जो उप- द्रवरहित हो उसको साध्य समझकर उपाय करे ॥ कृमिके उपद्रव । कासश्वासौ ज्वरो हिक्का तृष्णा वैचित्त्यमेव च । हृद्रोगस्तमकश्चैव ज्ञेयाश्छर्देरुपद्रवाः ॥ १५ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( १११ ) खांसी, श्वास, ज्वर, हिचकी, प्यास, बेचेतपना, हृदयरोग, अँधेरा आना ये छर्द्दिरोगके उपद्रव हैं ॥ मधुकोशं सुनिर्मथ्य सारमाकृष्य वै मया । व्रजभाषाकृता टीका माधवार्थप्रकाशिका ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां छर्द्दिनिदानं समाप्तम् ।
अथ तृष्णानिदानम् । तृष्णाकी सम्प्राप्ति । भयश्रमाभ्यां बलसंक्षयाद्वाप्यूर्ध्वं चितं पित्तविवर्धनैश्च । पित्तं सवातं कुपितं नराणां तालु प्रपन्नं जनयेत्पिपासाम् ॥ १ ॥ भयसे, श्रमसे, बलके क्षयसे और पित्तके बढानेवाले क्रोध उपवासादिकोंसे अपने स्थानमें संचित हुआ जो पित्त और वात ये कुपित होकर ऊपर तालुए (पिपासा- स्थान) में जाय तृष्णा (प्यास) को उत्पन्न करें। इस जगह तालुका तो उपल- क्षणमात्र है तालुके कहनेसे क्लोमस्थान (हृदयमें जो प्यासका स्थान है) उसका भी ग्रहण है, क्योंकि वह भी प्यासका स्थान है, सो चरकमें लिखा है ॥ अन्नजादि तृष्णाकी सम्प्राप्ति । स्रोतःस्वपां वाहिषु दूषितेषु दोषैश्च तृष्णा भवतीह जन्तोः । तिस्रः स्मृतास्ताः क्षतजा चतुर्थी क्षयात्तथा ह्यामसमुद्भवा च॥२ भक्तोद्भवा सप्तमिकेति तासां निबोध लिंगान्यनुपूर्वशश्च ॥ जलके बहनेवाली नसके दूषित होनेसे दोष (अन्न कफ और आम) इनसे तृष्णा रोग होय हैं सो तीन हैं और चौथी (क्षतजतृष्णा जो व्रणवाले पुरुषके होती है) पांचवी क्षयसे होती है छठी आमसे होती है, सातवी अन्नसे होय है। उन्होंके लक्षण
१ रसवाहिनी च धमनी जिह्वामूलगळतालुक्लोम्नः । संशोष्य नृणां देहे कुरुते तृष्णामतिप्रबलाम् ॥
( ११२ ) माधवनिदान ।
( ११२ ) माधवनिदान । क्रमसे कहता हूं। इनमें पहिली चार तृष्णा सुखसाध्य हैं और बाकीकी तीन कष्ट- साध्य हैं। शंका-क्योंजी ! इस श्लोकमें- “स्रोतःसु” यह बहुवचन क्यों धरा यह विरुद्ध है, क्योंकि, सुश्रुतमें तो जलके बहनेवाली दोही नाडी मानी हैं। उत्तर-उद- कके बहानेवाले दो स्रोतोंकाही अनेक विस्तार होनेसे बहुवचन किया है। यहांपर अन्न, कफ आमको दुष्ट करनेसे तथा दुष्ट रोगोंको सम्बन्ध होनेसे अन्न, आम, कफको दोषत्व ग्रहण है यह गयदासका मत है अथवा दोषके कहनेसे वात, पित्त, कफका ही ग्रहण करना चाहिये ॥ वातकी तृषाके लक्षण । क्षामास्यता मारुतसंभवायां तोदस्तथा शंखशिरःसु चापि । स्रोतोविरोधो विरसं च वक्त्रं शीताभिरद्भिश्च विवृद्धिमेति ॥ ३ ॥ वातकी तृषा (प्यास) से मुख उतर जाय अथवा दीन होय, कनपटी और मस्तक इन ठिकाने नोचनेके समान पीडा होय, रस और जल बहनेवाली नाडि- योंका मार्ग रुक जाय, मुखसे स्वाद जाता रहे और शीतल जलके पीनेसे प्यास बढे, चकारसे निद्राका नाश होय ॥ पित्तकी तृषाके लक्षण । मूर्च्छान्नविद्वेषविलापदाहा रक्तेक्षणत्वं प्रततश्च शोषः । शीताभिनन्दा मुखतिक्तता च पित्तात्मिकायां परिदूयनं च ॥ ४ ॥ पित्तकी तृषामें मूर्च्छा, अन्नमें अरुचि, बडबड, दाह, नेत्रोंमें लाली, अत्यन्त शोष, शीत पदार्थकी इच्छा, मुखमें कटुता और सन्ताप ये लक्षण होते हैं ॥ कफकी तृषाके लक्षण । बाष्पावरोधात्कफसंवृतेऽग्नौ तृष्णाबलासेन भवेत्तथा तु । निद्रा गुरुत्वं मधुरास्यता च तृष्णार्दितः शुष्यति चातिमात्रम् ॥५॥ अपने कारणसे कुपित कफ करके जठराग्नि आच्छादित होय तब अग्निकी गरमी अधोगत जलके बहनेवाली नाडियोंको सुखाय कफकी तृषाको प्रगट करें केवल कफसे तृष्णाका प्रगट होना असंभव है, केवल कफ बढे भयेका द्रवीभूत धर्म पतला होनेसे प्यासकर्तृत्व असंभव है और वातपित्तको तृषा करनेवाले होनेसे होय हैं सो ग्रन्थान्तरमें लिखा भी है इसीसे चरकाचार्यने कफकी तृष्णा १ द्वे उदकवहे इति । २ यदुक्तम्-‘पित्तं सवातं कुपितं नराणाम्’ इत्यादि । चरकेऽप्युक्तम्- ‘नोऽग्नेर्विना सर्पणाद्वा तौ हि शोषणे हेतुः’ इति । सुश्रुतेऽप्युक्तम्–मन्दस्याग्नेयवायव्यौ गुणाब- म्बुवहानि च । स्रोतांसि शोषयेद्यस्मात्ततस्तृष्णा प्रवर्तते ॥
भाषाटीकासमेत । ( ११३ ) नहीं कही, सुश्रुतने चिकित्सा में भेद होनेसे कही है और हारीतने भी सपित्त कफकी तृष्णा मानी केवल कफकी नहीं मानी । इस तृष्णामें निद्रा, भारीपना, मुखमें मिठास ये लक्षण होते हैं । इस तृष्णासे पीडित पुरुष अत्यन्त सूख जाता है ॥ क्षतजतृष्णाके लक्षण । क्षतस्य रुक्शोणितनिर्गमाभ्यां तृष्णा चतुर्थी क्षतजा मता तु ॥ ६ ॥ शस्त्रादिकके लगनेसे घाव होय तब उस पुरुषके पीडा और रुधिरका स्राव होनेसे जो तृष्णा होय यह चौथी क्षतजतृष्णा जाननी ॥ क्षयजतृष्णाके लक्षण । रसक्षयाद्या क्षयसंभवा सा तयाभिभूतस्तु निशादिनेषु । पेपीयतेऽम्भः स सुखं न याति तां सन्निपातादिति केचिदाहुः । रसक्षयोक्तानि च लक्षणानि तस्यामशेषेण भिषग्व्यवस्येत् ॥ ७ ॥ रसक्षयसे जो तृष्णा होय उसमें जो लक्षण होते हैं सो क्षयज तृष्णामें होते हैं, तिससे पीडित पुरुष रात्रिदिन बारम्बार पानी पीवे परन्तु सन्तोष नहीं होय । कोई आचार्य इसको सन्निपातसे प्रगट कहते हैं रसक्षयके जो लक्षण कहे वे सब होते हैं सो वैद्योंको जानने चाहिये । रसक्षय लक्षण सुश्रुतमें कहे हैं सो इस प्रकारका रसक्षय होनेसे हृदयमें पीडा, कंप, शोष, बाधिरता ( बहरापना ) और प्यास होती है ॥ आमजतृष्णाके लक्षण । त्रिदोषलिङ्गामसमुद्भवा तु हृच्छूलनिष्ठीवनसादकर्त्री ॥ ८ ॥ आमज कहिये अजीर्णसे जो तृष्णा होय उसमें तीनों दोषोंके लक्षण होते हैं सो सुश्रुतमें लिखा भी है और हृदयमें शूल, लारका गिरना, ग्लानि ये सब होते हैं ॥ अन्नजतृष्णाके लक्षण । स्निग्धं तथाम्लं लवणं च भुक्तं गुर्वन्नमेवाशु तृषां करोति । १ तदुक्तं हारीतेन-स्वाद्वम्ललवणाजीर्णैः क्रुद्धः श्लेष्मा सहोष्मणा । प्रपद्याम्बुवहां स्रोतस्तृष्णां संजनयेन्नृणाम् ॥ शिरसो गौरवं तन्द्रा माधुर्यं वदनस्य च । भक्तद्वेषः प्रसेकश्च निद्राधिक्यं तथैव च ॥ लिङ्गैरैतैर्विजानीयात्तृष्णां कफसमुद्भवाम् ॥ २ रसक्षये हृत्पीडा कंपशोषौ बाधि- रता तृष्णा चेति ॥ ३ अजीर्णात्पवनादीनां विभ्रमो बलवान्भवेत् । इति । सततं यः पिबे- त्तोयं न तृप्तिमधिगच्छति । पुनः काङ्क्षति तोयं च तं तृष्णार्दितमादिशेत् ॥ इति ॥
( ११४ ) माधवनिदान ।
( ११४ ) माधवनिदान । चिकना, खट्टा, खारा, चकारसे कडुवा कसेला आदि जानना, ऐसे भोजनसे तथा मात्राधिक और भारी ऐसा अन्न खानेसे अवश्य ही शीघ्र प्यासको प्रगट करे । दृढबल आचार्यने पांचही तृष्णा कही है-वातकी, पित्तकी, क्षयकी, आमकी, उप- सर्गकी । तहां कफकी आमकी तृषाके अन्तर्गत कही है और क्षतजा वातकी तृषाके अन्तर्गत जाननी और अन्नजा भी वातकी तृषाके अन्तर्गत कही है, क्योंकि भोजनसे वातका कोप होता है। शंका-क्यों जी ! सुश्रुतने मद्यके प्रकरणमें मद्यकी तृष्णा कही है फिर माधवाचार्यने सात ही तृष्णा कैसे कही हैं ? उत्तर- दृढबलाचार्यके मतसे मद्यकी तृषाको वातकी तृषाके अन्तर्गत होनेसे माधवा- चार्यने सातही कही हैं ॥ उपसर्गज तृषाके लक्षण । हीनस्वरः प्रताम्यन्दीनाननशुष्कहृदयगलतालुः ॥ ९ ॥ भवति खलु सोपसर्गा तृष्णा सा शोषिणी कष्टा । ज्वरमोहक्षयकासश्वासाद्युपसृष्टदेहानाम् ॥ १० ॥ हीनस्वर, मोह, मनमें ग्लानि होय, मुख दीन होजाय, हृदय गला और तालु सूख जाय यह तृष्णा उपद्रवोंसे होते हैं। यह मनुष्यको सुखाय डाले और व्याधिसे शरीर कृश होनेसे यह कष्टसाध्य होजाती है। वे उपद्रव ये हैं ज्वर, मोह क्षय, खांसी, श्वास, आदिशब्दसे अतिसारादिकोंका ग्रहण है ये रोग जिसके होय उसके तृष्णा कष्टसाध्य जाननी ॥ असाध्य तृषाके लक्षण । सर्वास्त्वतिप्रसक्ता रोगकृशानां वमिप्रसक्तानाम् । घोरोपद्रवयुक्तास्तृष्णा मरणाय विज्ञेयाः ॥ ११ ॥ वातजादि सब प्रकारकी तृष्णा अत्यन्त बढ़ी हुई अथवा रोगसे कृश भया ऐसे पुरुषके जो तृष्णा है सो अथवा छर्दिसे प्रगट भई जो तृष्णा और जो भयंकर उप- द्रवकरके युक्त ऐसी तृष्णा मारनेका कारण होय है ॥ मधुकोशं सुनिर्मथ्य सारमाकृष्य वै मया । व्रजभाषाकृता टीका माधवार्थप्रकाशिका ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषाटीकायां तृष्णारोगनिदानं समाप्तम् ॥
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अथ मूर्च्छानिदानम् ।
भाषाटीकासमेत । (११६) अथ मूर्च्छानिदानम् । निदान और सम्प्राप्ति । तृष्णा में मोह होता है, इसी से तृष्णाके अनन्तर मूर्च्छाको कहते हैं- क्षीणस्य बहुदोषस्य विरुद्धाहारसेविनः । वेगाघातादभीघाता- द्दीनसत्त्वस्य वा पुनः ॥ १ ॥ करणायतनेषूग्रा बाह्येष्व्वा- भ्यन्तरेषु च । निविशन्ते यदा दोषास्तदा मूर्च्छन्ति मानवाः ॥ २ ॥ संज्ञावहासु नाडीषु पिहितास्वनिलादिभिः । ततो- ऽभ्युपैति सहसा सुखदुःखव्यपोहकृत् ॥ ३ ॥ सुखदुःखव्यपोहा- च्च नरः पतति काष्ठवत् । मोहो मूर्च्छेति तामाहुः षड्विधा सा प्रकीर्त्तिता ॥ ४ ॥ वातादिभिः शोणितेन मद्येन च विषेण च । षट्स्र्वप्येतासु पित्तं तु प्रभुत्वेनावतिष्ठते ॥ ५ ॥ क्षीण पुरुषके बहुत दोषके सञ्चय होनेसे, विरुद्ध आहार क्षीर मत्स्यादिकके सेवन करनेसे, मल मूत्रादि वेगके धारणकरनेसे, लकडी आदिके चोट लगनेसे, अथवा जिस पुरुषका सत्त्वगुण क्षीण होगया हो ऐसे पुरुषकी मनके आयतन (स्थान) बाहरकी चक्षु आदि हैं उसमें और भीतरके मनके बहानेवाली सोतोंमें प्रबल वातादि दोष कुपित हुए जब ठहरते हैं तब मनुष्य मूर्च्छाको प्राप्त होता है। संज्ञाके बहनेवाली नाडियोंमें वातादि दोषों करके आच्छादित होनेसे सुखदुःखका ज्ञान नष्ट होय तब मनुष्य पृथ्वीपर काष्ठकी तरह गिरे। इस रोगको मूर्च्छा अथवा मोह ऐसे कहते हैं। अथवा बाहरकी इन्द्रिय-नेत्र, कान आदि कर्मेन्द्रिय और बुद्धीन्द्रिय इनमें बलवान् दोष (वात, पित्त, कफ) प्रवेश कर संज्ञाकी बहनेवाली जो नाडी तिनको वह वात, पित्त, कफ रोक अन्धकारको प्रगट करे तब मनुष्य काष्ठकी भांति पृथ्वीपर गिरे उसको मूर्च्छा कहते हैं अथवा मोह कहते हैं। सो मूर्च्छा छः प्रकारकी है-वात, पित्त, कफसे तीन प्रकारकी और रुधिर, विष और मद्य इन भेदोंसे तीन प्रकारकी, इन तीनों मूर्च्छाओंमें पित्त है सो मुख्य प्रधान है अथवा व्यापक है ॥ १ उक्तं चाभिधानांतरे-संज्ञोपघाते मूर्च्छीया मूर्च्छा स्यान्मूर्च्छनं तथा । कश्मलं प्रलयो मोहः संन्यासस्तु मृतोपमः ॥ इति ॥
( ११६ ) माधवनिदान ।
( ११६ ) माधवनिदान । मूर्च्छाका पूर्वरूप । हृत्पीडा जृम्भणं ग्लानिः संज्ञादौर्बल्यमेव च । सर्वासां पूर्वरूपाणि यथास्वं च विभावयेत् ॥ ६ ॥ हृदयमें पीडा, जम्भाई, ग्लानि, भ्रांति ये मूर्च्छाके पूर्वरूप हैं। आगे उस मूर्च्छाके वातादि भेद जानने यह भेद प्रगट हुई रूपावस्थामें जानने चाहिये, पूर्वरूपकी अव- स्थामें नहीं जानने चाहिये यह जैज्जटाचार्यका मत है ॥ वातकी मूर्च्छाके लक्षण । नीलं वा यदि वा कृष्णमाकाशमथवाऽरुणम् । पश्यंस्तमः प्रविशति शीघ्रं च प्रतिबुद्ध्यते ॥ ७ ॥ वेपथुश्चाङ्गमर्दश्च प्रपीडा हृदयस्य च । कार्श्यं श्यावारुणा च्छाया मूर्च्छार्ये वातसंभवे ॥ ८ ॥ जो मनुष्य नीले रंगका अथवा काले रंगका तथा लाल रंगका आकाशको देखे पीछे मूर्च्छाको प्राप्त होय और जल्दी होश हो जाय, देहमें कम्प, अंगोंका टूटना, हृदयमें पीडा होय, शरीर कृश हो जाय, शरीरका रंग काला, लाल पडजाय, उसको वातकी मूर्च्छा जाननी ॥ पित्तकी मूर्च्छाके लक्षण । रक्तं हरितवर्णं वा वियत्पीतमथापि वा । पश्यंस्तमः प्रविशति सस्वेदश्च प्रबुद्ध्यते ॥ ९ ॥ सपिपासः ससन्तापो रक्तपीताकुलेक्षणः । संभिन्नवर्चाः पीताभो मूर्च्छा चेत्पित्तसंभवा ॥ १० ॥ जिसको आकाश लाल, हरा, पीला दीखे पीछे मूर्च्छा आवै और सावधान होते समय पसीना आवे, प्यास होय, सन्ताप होय, नेत्र लाल पीले होयँ, मल पतला होय, देहका वर्ण पीला होय यह लक्षण पित्तकी मूर्च्छाके हैं ॥ कफकी मूर्च्छाके लक्षण । मेघसंकाशमाकाशमावृतं वा तमो घनैः । पश्यंस्तमः प्रविशति चिराच्च प्रतिबुद्ध्यते ॥ ११ ॥ गुरुभिः प्रावृतैरङ्गैर्यथैवार्द्रेण चर्मणा । सप्रसेकः सहृल्लासो मूर्च्छाये कफसंभवे ॥ १२ ॥ १ मूर्च्छायशब्दो मूर्च्छापर्यायः । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( ११७ ) कफकी मूर्च्छामें आकाशको मेघके समान अथवा अंधकारके समान अथवा बादल इनसे व्याप्त देखकर मूर्च्छार्गत होय; देरमें सावधान होय भारी बोझासा देहपर भार मालूम होय अथवा गीला चमडा धारण करासा मालूम होय, मुखसे पानी गिरे, रद्द होयगी ऐसा मालूम होय ॥ सन्निपातकी मूर्च्छाके लक्षण । सर्वाकृतिः सन्निपातादपस्मार इवापरः । स जन्तुं पातयत्याशु विना बीभत्सचेष्टितैः ॥ १३ ॥ सन्निपातकी मूर्च्छामें सब दोषोंके लक्षण होते हैं, ये रोग दूसरा अपस्मार ( मृगी ) जानना चाहिये । परन्तु अपस्मारमें दांतोंका चबाना, मुखसे झागका गिरना, नेत्रोंका हाल औरही प्रकारका हो जाना इत्यादिक लक्षण होते हैं सो इस रोगमें नहीं होते, इतनाही भेद है । शङ्का-क्यों जी ! पूर्व तो छःप्रकारकी मूर्च्छा कह आये फिर सन्निपातकी मूर्च्छा कैसे कही ? उत्तर-चरककेकी अष्टोत्तरीयाध्यायमें लिखा है. जैसे-अपस्मार चार प्रकारका है वातका, पित्तका, कफका, सन्निपातका, उसी प्रकार मूर्च्छारोगभी चार प्रकारका है इसी मतको ग्रहण कर माधवाचार्यने सन्नि- पातकी मूर्छा कही है । प्रथम रक्तजादि छः सुश्रुतके मतसे लिखी हैं और सन्नि- पातकी चरकके मतसे, क्योंकि, इस संग्रह ग्रन्थमें शास्त्रोंके स्वीकार होनेसे सुश्रुत चरक दोनोंकाही मत लिखने पडा है ॥ रक्तकी मूर्च्छाके लक्षण । पृथिव्यापस्तमोरूपं रक्तगन्धस्तदन्वयः । तस्माद्रक्तस्य गन्धेन मूर्च्छन्ति भुवि मानवाः । द्रव्यस्वभाव इत्येके दृष्ट्वा यदभिमुह्यति ॥ १४ ॥ पृथिवी और जल ये दोनों तमोगुण विशिष्ट हैं सो सुश्रुतमें लिखा है । और रुधिरकी गन्ध भी उन दोनोंसे अर्थात् पृथ्वी और जलसे प्रगट है तो रुधिरकी गन्ध भी तमोगुणविशिष्ट हुई इसीसे जो तामसी पुरुष हैं वे रुधिरकी गन्धसे मूर्छित होते हैं। और जो राजसी, सात्त्विकी पुरुष हैं सो मूर्छित नहीं होते. शंका-क्यों जी ! चम्पक आदि ( चम्पा ) पुष्पोंकी गंधसे भी मूर्छा होनी चाहिये. क्योंकि, उसमें भी पार्थिव अर्थात् तामसगुणविशिष्ट गन्ध है। इसवास्ते उत्तर कहते हैं-“ द्रव्यस्वभाव इत्येके ” अर्थात् कोई आचार्य कहते हैं कि, ये द्रव्यका ही स्वभाव है अर्थात् १ चतस्रो मूर्च्छा अपस्मारे व्याख्याताः । यथा चत्वारोऽपस्माराः वातेन, पित्तेन, श्लेष्मणा सन्निपातेन तद्वन्मूर्च्छा अपीत्यर्थः । २ तमोबहुला पृथ्वर्वी सत्त्वतमोबहुला आप इति । ३ यदुक्तं भोजेन-स्तब्धांगदृष्टिर्भवति मूढोच्छ्वासस्तथैव च । दर्शनादसृज,तस्माद्गन्धाच्चैव प्रमुह्यति। इति॥
( ११८ ) माधवनिदान ।
( ११८ ) माधवनिदान । रुधिरका यही स्वभाव है कि, जिसकी गन्धसे ही मनुष्य मूर्छित होता है । अब स्वभावको और भी दृढ करते हैं-“ दृष्ट्वा यदभिमुह्यति ” अर्थात् रक्तके देखनेसे भी मूर्च्छित होय सो लिखा भी है ॥ विष और मद्यसे उत्पन्न मूर्च्छाको कहते हैं— गुणास्तीव्रतरत्वेन स्थितास्तु विषमद्ययोः । त एव तस्मादाभ्यां तु मोहौ स्यातां यथेरितौ ॥ १५ ॥ तैलादिकोंमें जो दश गुण हैं वे ही गुण विष और मद्यमें अत्यंत तीव्रतासे रहते हैं । इसी विष और मद्यके सेवन करनेसे मोह होता है इसमें भी मद्यमें तीव्र रहै और विषमें तीव्रतर रहै इसीसे विषको मोह स्वयं शांत नहीं होता, क्योंकि, विष अपाकी है और मद्यका मोह मद्यके नशा उतरेपर शांत हो जाता है । यह भेद विष और मद्यमें रहता है ॥ रक्तादि तीन मूर्च्छाओंके लक्षण । स्तब्धाङ्गदृष्टिस्त्वसृजा मूढोच्छ्वासश्च मूर्च्छितः ॥ १६ ॥ मद्येन विलपञ्छेते नष्टविभ्रान्तमानसः । गात्राणि विक्षिपन्भूमौ जरां यावन्न याति तत् ॥ १७ ॥ वेपथुस्वप्नतृष्णाः स्युस्तमश्च विषमूर्च्छिते । वेदितव्यं तीव्रतरं यथास्वं विषलक्षणैः ॥ १८ ॥ रुधिरकी मूर्च्छामें अंग और नेत्र निश्चल हो जायं और श्वास अच्छे प्रकार आवे नहीं । बहुत मद्यके पीनेसे जो मूर्च्छा हो उसके ये लक्षण हैं । बहुत बकता हुआ सोय जाय, संज्ञा जाती रहै, भ्रमयुक्त होय और जबतक मद्य न पचे तबतक पृथ्वीमें हाथ पैर पटके । विषजन्य मूर्च्छामें कांपे, सोवे, प्यास लगे और अँधेरा आवे, एवं विष वृक्षके मूल, पत्र, दूध इनके भेदकर जो विषभक्षणसे लक्षण होते हैं, सो सब लक्षण होते हैं ॥ मूर्च्छा, भ्रम, तन्द्रा और निद्रा इनके भेद । मूर्च्छा पित्ततमःप्राया रजःपित्तानिलाद्भ्रमः³ । तमोवातकफात्तन्द्रा निद्रा श्लेष्मतमोभवा ॥ १९ ॥ १ यदुक्तं दृढबलेन—लघु रूक्षमाशु विशदं व्यवायि तीक्ष्णं विकाशि च । उष्णमनिर्देश्यरसं दशगुणमुक्तं विषं तज्ज्ञैः ॥ इति । २ ये विषस्य गुणाः प्रोक्ताः सन्निपातप्रकोपिनः । त एव मद्ये दृश्यन्ते विषे तु बलवत्तराः ॥ इति । ३ तत्र भ्रमः स्थाणौ पुरुषज्ञानं पुरुषे विपरीतसत्त्व- ज्ञानादिकम् । अन्ये चक्रस्थितस्येव संभ्रमवस्तुदर्शनमिति ॥
भाषाटीकासमेत । ( ११९ ) मूर्च्छामें पित्त और तमोगुण अधिक रहे । रजोगुण पित्त और वायु इनसे भ्रम होय है । तमोगुण, वायु और कफ इनसे तन्द्रा और कफ तथा तमोगुण इनसे निद्रा उत्पन्न होती है ॥ तन्द्राके लक्षण । इन्द्रियार्थेष्वसंप्राप्तिर्गौरवं जृम्भणं क्लमः । निद्रार्त्तस्येव यस्यैते तस्य तन्द्रां विनिर्दिशेत् ॥ २० ॥ इन्द्रियें अपने अपने विषयको ग्रहण न करें, देह भारी हो जाय अर्थात् सुस्त हो जाय, जम्भाई और क्लम होय ये लक्षण निद्रार्त्त पुरुषके सदृश जिसके होयं उसको तन्द्रा कहते हैं । इसमें आधे नेत्र खुले रहते हैं । निद्रामें इन्द्रिय और मनको मोह होय है, तन्द्रामें केवल इंद्रियोंको ही मोह होता है । निद्रा और भ्रम ये दोनों अति- प्रसिद्ध होनेसे माधवाचार्यने नहीं कहे, परन्तु चरकमें कहे हैं सो इस प्रकारकी- जिस समय मन और इन्द्रिय खेदको प्राप्त होयं और अपने अपने विषय ( शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ) को त्याग देयं, तब यह मनुष्यको निद्रा आती है ॥ संन्यासके भेदको कहते हैं- दोषेषु मदमूर्च्छाद्या गतवेगेषु देहिनाम् । स्वयमेवोपशाम्यन्ति संन्यासो नौषधैर्विना ॥ २१ ॥ दोषोंके वेग होनेसे मदमूर्च्छादि अपने आप शान्त हो जाते हैं परन्तु यह संन्यास औषधके बिना शान्त नहीं होता है ॥ संन्यासके लक्षण । वाग्देहमनसां चेष्टा आक्षिप्यातिबला मलाः । संन्यस्यन्त्यबलं जन्तुं प्राणायतनमाश्रिताः ॥ २२ ॥ स ना संन्याससंन्यस्तः काष्ठीभूतो मृतोपमः । प्राणैर्विमुच्यते शीघ्रं मुक्त्वा सद्यःफलां क्रियाम् ॥ २३ ॥ अत्यन्त बलिष्ठ भये जो दोष सो वाणी देह और मन इनके व्यापारको बन्दकर हृदयमें प्राप्त हो निर्बलमनुष्यको मूर्च्छा करे वह संन्याससे पीडित मनुष्य काष्ठकी भांति पृथ्वीपर गिरे, उसकी सद्यःफल चिकित्सा अर्थात् सुईसे छेदना, तीखा १ यदा तु मनसि क्लान्ते कर्मात्मानः क्लमान्विताः । विषयेभ्योनिर्वर्त्तन्ते तदा स्वपिति मानवः॥ २ चक्रवद्भ्रमतो गात्रं भूमौ पतति सर्वदा । भ्रमरोग इति ज्ञेयो रजःपित्तानिलात्मकः ॥
( १२० ) माधवनिदान ।
( १२० ) माधवनिदान । अञ्जनका लगाना, अनामिकाको पीडित करना, कौंचकी फली लगाना, दाह देना, नास देना इत्यादिक न करे तो वह रोगी प्राणवियुक्त कहिये मरणको प्राप्त हो अन्यथा बचे है ॥ मधुकोशं सुनिर्मथ्य सारमाकृष्य यत्नतः । ब्रजभाषाकृता टीका माधवार्थप्रकाशिका ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीभाषाटीकायां मूर्च्छानिदानं समाप्तम् ॥ अथ मदात्ययनिदानम् । ये विषस्य गुणाः प्रोक्तास्तेऽपि मद्ये प्रतिष्ठिताः । तेन मिथ्योपयुक्तेन भवत्युग्रो मदात्ययः ॥ १ ॥ किंतु मद्यं स्वभावेन यथैवान्नं तथा स्मृतम् । अयुक्तियुक्तं रोगाय युक्तियुक्तं यथाऽमृतम् ॥ २ ॥ विषके जो गुण कहे हैं सोई गुण मद्यमें हैं अर्थात् यही मद्य अविधिसे सेवन करामया घोर भयंकर मदात्यय रोग प्रगट करे हैं। कोई ऐसी शंका करे कि, विषके गुण मद्यमें हैं इससे विषके समान मद्यको सेवन न करे । इस विषयमें कहते हैं कि, मद्य यह स्वभावसे ही जैसे अन्न देहधारक है ऐसा ही है, परन्तु वह मद्य अविधिसे पावे तो रोगकारक होता है और विधिंसे सेवन करे तो अमृतके समान गुण करे ॥ विधिसे मद्य पीनेका लक्षण। विधिना मात्रया काले हितैरन्नैर्यथाबलम् । प्रहृष्टो यः पिबेन्मद्यं तस्य स्यादमृतं यथा ॥ ३ ॥ स्निग्धैः सदन्नैर्मासैश्च सह भक्ष्यैश्च सेवितम् । भवेदायुःप्रकर्षाय बलायोपचयाय च ॥ ४ ॥ १ विधिश्चायं तद्यथा-कुसुमितलतोपगूढः प्रकटनिरन्तरनवां कुरनिकररोमांचैः मधुकरमधुर- झंकारसीत्कारैर्मुक्ककण्ठकलकण्ठकूजितै-दक्षिणसमीरणोद्विजितसमुल्लसितपल्लवकरप्रचारैस्तबणे स्तबभिरुपक्रांततरललताभिरतिशोभनेषु वनोपवनेषु तुषारकिरणै रंजितप्रदोषेषु श्रृंगारसमुचि- तालंकृतिकमनीयकामिनीसमर्पितं ललिटललनोपनीयमानं सुरभिरुचिररूपरसोपदंशकं नाम परिमितपराद्धंमधुपानं कं न सुखयति । चरकेण तु विस्तरेणैतदुक्तं विद्धि।