भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेत । (२४३) अथ भगन्दरनिदानम् । ❖❖❖❖❖❖❖ गुदस्य द्व्यंगुले क्षेत्रे पार्श्वतः पिटिकाऽऽर्तिकृत् । भिन्नो भगन्दरो ज्ञेयः स च पंचविधो मतः ॥ १ ॥ गुदाके समीप दो अंगुल ऊंची पिछाडी एक पिडिका ( फुन्सी ) हो उसमें बहुत पीडा होय, पिडिका फूटजाय उसको भगन्दररोग कहते हैं, सुश्रुतने इसकी निरुक्ति इस प्रकार करी है यथा-“ गुदभगवस्तिप्रदेशदारणात् भगन्दरः ” इति । भगशब्द इस जगह गुदावाचक है । सो भोजने कहा भी है-“ भगः परिसमन्ताच्च गुदं बस्ति- स्तथैव च । भगवदारयेद्यस्मात्तस्माज्ज्ञेयो भगन्दरः ॥ ” इति । यह भगन्दररोग पांच प्रकारका है, यह संख्या कहना केवल रक्तज द्वन्द्वज भगन्दर सम्भावना निवा- रणार्थ जानना ॥ इसके पूर्वरूप ग्रन्थांतरोंसे लिखते हैं- कटीकपालनिस्तोददाहकण्डूरुजादयः । भवन्ति पूर्वरूपाणि भविष्यति भगन्दरे ॥ २ ॥ कमरमें, कपालास्थिमें सुईसी चुभे, दाह होय, खुजली चले, पीडा होय ये लक्षण जब भगन्दर होनहार होय है तब होते हैं, इस जगह भी कपालास्थि पूर्वोक्त जाननी अर्थात् जो नाडीव्रणमें कह आये हैं ॥ शतपोनकके लक्षण । कषायरूक्षैरतिकोपितोऽनिलस्त्वपानदेशे पिडिकां करोति याम् । उपेक्षणात्पाकमुपैति दारुणं रुजा च भिन्नारुणफेनवाहिनी ॥ तत्रागमो मूत्रपुरीषरेतसां व्रणैरनेकैः शतपोनकं वदेत् ॥ ३ ॥ कसैले और रूखे पदार्थ खानेसे वायु अत्यन्त कुपित होकर गुदास्थानमें जो पिडिका ( फुन्सी ) प्रगट करे, उनकी उपेक्षा करनेसे वे फुन्सियां पकें और फूट जायँ तब पीडा होय तथा लाल झाग मिलि राध वहे तथा उसमें अनेक छिद्र हो जायँ उन छिद्रोंमें होकर मूत्र मल और रेत (शुक्र) बहे, चालनीकेसे अनेक छिद्र होयँ इसी कारण इस रोगको शतपोनक कहते हैं । शतपोनक नाम संस्कृतमें चालनीका है ॥ उष्ट्रशिरोधरके लक्षण । प्रकोपणैः पित्तमतिप्रकोपितं करोति रक्तां पिडिकां गुदाश्रिताम् । तदाशुपाकाहिमपूयवाहिनीं भगंदरं तूष्ट्रशिरोधरं वदेत् ॥ ४ ॥ पित्तकारक पदार्थ खानेसे कुपितभया जो पित्त सो गुदामें लाल रंगकी पिडिका उत्पन्न करे, वह शीघ्र पककर उनमेंसे गरम राध बहे । ये पिडिका ( फुन्सी ) ऊँटकी नाकके समान होयँ इसीसे इसको उष्ट्रशिरोधर नाम कहते हैं ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA