माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २०६ ) माधवनिदान । असाध्य लक्षण । शूनाक्षं कुटिलोपस्थमुपक्लिन्नतनुत्वचम् । बलशोणितमांसाग्निपरिक्षीणं च वर्जयेत् ॥ ३४ ॥ जिस उदररोगीके नेत्रोंपर सूजन होय लिंग टेढा हो गया हो, पेटकी त्वचा गीली तथा पतली होगई हो, बल, रुधिर, मांस और अग्नि ये जिसके क्षीण हो गये हों ऐसा रोगी त्याज्य है ॥ दूसरे असाध्य लक्षण । पार्श्वभङ्गान्नविद्वेषशोथातीसारपीडितम् । विरिक्तं चाप्युदरिणं पूर्यमाणं विवर्जयेत् ॥ ३५ ॥ पार्श्वभंग (पसलियोंमें पीडा), अन्नमें अरुचि, शोथ, अतिसार इनसे पीडित और दस्त करानेसे जिसका पेट फिर पानीसे भरजाय, ऐसे उदररोगीको वैद्य त्यागदेय ॥ इति श्रीपंडितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायाम् उदररोगनिदानं समाप्तम् ॥ अथ शोथरोगनिदानम् । ————܀———— शोथकी सम्प्राप्ति । रक्तपित्तकफान्वायुर्दुष्टो दुष्टान्बहिः शिराः । नीत्वा रुद्धगतिस्तैर्हि कुर्यात्त्वङ्मांससंश्रयम् ॥ सोत्सेधं संहतं शोथं तमाहुर्निचयादतः ॥ १ ॥ कुपित भई वायु स्वकारणसे दुष्टभये रक्तपित्तकफको बाह्यशिरा (बाहरकी नाडियों) में प्राप्त करके पुनः उन्हीं रक्तपित्त कफसे रुकगया है मार्ग जिसका ऐसा यह पवन त्वचा और मांस इनके आश्रयसे सूजन उत्पन्न करे, वह सूजन ऊंची और कठिन होय, इसको रक्तसहित त्रिदोषोंका सम्बन्ध है, इससे इस शोथको सन्निपा- तात्मक कहते हैं “त्वङ्मांससंश्रयम्” इस पदसे व्रणशोथसे शोथका भेद दिखाया क्योंकि व्रणशोथकी उत्पत्ति आठ व्रणवस्तुओंमें होती है, सो कहा भी है—“त्वङ्- मांसशिरास्नाय्वस्थिसन्धिसन्धिकोष्ठमर्माणि इति अष्टौ व्रणवस्तूनि भवंति ” इति ॥ सर्वहेतुविशेषैस्तु रूपभेदान्नवात्मकम् । दोषैः पृथग्द्वयैः सर्वैरभिघाताद्विषादपि ॥ २ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA